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Suprme Court: 'CEC की नियुक्ति में न्यायिक प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं', केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 16 May 2026 10:38 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से जुड़े 2023 के अधिनियम सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं दाखिल की गई हैं। केंद्र सरकार की ओर से यह हलफनामा इन पर हो रही सुनवाई के दौरान दाखिल किया गया है।
केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
संविधान मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में न्यायिक प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं करता है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर ये बात कही है। सरकार ने कहा कि न्यायपालिका के किसी सदस्य को शामिल करना एक विधायी विकल्प है, न कि सांविधानिक अनिवार्यता। यह हलफनामा मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दाखिल किया गया है।
वर्ष 2023 का यह अधिनियम दो जनवरी 2024 को लागू हुआ था। यह निर्धारित करता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून ने तीन-सदस्यीय चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री से प्रतिस्थापित कर दिया है।
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सरकार ने दिया क्या तर्क?
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा, "यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि संविधान चुनाव आयोग की नियुक्ति समितियों में न्यायिक प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं करता है। न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य का समावेश एक विधायी विकल्प है, न कि एक सांविधानिक अनिवार्यता।" सरकार का तर्क है कि यह सुझाव कि नियुक्तियों को मान्य करने के लिए न्यायिक भागीदारी आवश्यक है, शक्तियों के पृथक्करण और अनुच्छेद 324 के तहत संसद की भूमिका की गलत समझ है।
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता उसकी सांविधानिक स्थिति, कार्यकाल की सुरक्षा, पद से हटाने के लिए सुरक्षा उपायों और उसके कार्यों व भत्तों की वैधानिक सुरक्षा से उत्पन्न होती है। 2023 का अधिनियम इन विशेषताओं को बनाए रखते हुए उनकी नियुक्ति में प्रक्रियात्मक पारदर्शिता जोड़ता है।
सरकार बोली- पिछली नियुक्तियों पर नहीं खड़े हो सकते सवाल
सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि अधिनियम के लागू होने से पहले की गई चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है, क्योंकि तब कार्यपालिका के पास नियुक्तियां करने की विशेष शक्ति थी। हलफनामे में कहा गया है कि ऐसा कोई मामला नहीं बनाया गया है कि केवल राष्ट्रपति के अधिकार के तहत नियुक्तियों के कारण स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रभावित हुए हों।
हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए फैसले का जिक्र
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के दो मार्च 2023 के अनूप बरनवाल फैसले का जिक्र किया, जिसमें यह वांछनीय माना गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक समिति की सलाह पर की जाए। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और सीजेआई शामिल हों। हालांकि, केंद्र ने स्पष्ट किया कि अदालत ने यह भी कहा था कि यह मानदंड केवल तब तक लागू रहेगा जब तक संसद इस संबंध में कोई कानून नहीं बना देती। सरकार का कहना है कि अदालत की राय का मतलब यह नहीं है कि यह "संसद के हाथों को बांधती है"।
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केंद्र सरकार ने किया आरोपों का खंडन
सरकार ने यह भी कहा कि यह आरोप कि चयन समितियों में न्यायपालिका के सदस्यों के बिना वे पक्षपाती होंगे, पूरी तरह से गलत है। हलफनामे में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त की स्वतंत्रता, चयन के तरीके से अधिक, व्यक्ति के कामकाज और उसके पेशेवर उत्कृष्टता के गुणों पर निर्भर करती है। केंद्र ने इस आरोप का भी खंडन किया कि संसद ने 2023 अधिनियम से संबंधित विधेयक पर विचार करते समय कई सांसदों को निलंबित कर दिया था, और इसे आधारहीन बताया।
वर्ष 2023 का यह अधिनियम दो जनवरी 2024 को लागू हुआ था। यह निर्धारित करता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून ने तीन-सदस्यीय चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री से प्रतिस्थापित कर दिया है।
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सरकार ने दिया क्या तर्क?
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा, "यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि संविधान चुनाव आयोग की नियुक्ति समितियों में न्यायिक प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं करता है। न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य का समावेश एक विधायी विकल्प है, न कि एक सांविधानिक अनिवार्यता।" सरकार का तर्क है कि यह सुझाव कि नियुक्तियों को मान्य करने के लिए न्यायिक भागीदारी आवश्यक है, शक्तियों के पृथक्करण और अनुच्छेद 324 के तहत संसद की भूमिका की गलत समझ है।
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता उसकी सांविधानिक स्थिति, कार्यकाल की सुरक्षा, पद से हटाने के लिए सुरक्षा उपायों और उसके कार्यों व भत्तों की वैधानिक सुरक्षा से उत्पन्न होती है। 2023 का अधिनियम इन विशेषताओं को बनाए रखते हुए उनकी नियुक्ति में प्रक्रियात्मक पारदर्शिता जोड़ता है।
सरकार बोली- पिछली नियुक्तियों पर नहीं खड़े हो सकते सवाल
सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि अधिनियम के लागू होने से पहले की गई चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है, क्योंकि तब कार्यपालिका के पास नियुक्तियां करने की विशेष शक्ति थी। हलफनामे में कहा गया है कि ऐसा कोई मामला नहीं बनाया गया है कि केवल राष्ट्रपति के अधिकार के तहत नियुक्तियों के कारण स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रभावित हुए हों।
हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए फैसले का जिक्र
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के दो मार्च 2023 के अनूप बरनवाल फैसले का जिक्र किया, जिसमें यह वांछनीय माना गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक समिति की सलाह पर की जाए। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और सीजेआई शामिल हों। हालांकि, केंद्र ने स्पष्ट किया कि अदालत ने यह भी कहा था कि यह मानदंड केवल तब तक लागू रहेगा जब तक संसद इस संबंध में कोई कानून नहीं बना देती। सरकार का कहना है कि अदालत की राय का मतलब यह नहीं है कि यह "संसद के हाथों को बांधती है"।
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केंद्र सरकार ने किया आरोपों का खंडन
सरकार ने यह भी कहा कि यह आरोप कि चयन समितियों में न्यायपालिका के सदस्यों के बिना वे पक्षपाती होंगे, पूरी तरह से गलत है। हलफनामे में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त की स्वतंत्रता, चयन के तरीके से अधिक, व्यक्ति के कामकाज और उसके पेशेवर उत्कृष्टता के गुणों पर निर्भर करती है। केंद्र ने इस आरोप का भी खंडन किया कि संसद ने 2023 अधिनियम से संबंधित विधेयक पर विचार करते समय कई सांसदों को निलंबित कर दिया था, और इसे आधारहीन बताया।