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Assam Special Revision: असम की मतदाता सूची पर चुनाव आयोग से विपक्ष की अपील- फॉर्म-7 का गलत इस्तेमाल रोका जाए

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी Published by: पवन पांडेय Updated Fri, 23 Jan 2026 11:28 PM IST
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सार

असम में स्पेशल रिवीजन को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से अपील की है। विपक्ष का कहना है कि विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। फॉर्म 7 का इस्तेमाल किसी भी हाल में राजनीतिक हथियार के तौर पर नहीं होना चाहिए और किसी भी योग्य नागरिक का वोट देने का अधिकार छीना नहीं जाना चाहिए।

Assam Special Revision Opposition appeal to Election Commission over voter list urged to prevent Form-7 misuse
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (सांकेतिक) - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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असम में चल रहे विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (स्पेशल रिवीजन- एसआर) के दौरान विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग (ईसी) से अपील की है कि किसी भी योग्य मतदाता का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से न हटाया जाए। विपक्ष का आरोप है कि फॉर्म सात का दुरुपयोग करके खासतौर पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को परेशान किया जा रहा है। वामपंथी दलों, जिसमें सीपीआई (एम), सीपीआई, ,सीपीआई (एमएल), ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक और एसयूसीआई(सी) शामिल हैं, ने एक संयुक्त बयान में कहा कि फॉर्म सात का इस्तेमाल बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के खिलाफ किया जा रहा है जो पूरी तरह योग्य मतदाता हैं। उनका आरोप है कि यह काम 'भाजपा एजेंटों' की तरफ से किया जा रहा है ताकि असली नागरिकों के नाम वोटर लिस्ट से हटवाए जा सकें।
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क्यों-कैसे और कौन कर सकता है फॉर्म सात का इस्तेमाल?
बता दें कि, फॉर्म सात का उपयोग मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है। कोई भी व्यक्ति अपने नाम को हटवाने के लिए तीन कारणों से आवेदन कर सकता है, इसमें पहला- स्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट हो गया हो, दूसरा- पहले से कहीं और नाम दर्ज हो, तीसरा- भारतीय नागरिक न हो। इसके अलावा, कोई भी मतदाता अपने ही क्षेत्र के किसी अन्य व्यक्ति के नाम को हटाने के लिए भी फॉर्म सात भर सकता है, इसके लिए कारण हो सकते हैं, जैसे व्यक्ति की मृत्यु हो गई हो, उम्र 18 साल से कम हो, वह स्थायी रूप से कहीं और चला गया हो, पहले से कहीं और नाम दर्ज हो, वह भारतीय नागरिक न हो। नाम हटाने से पहले अधिकारियों को फॉर्म सात पर आई आपत्तियों की सुनवाई करनी होती है।

क्या है वाम दलों का आरोप?
वाम दलों का आरोप है कि सैकड़ों लोगों के खिलाफ एक ही व्यक्ति के नाम से शिकायतें दाखिल की गई हैं। कई मामलों में जिस व्यक्ति के नाम से शिकायत की गई, उसने खुद कहा कि उसे इसकी कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कई जिंदा लोगों को 'मृत' बताकर उनके नाम काटने की कोशिश की गई है और ज्यादातर शिकायतें धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ की गई हैं। वाम दलों ने कहा, 'कई बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) यह आरोप लगा चुके हैं कि भाजपा के नेता उन पर दबाव बना रहे हैं कि वे अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम सूची से हटा दें।'

उन्होंने यह भी बताया कि जिन लोगों के खिलाफ शिकायतें की गई हैं, उन्हें बहुत कम समय की सूचना देकर सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों की सुनवाई के लिए न तो पर्याप्त जगह है और न ही जरूरी व्यवस्था। वाम दलों ने चुनाव आयोग से मांग की कि किसी भी योग्य मतदाता का नाम न हटाया जाए, फॉर्म 7 का गलत इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, फर्जी और झूठी शिकायत करने वालों को सजा दी जाए।

टीएमसी सांसद ने आयोग को लिखा पत्र
इसी तरह की चिंता तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद सुष्मिता देव ने भी चुनाव आयोग को लिखे अपने पत्र में जताई। उन्होंने कहा कि फॉर्म 7 के जरिए बड़ी संख्या में आपत्तियां एक साथ दाखिल की जा रही हैं। कई मामलों में शिकायतकर्ता या तो मिल ही नहीं रहा या फिर कहता है कि उसने कोई शिकायत की ही नहीं। उन्होंने कछार जिले के बोरखोला विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण दिया, जहां स्थानीय लोगों ने जिला आयुक्त को शिकायत दी कि एक भाजपा बूथ लेवल एजेंट ने 22 फॉर्म 7 दाखिल किए, जो सभी पूरी तरह झूठे थे। सुष्मिता देव ने असम के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि सिलचर विधानसभा क्षेत्र में 15,304 आपत्तियां, बरखेत्री में 10249, जो-सुअलकुची में 10,151, कटीगोरा में 9,671, मंगलदै में 8,602 आपत्तियां दर्ज की गई हैं।

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10 फरवरी को प्रकाशित असम की अंतिम मतदाता सूची
उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को नोटिस भेजना, उन्हें सुनवाई का मौका देना और फिर 2 फरवरी तक सभी मामलों का निपटारा करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसलिए उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की कि सुनवाई की अंतिम तारीख को कम से कम 7 दिन और बढ़ाया जाए, हर मतदाता को अपने वोट के अधिकार की रक्षा का पूरा मौका मिले। सुष्मिता देव ने यह भी मांग की कि जिन लोगों के नाम असम के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) में शामिल हैं, उनके नाम अंतिम मतदाता सूची में भी अनिवार्य रूप से जोड़े जाएं। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार, असम की अंतिम मतदाता सूची 10 फरवरी को प्रकाशित की जानी है।

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