कभी नहीं भुलाया जा सकेगा साल 2020, जानिए कैसा रहा देश के लिए बीता वर्ष
कोरोना महामारी ने साल 2021 के जश्न को पूरी तरह फीका कर दिया। न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में 2021 का आगाज वैसा नहीं हुआ जैसा पहले होता रहा है। भारत में मार्च 2020 में कोरोना वायरस का पहला केस सामने आया था। तब से अब तक देश ने जो कुछ भी देखा वो अभूतपूर्व रहा। कोरोना वायरस की लहर ने न सिर्फ अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया बल्कि लाखों लोगों का रोजगार भी छीन लिया। 2020 में हर तरफ दुख-दर्द की तस्वीर नजर आई।
लॉकडाउन के दौरान देश ने जो देखा वो भी पहली बार ही नजर आया। बसों-ट्रेनों के बंद होने से लाखों प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े। सिर पर सामान की गठरी और साथ में छोटे-छोटे बच्चे, ये नजारा कभी न भुलाया जा सकेगा। कई लोगों ने रास्ते में ही तड़पकर दम तोड़ दिया। कोरोना की चपेट में पहले शहर आए और फिर गांव। केंद्र और राज्य सरकारों ने सख्त उपाय कर इसे रोकने की कोशिश की। बावजूद इसके एक वक्त ऐसा भी था जब रोजाना करीब एक लाख मामले सामने आने लगे थे। अब इसकी रफ्तार में कमी आई है लेकिन खतरा बरकरार है। कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन ने नई चिंता पैदा कर दी है।
लेकिन इन सबके बावजूद इस साल ऐसा भी हुआ जिसने बता दिया कि इंसान का जज्बा मजबूत हो तो हर मुश्किल उसके आगे छोटी ही पड़ जाती है। जो पीपीई किट भारत के लिए बिल्कुल नई चीज थी उसके उत्पादन में भारत ने रिकॉर्ड बना दिया। लोगों ने इस दौरान ऐसे-ऐसे काम किए जिस पर हर किसी को गर्व है।
आइए जानने की कोशिश करते हैं कि 2020 के दौरान इसका खेल जगत, कारोबार, बॉलीवुड पर क्या असर पड़ा, इस साल देशभर में क्या-क्या हुआ....
दिल्ली ने इस तरह किया कोरोना वायरस महामारी का सामना
दिल्ली के लिए साल 2020 में कोरोना वायरस से जंग काफी मुश्किलों भरी रही, लेकिन कोरोना योद्धाओं और रणनीतिक फैसलों के माध्यम से राजधानी ने महामारी का डटकर सामना किया। दिल्ली में एक मार्च को कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला सामने आया था जब इटली से लौटा पूर्वी दिल्ली का एक कारोबारी इससे संक्रमित पाया गया। 11 अप्रैल को संक्रमण के मामलों की संख्या एक हजार का आंकड़ा पार कर 1069 तक पहुंच गई जबकि उस दिन तक मृतकों की तादाद 19 थी। इसके बाद 27 अप्रैल को संक्रमितों की संख्या 3000 से आंकड़े को पार कर गई।
इसके बाद जैसे-जैसे लॉकडाउन बढ़ाया गया, वैसे-वैसे लोकनायक जयप्रकाश (एलएनजेपी) अस्पताल, राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, और गुरु तेगबहादुर (जीटीबी) अस्पतालों को कोविड-19 केंद्रो में तब्दील किया गया और निजी अस्पतालों को भी बढ़ते मरीजों के उपचार के लिये बिस्तरों का प्रबंध करने निर्देश दिया गया। राष्ट्रीय राजधानी में 23 जून को संक्रमण के पहले दौर के बारे में पता चला जब उस समय एक ही दिन में संक्रमण के सबसे अधिक 3,947 नए मामले सामने आए।
इसके बाद दिल्ली में युद्धस्तर पर तैयारियां की गईं। कोरोना योद्धाओं ने महामारी के खिलाफ जंग के सरकार के प्रयासों को आगे बढ़ाया और अस्पतालों और एंबुलेंस में सफेद लैब कोट, पीपीई किट पहनकर महामारी का सामना किया जबकि खाकी वर्दी वाले पुलिसकर्मियों ने लॉकडाउन का पालन कराने के लिए दिन रात काम किया।
लॉकडाउन के दौरान साफ नीले आसमान और स्वच्छ यमुना नदी की तस्वीरों सोशल मीडिया पर तैरने लगीं। खुशनुमा मौसम, साफ-सुथरी सड़कों और घरों ने महामारी के मनोवैज्ञानिक बोझ को कम करने में मदद की।
