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CAPF: अर्धसैनिक बल के अधिकारी ने कैडर मामले में पीएम और गृह मंत्री के नाम लिखा खुला पत्र, जताई यह पीड़ा

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 14 Jul 2025 06:03 PM IST
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सार

सीएपीएफ के एक अधिकारी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को खुला पत्र लिखा है। इस पत्र को सोशल मीडिया के जरिए साझा किया गया है। इसमें सीएपीएफ अधिकारियों के लिए न्याय और सम्मान की गुहार लगाई गई है।

CAPF: Paramilitary force officer wrote an open letter to PM and Home Minister in cadre case
सीएपीएफ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में कैडर अधिकारियों की पदोन्नति, संगठित सेवा का दर्जा, नए सर्विस रूल्स एवं वित्तीय हितों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था, उस पर केंद्र सरकार रिव्यू पेटिशन में चली गई है। इस कदम को 13000 कैडर अधिकारियों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। केंद्र सरकार के इस कदम से परेशान होकर सीएपीएफ के एक अधिकारी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को खुला पत्र लिखा है। इस पत्र को सोशल मीडिया के जरिए साझा किया गया है। इसमें सीएपीएफ अधिकारियों के लिए न्याय और सम्मान की गुहार लगाई गई है। पत्र में कहा गया है कि वे गंभीर अन्याय का सामना कर रहे हैं। सरकार ने हमें संगठित ग्रुप ए सेवा यानी  'ओजीएएस' का दर्जा देने से इनकार कर दिया है।  

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कैडर अधिकारी ने अपने पत्र में लिखा कि वह एक पीड़ित, लेकिन समर्पित सैनिक के रूप में लिख रहा है। वह सैनिक, जिसने 19 वर्ष तक वर्दी पहनकर देश की सीमाओं की रक्षा की है। भारत के सबसे दुर्गम क्षेत्रों में अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया है। एसपीजी के कमांडो और सीआरपीएफ के जेड प्लस सुरक्षा कर्मी, जो दिन रात आपकी हिफाजत करते हैं। इन विशिष्ट इकाइयों का नेतृत्व करने वाले अधिकारी, जो अटल साहस और अद्भुत योजनाबद्धता से अपना कर्तव्य निभाते हैं। ये सभी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के अधिकारी हैं। 
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पत्र के मुताबिक, आज यही अधिकारी एक गंभीर अन्याय का सामना कर रहे हैं। आपकी सरकार ने हमें संगठत ग्रुप-ए सेवा (OGAS) का दर्जा देने से इनकार कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय को पलटने के  लिए एक पुनर्विचार याचिका तक दायर कर दी है, जिसने हमारे अधिकारों को मान्यता दी थी। क्या यह संदेश देना चाहते हैं कि हमारी जान तो कुर्बानी के लायक है, लेकिन सम्मान नहीं। हम भारत के लिए लड़ते हैं, पर हमारे लिए कौन लड़ेगा। यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है, बल्कि सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और सीआईएसएफ के हजारों प्रत्यक्ष भर्ती 
अधिकारियों की मूक पीड़ा है। गणतंत्र दवस की परेड में हमें सलामी दी जाती है, राजनीतिक भाषणों में हमारी शहादत का गुणगान किया जाता है।  

पत्र में लिखा है कि जब कैडर समीक्षा और नीतिगत निर्णयों की बात आती है तो हमें दूसरे ग्रुप-ए अधिकारियों के बराबर अधिकार, पदोन्नति और नेतृत्व का अवसर नहीं दिया जाता। जब न्यायालय न्याय दे, तो सरकार विरोध क्यों करे। दिल्ली उच्च न्यायालय और भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्णय दिया है कि सीएपीएफ अधिकारियों को संगठित ग्रुप-ए सेवा का हिस्सा माना जाए। आईपीएस के प्रभुत्व को कम करके सीएपीएफ अधिकारियों को उचित नेतृत्व के अवसर दिए जाएं। हमें समान पदोन्नति, सम्मान और अपने ही बलों में नेतृत्व का अधिकार मिले, लेकिन इन निर्णयों को लागू करने की बजाय, सरकार ने पुनर्विचार याचका दायर कर दी। एक औपनिवेशिक मानसिकता को थामे रखने के लिए जो सीएपीएफ अधिकारियों को आईपीएस से कमतर रखती है, उन्हीं बलों में जिन्हें हम प्रशिक्षित होकर लीड करते हैं। आपके पास बदलाव लाने की शक्ति है, फिर क्यों नहीं। 
 
आपने संसद में ऐतिहासिक फैसले लिए हैं। राष्ट्रीय नीतियों को रातों रात बदला है तो यह मामला क्यों अटका है। यह जटिलता का नहीं, इरादे का सवाल है। अगर इच्छाशक्ति होती, तो न्याय पहले ही मिल चुका होता। हमें सिर्फ वोटों के लिए, सम्मान के लिए भी याद रखें। हम संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 'भारत के सशस्त्र बल' हैं। फिर भी हमें नियमित पदोन्नति का ढांचा, अन्य ग्रुप ए सेवाओं के बराबर अधिकार और अपने ही संस्थानों में नेतृत्व की मान्यता, से वंचित रखा जाता है। 

खुले पत्र के आखिर में अधिकारी ने लिखा है कि मैं याचिकाकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि उस सैनिक के रूप में अपील करता हूं, जिसने तिरंगे के प्रति अपनी शपथ को कभी नहीं तोड़ा। आपकी पुनर्विचार याचिका सीएपीएफ अधिकारियों को यह संदेश देती है कि आप हमारा भविष्य नहीं चाहते हैं। कृप्या इस पत्र को केवल शब्द न समझें। इसे वह क्षण बनाएं, जब आपकी सरकार ने उनके साथ खड़ा होने का फैसला किया, जो हर पल उसकी रक्षा के लिए तैनात हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा था कि सीएपीएफ अधिकारियों को ओजीएएस आदि प्रक्रियाओं में शामिल किया जाना चाहिए। सरकार, सीएपीएफ प्रतिनिधियों को उनकी सेवा शर्तों और पदोन्नति से संबंधित सभी चर्चाओं और निर्णयों में शामिल करे। केंद्रीय अर्धसैनिक बल, अब पूर्ण रूप से 'ओजीएएस' के दायरे में माने गए हैं। इनके हितों को लेकर सरकार जो भी निर्णय ले, उसमें 'ओजीएएस' का दृष्टिकोण मान्य रहे। 23 मई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ओका और जस्टिस उज्जल भुयान ने एक अहम फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'संगठित समूह ए सेवा' (ओजीएएस) लागू करने की बात कही थी। इसके लिए छह माह की समय-सीमा तय की गई। सर्वोच्च अदालत ने इन बलों में बतौर प्रतिनियुक्ति बाहर से आने वाले आईपीएस की संख्या (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड के स्तर तक) को धीरे-धीरे कम करने की बात कही। उनकी सेवा अवधि अधिकतम 2 वर्ष तक सीमित रखने पर बल दिया। 

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