बतरस: कॉरपोरेट की नौकरी से युवाओं का क्यों हो रहा मोहभंग? पॉडकास्ट में विशेषज्ञों ने क्या बताया जानिए
अमर उजाला 'बतरस' में जानें क्यों आज के युवा कॉरपोरेट नौकरियां छोड़ स्टार्टअप की ओर बढ़ रहे हैं। अभिनव सिंह और सत्यम पांडे के साथ समझें स्टार्टअप कल्चर और मिडिल क्लास माइंडसेट की सच्चाई।
विस्तार
भारतीय वर्कफोर्स के बदलते मिजाज और 'जेन जी' (Gen Z) की नई प्राथमिकताओं ने कॉरपोरेट जगत के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- आखिर युवा अब पारंपरिक नौकरियों से क्यों भाग रहा है? क्या यह केवल उद्यमिता का आकर्षण है या फिर कॉरपोरेट का 'टारगेट कल्चर' जो युवाओं को स्टार्टअप की ओर धकेल रहा है? अमर उजाला के विशेष कार्यक्रम 'बतरस' में इस सप्ताह इन्हीं ज्वलंत मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
एंकर नंदिता कुदेशिया के साथ चर्चा में शामिल हुए दो उभरते उद्यमियों- 'ब्लूवुड फर्नीचर' के फाउंडर अभिनव सिंह और 'यूनिपैक टेक' के फाउंडर सत्यम पांडे ने बताया कि क्यों आज का युवा 9 से 5 की डेस्क जॉब के बजाय अपने विचार को एक सफल स्टार्टअप में बदलने को प्राथमिकता दे रहा है।
क्या अब सुरक्षित नहीं रही नौकरी?
विशेषज्ञों के अनुसार, सुरक्षा की पारंपरिक परिभाषा अब बदल चुकी है। पहले सरकारी या बड़ी कंपनी की नौकरी को जीवन भर की गारंटी माना जाता था, लेकिन स्टार्टअप लहर ने यह साबित किया है कि 'रिस्क' लेने की क्षमता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि युवा अब केवल वेतन के लिए काम नहीं करना चाहते; वे काम में अपनी हिस्सेदारी और 'इम्पैक्ट' (प्रभाव) की तलाश कर रहे हैं।
क्या मिडिल क्लास का माइंडसेट बदल रहा?
एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठा कि क्या स्टार्टअप में फेल होना अब युवाओं को परेशान नहीं करता? विशेषज्ञों का तर्क है कि 'जेन जी' असफलता को एक अंत के रूप में नहीं, बल्कि सीखने के एक चरण के रूप में देखती है। यही कारण है कि वे अस्थिर समझे जाने वाले रास्तों पर चलने के लिए तैयार हैं। दिलचस्प बदलाव मिडिल क्लास परिवार की सोच में भी देखा जा रहा है। जहां पहले माता-पिता केवल नौकरी पर भरोसा करते थे, वहीं अब वे अपने बच्चों के 'आंत्रप्रेन्योरशिप' के सपनों को समर्थन दे रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों ने जोर दिया कि परिवारों को अब भी स्टार्टअप की अनिश्चितता और जोखिमों को समझने के लिए अपने नजरिए में और बदलाव करने की जरूरत है।
स्किलिंग और स्कूली शिक्षा की क्या भूमिका?
चर्चा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि क्या हमारी स्कूली शिक्षा युवाओं को स्टार्टअप के लिए तैयार कर रही है? विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा प्रणाली में व्यावहारिक प्रशिक्षण और समस्या सुलझाने के कौशल को शामिल किया जाना अनिवार्य है। सीधे अपना काम शुरू करने और पहले नौकरी करके अनुभव लेने के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए सलाह दी गई कि अनुभव अक्सर स्टार्टअप की नींव को मजबूत बनाता है।
नए स्टार्टअप फाउंडर्स की क्या जिम्मेदारी
विशेषज्ञों ने चेतावनी भी दी कि स्टार्टअप करना केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है। नए उद्यमियों को केवल 'फंडिंग' के पीछे भागने के बजाय अपने बिजनेस मॉडल की स्थिरता और अपनी टीम के प्रति जवाबदेही पर ध्यान देना चाहिए। अगर स्टार्टअप फेल होता है, तो उससे उबरकर खुद पर फिर से काम करने की मानसिक मजबूती भी उतनी ही जरूरी है।
युवाओं का स्टार्टअप की ओर बढ़ता झुकाव केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बदलाव है। 'बतरस' के इस अंक ने यह स्पष्ट किया है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था की कमान उन्हीं के हाथ में होगी जो चुनौतियों को अवसरों में बदलने का साहस रखते हैं। इस पूरी चर्चा को शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर विस्तार से सुना जा सकता है।