इस बीच 24 जून को दिल्ली मुंबई को पीछे छोड़कर भारत का कोरोना वायरस से सबसे बुरी तरह प्रभावित शहर बन गया। शहर में इस तारीख तक कोरोना वायरस संक्रमितों की संख्या 70 हजार से अधिक हो गई थी। राष्ट्रीय राजधानी में जब संक्रमण के मामलों में तेज उछाल देखा जा रहा था तब गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली के स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिये खुद मोर्चा संभाला ।
दिल्ली की अदालतों में कामकाज को लेकर कुछ खास बदलाव देकर गया साल 2020
दिल्ली की अदालतों को साल 2020 कुछ खास बदलाव देकर गया, जिन्होंने अभूतपूर्व कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन की काट निकाली और दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों और तबलीगी जमात के विदेशी सदस्यों के वीजा नियमों के कथित उल्लंघन जैसे महत्वपूर्ण मामलों की वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए सुनवाई की।
वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए सुनवाइयों का दौर शुरू होने से कुछ दिन पहले एक निचली अदालत को निर्भया सामूहिक बलात्कार व हत्या मामले के दोषियों की विभिन्न अर्जियों के चलते उन्हें फांसी पर लटकाने की तिथि में कई बार बदलाव करना पड़ा। संबंधित न्यायाधीश ने इन अर्जियों को 'देरी करने का हथकंडा' करार दिया। आखिरकार 20 मार्च सुबह साढ़े पांच बजे उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।
अदालत ने उनकी सभी अर्जियों पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक दोषी को अपने सभी कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करने का अधिकार है और कोई भी अदालत उनके मौलिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन, किसानों के आंदोलन से सुर्खियों में रहा कृषि क्षेत्र
कोरोना वायरस महामारी के बावजूद भारतीय कृषि क्षेत्र ने रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन और सकारात्मक वृद्धि हासिल की। लेकिन नए कृषि कानूनों के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर बड़े पैमाने पर किसानों के विरोध प्रदर्शन ने कृषि क्षेत्र के उल्लेखनीय प्रदर्शन को फीका कर दिया।
ठंड के मौसम और महामारी की चिंताओं के बावजूद, मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों का विरोध प्रदर्शन नवंबर के अंत में शुरू हुआ और यह अभी तक जारी है। गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार और लगभग 40 किसान यूनियनों के बीच अभी तक छह दौर की औपचारिक बातचीत हो चुकी है।
किसान यूनियनों के साथ वार्ता का नेतृत्व कर रहे केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर साल की समाप्ति से पहले कोई समाधान निकलने को लेकर आशान्वित थे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। बाद में, तोमर ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नये साल में संकट को समाप्त करने के लिए समाधान निकलेंगे।
सरकार और यूनियनों के बीच बुधवार को हुई आखिरी बैठक में, दोनों पक्ष प्रस्तावित बिजली संशोधन विधेयक तथा वायु प्रदूषण संबंधी अध्यादेश के बारे में चिंताओं के संदर्भ में आम सहमति पर पहुंचे हैं। यह अध्यादेश, किसानों को फसल अवशेष जलाने की स्थिति में उन्हें दंडित करता है।
सरकार ने किसानों द्वारा फसल अवशेषों को जलाने को गैर-आपराधिक करने का और बिजली सब्सिडी जारी रखने का भी आश्वासन दिया है। लेकिन दो विवादास्पद मुद्दों पर अभी कोई सहमति नहीं बन पाई है। ये दो मुख्य मांगे हैं - सितंबर में लागू किए गए तीन नये कृषि कानूनों को रद्द करना तथा एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) खरीद प्रणाली के लिए कानूनी गारंटी। अब, दोनों पक्षों को नए साल में इन दो मुद्दों का समाधान निकलने की उम्मीद है तथा इसके लिए दोनों पक्षों के बीच अगली वार्ता चार जनवरी को होने वाली है।
बंगाल के लिए 2020 रहा राजनीतिक अशांति, महामारी, प्राकृतिक आपदा का वर्ष
पश्चिम बंगाल के लिए वर्ष 2020 राजनीतिक अशांति, महामारी और प्राकृतिक आपदा का वर्ष रहा। राज्य में हालांकि, कोविड-19 और भीषण चक्रवात के मुकाबले राजनीतिक हलचल व तृणमूल कांग्रेस तथा भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष की खबरें अधिक सुर्खियों में रहीं।
राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने जहां पूरी ताकत झोंक दी है, वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस भी उसे रोकने के लिए वार-प्रतिवार करती नजर आई। राजनीतिक हिंसा ने राज्य को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला खड़ा किया। भाजपा ने दावा किया कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से राजनीतिक हिंसा में उसके 130 से अधिक कार्यकर्ता मारे गए या रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए।
तृणमूल कांग्रेस और भाजपा नीत केंद्र सरकार सालभर एक-दूसरे से टकराती रहीं। राज्य में राजनीतिक हिंसा इस स्तर तक जा पहुंची कि दिसंबर के शुरू में भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के काफिले पर तब हमला हुआ जब वह पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक को संबोधित करने दक्षिण 24 परगना के डायमंड हार्बर जा रहे थे।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नड्डा की सुरक्षा में कथित ढिलाई को लेकर राज्य में पदस्थ तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आने को कहा जिस पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र से भिड़ गईं। नड्डा के काफिले पर हुए हमले में कई भाजपा नेता घायल हो गए।
केंद्रीय गृह मंत्री एवं भाजपा के दिग्गज नेता अमित शाह ने राज्य में कानून व्यवस्था की ‘‘बिगड़ती’’ स्थिति को लेकर राज्य सरकार पर हमला बोला और भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपने केंद्रीय नेताओं को पश्चिम बंगाल में उतार दिया।
जब खेलों के लिए ग्रहण बनी कोरोना महामारी और सूने पड़े रहे मैदान
आतंकी हमलों के बीच भी खेल कभी नहीं रूके, जंग के दौरान भी खेलों की दुनिया इस तरह खामोश नहीं रही लेकिन कोरोना महामारी ने दुनिया भर में खेल गतिविधियों को ठप्प कर दिया। जीवन से खेल का उत्साह, जुनून और रोमांच चला गया। पूरे 2020 में खेलों की यही कहानी रही जब मैदान सूने पड़े रहे और खिलाड़ी वापसी के इंतजार में दिन काटते रहे।
यहां तक कि ओलंपिक खेल भी एक साल के लिये स्थगित करने पड़े। आखिरी बार युद्ध के दौरान ही खेलों के इस महाकुंभ को स्थगित करना पड़ा था। फुटबॉल के महानायक डिएगो माराडोना को भी वर्ष 2020 ने छीन लिया । अपने खेल, तेवर और करिश्मे से दुनिया भर के फुटबॉलप्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले माराडोना के अचानक निधन से खेल जगत शोक में डूब गया । उनका निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ।
वहीं इस साल महेंद्र सिंह धोनी के संन्यास के साथ भारतीय क्रिकेट में एक युग का अंत हुआ। जब सारा देश आजादी की सालगिरह मना रहा था जब 15 अगस्त को सूर्यास्त के समय धोनी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदा ली ।
पूरे साल कोरोना महामारी के कारण खेल गतिविधियां बंद रही। एक के बाद एक टूर्नामेंट रद्द या स्थगित होते रहे । इसका असर खेलों की आर्थिक सेहत और खिलाड़ियों की तैयारियों पर भी पड़ा।
क्रिकेट ने जरूर इस निराशा के बीच लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहटें लाने का काम किया। यूएई में रिकार्ड टीवी दर्शक संख्या के साथ 53 दिन तक इंडियन प्रीमियर लीग का आयोजन किया गया। आम तौर पर सालाना जलसे की तरह खेले जाने वाले इस टूर्नामेंट में हालांकि मैदानों पर दर्शकों का शोर नहीं था और खिलाड़ी बायो बबल में थे।
बाकी खेलों में हालांकि अनिश्चितता का आलम रहा। तोक्यो ओलंपिक के लिये भारत की पदक उम्मीद खिलाड़ी या तो होस्टल के कमरों या अपने घरों में बंद रहे। अगले साल जुलाई अगस्त में होने वाले ओलंपिक की तैयारियां बाधित हुई और अब देखना यह है कि इसका असर खेलों में प्रदर्शन पर कितना पड़ता है।
कोविड-19 की चुनौतियों के बीच साल 2020 में बांग्लादेश, भारत ने द्विपक्षीय संबंध मजबूत किए
कोविड-19 के कारण उत्पन्न चुनौतियों के बीच साल 2020 में बांग्लादेश की एक महत्वपूर्ण राजनयिक उपलब्धि भारत के साथ अपने राजनयिक संबंधों को और मजबूत बनाना रही। कोरोना महामारी के कारण बांग्लादेश की प्राथमिक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के समक्ष गंभीर चुनौती उत्पन्न हुई और दक्षिण एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल इस देश को मंदी की स्थिति का सामना भी करना पड़ा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 दिसंबर को अपनी बांग्लादेशी समकक्ष शेख हसीना के साथ डिजिटल शिखर बैठक में बांग्लादेश को ‘पड़ोस प्रथम’ नीति का प्रमुख स्तम्भ करार दिया। वहीं, शेख हसीना ने भारत को सच्चा मित्र बताया। प्रधानमंत्री मोदी की ढाका यात्रा पहले मार्च में होने वाली थी जो महामारी के कारण रद्द कर दी गई थी।
दोनों नेताओं ने हल्दीबाड़ी और चिलाहाटी के बीच महत्वपूर्ण रेल संपर्कों को बहाल किया जो 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद से बंद थे । इसके बाद दोनों देशों के बीच परिचालित रेल संपर्कों की संख्या बढ़कर पांच हो गई है।
साल 1947 में बंटवारे के बादे भारत और बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) के बीच सात रेल सम्पर्क परिचालन में थे। अब हल्दीबाड़ी और चिलाहाटी रेल सम्पर्क के परिचालन में आने के बाद बांग्लादेश के पर्यटकों को दार्जिलिंग, सिक्किम, दोआर के अलावा नेपाल और भूटान जाने में सहुलियत होगी।
पुनर्गठित जम्मू कश्मीर में डीडीसी चुनावों के साथ 2020 में चुनाव प्रक्रिया फिर शुरू हुई
राज्य का विशेष दर्जा खत्म होने और पिछले साल तत्कालीन राज्य के पुनर्गठन के बाद जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनावों के साथ 2020 के अंत में जम्मू कश्मीर में एक बार फिर चुनावों और राजनीतिक गतिविधियों की बहाली देखने को मिली।
केंद्र द्वारा 2019 में किए गए एक अहम संविधान संशोधन के बाद वर्ष 2020 की शुरुआत कुछ अनिश्चितताओं के साथ हुई थी जब प्रदेश में मुख्यधारा के अधिकतर राजनेता हिरासत में ही थे। राज्य के कुछ नेता जहां पहले दो महीनों में ही छूट गए। वहीं कोरोना वायरस महामारी की आमद के चलते मार्च में फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला समेत कई अन्य को छोड़ दिया गया।
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती हालांकि सबसे ज्यादा समय 14 महीने तक कैद में रहीं और उन्हें डीडीसी चुनावों से ठीक पहले अक्टूबर में रिहा किया गया।
इस साल कोविड-19 से निपटने में प्रशासन का समय और संसाधन दोनों खूब लगे। इस महामारी से केंद्र शासित प्रदेश में 1.19 लाख लोग संक्रमित हुए तो वहीं करीब 1900 लोगों की जान चली गई।
भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों ने मुख्यधारा के नेताओं के खिलाफ अपनी जांच तेज की और जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय ने फारुख अब्दुल्ला की 11.86 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति कुर्क कर दी जबकि युवा पीडीपी नेता वहीद पारा को आतंकियों से कथित संबंध के चलते सलाखों के पीछे जाना पड़ा।
पारा ने हालांकि डीडीसी चुनावों में जीत हासिल करते हुए अपने निकटतम भाजपा उम्मीदवार को बड़े अंतर से शिकस्त दी। अनुच्छेद 370 को रद्द किये जाने के 16 महीने बीतने के बाद भी जम्मू कश्मीर के अधिकतर हिस्सों में मोबाइल उपकरणों पर हाई-स्पीड इंटरनेट सुविधा नहीं है क्योंकि प्रशासन अब भी यह मानता है कि इस सेवा की इजाजत देने से भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरा हो सकता है।
प्रशासनिक मोर्चे पर भाजपा नेता मनोज सिन्हा ने गिरीश चंद्र मुर्मू की जगह उपराज्यपाल का पदभार संभाला। ऐसी अफवाह थी कि मुर्मू और केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य सचिव बी वी आर सुब्रमण्यम के बीच रिश्ते सही नहीं चल रहे थे। इन सभी चीजों के बीच डीडीसी चुनावों को राज्य के लिये 2020 का मुख्य आकर्षण कहा जा सकता है।
खाद्य मंत्रालय ने कोविड-19 महामारी के दौरान मुफ्त अनाज वितरण के कठिन कार्य को बखूबी पूरा किया
देश के 80 करोड़ से अधिक गरीब लोगों को मुफ्त अनाज मुहैया कराना एक असाध्य काम था लेकिन खाद्य, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने कोविड- 19 महामारी के कारण उठापटक वाले वर्ष 2020 में इस काम को बखूबी अंजाम दिया। लगातार आठ महीने तक राशन दुकानों के जरिये मुफ्त अनाज का वितरण किया गया।
इस उपलब्धि का श्रेय खाद्य, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय और सरकारी स्वामित्व वाली भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को जाता है कि देश के किसी भी हिस्से में महामारी के दौरान खाद्यान्न की कोई कमी नहीं देखी गई। वस्तुतः फल, सब्जियों और दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं की कोई कमी नहीं होने दी गई। हालांकि, थोड़े समय के लिए प्याज की कीमतों में उछाल जरूर देखा गया।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्ना योजना (पीएमजीकेएवाई) के तहत, मंत्रालय ने अप्रैल-नवंबर की अवधि में लगभग 3.2 करोड़ टन मुफ्त खाद्यान्न का वितरण किया। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत दिये जाने वाले अत्यधिक रियायती दर के खाद्यान्न के नियमित वितरण के अतिरिक्त था।
वर्ष के दौरान मार्च में महामारी के फैलना शुरु होने पर मंत्रालय के उपभोक्ता मामलों के विभाग ने भी पर्याप्त मात्रा में मास्क और हैंड सैनिटाइटर की उचित उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नियामक मोर्चे पर तेजी से कदम उठाकर कुशलतापूर्वक अपनी भूमिका निभाई।
‘ला नीना’ का 2020 पर रहा प्रभाव, भारत में सामान्य से रिकॉर्ड ज्यादा बारिश, कड़ाके की ठंड
देश के मौसम पर 2020 में ला-नीना का असर स्पष्ट नजर आया जब लगातार दूसरे वर्ष देश में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई, सर्दियों में सामान्य से कम तापमान रहा और गर्मियों में भी लू के थपेड़े कम महसूस हुए।
इस साल पूर्वी और पश्चिमी तरफ समुद्री इलाकों में पांच चक्रवात भी आए। इन पांच में से चार ‘गंभीर चक्रवाती तूफान’ या उससे भी ज्यादा श्रेणी के थे। ला-नीना स्थितियां उत्तर भारत के इलाकों में अच्छे मानसून और भीषण सर्द स्थितियों के लिये महत्वपूर्ण कारक होती हैं।
ला-नीना प्रशांत महासागर के जल के ठंडा होने से संबंधित है जबकि अल-नीनो इसके विपरीत स्थिति है। आम तौर पर यह देखा गया है कि ला-नीना वर्ष में अच्छी बारिश होती है और सर्दियों में तापमान सामान्य से कम होता है।
देश में दिसंबर से फरवरी तक प्रमुख रूप से सर्दी का मौसम रहता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक एम मोहपात्रा ने कहा कि दिसंबर 2019 में उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में शुरू हुई भीषण सर्दी की स्थिति इस साल जनवरी में भी बरकरार रही।
2020 बीते 30 सालों के दौरान तीसरा सबसे ज्यादा बारिश वाला साल भी रहा। केरल में दक्षिण-पश्चिम मानसून एक जून को पहुंचा था जो इसकी सामान्य तारीख है। मानसून का आधिकारिक मौसम एक जून से शुरू होता है और 30 सितंबर तक रहता है।
देश में दीर्घावधि बारिश औसत (एलपीए) की 109 प्रतिशत बारिश हुई। आम तौर पर देश में जुलाई और अगस्त में अधिकतम बारिश होती है। मानसून की मुख्य विशेषताओं में इस बार अगस्त में हुई बारिश थी। इस महीने कम दबाव के पांच क्षेत्र बने जिनकी वजह से मध्य भारत में काफी बारिश हुई। इसकी वजह से ओडिशा, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, दक्षिण गुजरात और दक्षिण राजस्थान में बाढ़ जैसे हालात भी बने।
गृह मंत्रालय लॉकडाउन के कार्यान्वयन, गतिविधियों को फिर से शुरू करने में रहा व्यस्त
कोविड-19 महामारी के कारण सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त होने के साथ ही केंद्रीय गृह मंत्रालय 2020 में लगभग पूरे साल लॉकडाउन संबंधी उपायों को कड़ाई से लागू कराने, बाद में आजीविका और आर्थिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने तथा पाबंदियों के कारण प्रभावित हुए प्रवासी श्रमिकों जैसे लोगों को राहत प्रदान करने में व्यस्त रहा।
इस वर्ष केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली की स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए व्यक्तिगत रूप से कमान संभाली और जब भी राष्ट्रीय राजधानी में इस महामारी के मामलों में वृद्धि देखी गई, उन्होंने आगे आकर कोरोना वायरस के प्रसार पर अंकुश लगाने के वास्ते प्रयास किए।
पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के काफिले पर हमले के मद्देनजर राज्य की कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के साथ उलझ गया था।
गृह मंत्रालय ने कई उन राज्यों को मदद प्रदान की, जो चक्रवातों से प्रभावित हुए थे। मंत्रालय ने कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं दीं जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि पाकिस्तान वैश्विक आतंकी वित्तपोषण और धनशोधन पर नजर रखने वाले वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) की ‘ग्रे’ सूची में बना रहे।
प्रधानमंत्री मोदी ने 24 मार्च को महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन लगाए जाने की घोषणा की थी और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाना गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी बन गई थी।
यह अधिनियम केंद्रीय गृह सचिव को कानून के तहत राष्ट्रीय कार्यकारी समिति के अध्यक्ष के रूप में लॉकडाउन लगाने और फिर से खोलने के लिए सभी आदेश जारी करने का अधिकार देता है।
इसके बाद वायरस को फैलने से रोकने के लिए कई बार लॉकडाउन के आदेश, दिशा-निर्देश जारी किए गए और लोगों की जरूरतों के अनुसार उन्हें अपनी आजीविका चलाने के मौके भी दिए गए।
केन्द्र सरकार द्वारा हालांकि लॉकडाउन लगाए जाने की अचानक घोषणा किए जाने से लाखों प्रवासी श्रमिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ा और उन्हें अपने कार्यस्थलों को छोड़कर पैदल चलकर अपने पैतृक स्थानों पर जाना पड़ा।
साल 2020 में भाजपा का बढ़ा नया जनाधार लेकिन किसानों के आंदोलन ने बढ़ाई चुनौतियां
ऐसे समय में जब कोविड-19 ने समाज और देश की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘‘आपदा’’ को ‘‘अवसर’’ में बदलने का आह्वान भाजपा के लिए फायदे का सौदा साबित हुआ।
इस आपदा काल में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की ओर से चलाए गए कल्याणकारी कार्यक्रमों, संगठनात्मक सामर्थ्य और वैचारिक अभियान की बदौलत भगवा दल ने वर्ष 2020 में नए क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाई।
कोरोना महामारी के चलते पूरे विश्व की सरकारों की साख गिरी और वे इस महामारी से जूझते नजर आए जबकि हर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई वहीं भारतीय राजनीति ने इस दौरान एक अलग ही कहानी लिखी।
कांग्रेस का जनाधार गुजर रहे साल में भी घटता ही गया और प्रधानमंत्री मोदी की अपील की बदौलत भाजपा शानदार ढंग से आगे निकलती गई। हालांकि जाते-जाते यह साल किसानों के आंदोलन के रूप में भाजपा के समक्ष एक बड़ी चुनौती पेश कर गया।
केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के एक बड़े समूह, खासकर पंजाब के किसानों ने आंदोलन आरंभ कर दिया। साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से किसानों का यह आंदोलन भाजपा सरकार के लिए सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती के रूप में सामने आई।
लंबे समय तक केंद्र व पंजाब में भाजपा के सहयोगी रहे शिरोमणि अकाली दल ने इस मुद्दे पर सरकार और सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से नाता तोड़ लिया । उसकी नेता हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ दे दिया। यह पहली बार हुआ जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में किसी भी गैर-भाजपा दल का प्रतिनिधित्व नहीं है।
बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड के खराब प्रदर्शन के बाद भाजपा के साथ उसके रिश्तों में वह मिठास नहीं है जो पहले हुआ करती थी। हाल ही में अरूणाचल प्रदेश में जदयू के सात में से छह विधायकों के भाजपा में शामिल हो जाने के बाद इस रिश्ते में और कड़वाहट ही आई है।
कोरोना महामारी के कारण बॉलीवुड को हुआ हजारों करोड़ रुपये का नुकसान
सभी क्षेत्रों की तरह यह साल भारतीय फिल्म उद्योग के लिए बहुत मुश्किल भरा रहा है। कोरोना वायरस महामारी के कारण लागू लॉकडाउन में निर्माण रुक गए, सिनेमाघरों के दरवाजे बंद हो गए, जिससे हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ और इस उद्योग से जुड़े हजारों लोग बेरोजगार हो गए।
कोरोना वायरस महामारी ने इस फलते-फूलते उद्योग के लिये साल 2020 में अप्रत्याशित चुनौती पेश की, जिससे मनोरंजन उद्योग पूरी तरह ठहर गया। हालांकि, कितना नुकसान हुआ है इसके कोई सटीक आंकड़े नहीं हैं लेकिन कुछ अंदरूनी सूत्रों का अनुमान है कि नुकसान 1500 करोड़ रुपये से लेकर ‘हजारों करोड़’ रुपये तक का हो सकता है। उन्होंने कहा कि सिंगल स्क्रीन थिएटरों को महीने का नुकसान 25 से 75 लाख रुपये के बीच हुआ होगा।
ट्रेड एनालिस्ट अमूल मोहन के मुताबिक, एक साल में करीब 200 हिंदी फिल्में बनती हैं और बॉलीवुड की सालाना बॉक्स ऑफिस कमाई 3,000 करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा ही होती है।
यह दोहरी मुश्किल की घड़ी है। एक ओर जहां फिल्में या अन्य मनोरंजन सामग्रियों का प्रदर्शन या तो टालना पड़ रहा है या फिर मजबूरन उन्हें ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया जा रहा है। वहीं, दूसरी ओर नौ महीनों बाद देश के कई हिस्सों में सिनेमाघर खुल तो गए हैं लेकिन अब भी लोग वहां फिल्में देखने जाने से कतरा रहे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए दर्शकों को लुभाने के लिए कोई नई फिल्म भी नहीं है।