Draupadi Murmu : ऐसा है मुर्मू का गांव.. विधायक बनीं तब सड़क-पुल बने, राष्ट्रपति प्रत्याशी बनीं तब आई बिजली
जिस तिमिर में अनंतकाल से कोई दीया भी न टिमटिमाया हो, वहां अचानक रोशनी का झरना फूट पड़े, तो लगता है कोई करिश्मा हुआ है। एक संथाल आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू का भारत का राष्ट्रपति बनना ऐसा ही करिश्मा है...
विस्तार
चंद दिन पहले तक आम गांव की श्रेणी वाला मुर्मू का गांव बेहद खास हो गया है। ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव की बेटी द्रौपदी देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति जो बनने जा रही हैं। बृहस्पतिवार शाम से ही यहां जश्न शुरू हो गया। मगर, आम से खास बने इस गांव की कहानी तमाम चुनौतियों का सामना करने वाले दूसरे तमाम गांवों की ही तरह है। हालांकि, स्थानीय लोगों को अपने दिन बहुरने की उम्मीद दिखने लगी है।
ग्रामीण बताते हैं, इस गांव की सड़कें तब बनीं थीं, जब द्रौपदी पहली बार विधायक चुनी गई थीं। तब ही गांव में पानी की पाइप बिछी। कान्हू नदी पर पुल बना। पशुओं का अस्पताल खुला। चंद दिनों पहले तक गांव के डुंगरीसाई मजरे के तीस से ज्यादा घरों के लोग लालटेन की रोशनी में रातें काटा करते थे। मुर्मू के राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी बनने पर यहां बिजली के बल्ब जले हैं। अब गांव में सरकारी अमले का आना-जाना बढ़ गया है और अधूरे विकास कार्यों में भी तेजी आई है।
गांव में काफी लोगों के पास पक्का मकान नहीं है। हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज 20 किमी दूर हैं। इससे सबसे ज्यादा मुश्किल लड़कियों को होती है। उन्हें इतनी दूर साइकिल या अन्य साधनों से जाना पड़ता है। यहां बैंक भी नहीं है। अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। लोग चाहते हैं कि उनके गांव में ही बैंक हो। हाईस्कूल को अपग्रेड कर इंटरमीडिएट कर दिया जाए। अस्तपाल में कम से कम 14 बेड की सुविधा हो जाए, जिससे लोगों को स्थानीय स्तर पर ठीक से इलाज मिल सके।
उपरबेड़ा में जश्न का माहौल
गांव में जश्न का माहौल है। मुर्मू का शपथ समारोह देखने के लिए बड़ी टीवी स्क्रीन लगाई गई हैं। ग्रामीणों का कहना है, दीदी के राष्ट्रपति बनने के बाद वे दीदी का नया घर राष्ट्रपति भवन देखना चाहते हैं। द्रौपदी के भाई तारणीसेन टूडू व परिजनों को बधाई देने वालों का तांता लगा है।
द्रौपदी को पुराना घर लगे प्यारा
द्रौपदी मुर्मू का जन्म खपरैल वाले घर में हुआ था। अब उसके बाहरी हिस्से में पक्का मकान बन गया है। द्रौपदी का कमरा आज भी वैसा ही है। लोग बताते हैं कि द्रौपदी को अपना पुराना घर अच्छा लगता है। वह अक्सर गांव आती रहती हैं।
पूर्ण शाकाहारी, खाने में ‘पखल’ पसंद
द्रौपदी के भाई तारणीसेन टूडू कहते हैं, दीदी को पानी से बनने वाला विशेष खाना ‘पखल’ बहुत पसंद हैं। वह पूरी तरह शाकाहारी हैं और लहसुन-प्याज तक नहीं खातीं।
आदिवासी बहुल 1.35 लाख गांवों में भाजपा मनाएगी जश्न
भाजपा देशभर के आदिवासी बहुल 1.35 लाख गांवों में मुर्मू की जीत का जश्न मनाएगी। सांसदों, विधायकों को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्हें अपने क्षेत्रों में यह संदेश देने के लिए कहा गया है कि भाजपा ने पहली बार आदिवासी समाज को देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचाया है।
लोकसभा की सौ सीटों व कई राज्यों पर असर
देश में सौ लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां आदिवासी वर्ग निर्णायक भूमिका में हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, प. बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक जैसे राज्यों में यह वर्ग प्रभावी है। भाजपा पहला लाभ गुजरात में लेना चाहती हैं, जहां इसी साल विधानसभा चुनाव हैं।
साधारण महिला... असाधारण शख्सियत
यह उस भारतीय समाज के लिए एक सुखद आश्चर्य है, जहां आज भी बेटियों को पराया धन मानकर चूल्हे-चौके में खटने की मानसिकता से पाला जा रहा है। यह एक मां की तितिक्षा, स्त्री की जीवटता व संघर्ष और समर्पित कार्यकर्ता के दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के शीर्ष पर पहुंचने की बेमिसाल कहानी है। मुर्मू का देश का प्रथम नागरिक बनना हर भारतीय के हृदय को गर्व और आत्मविश्वास से भरने वाला है।
जीवटता और संघर्ष की प्रतीक द्रौपदी मुर्मू के आम स्त्री से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के शीर्ष पद तक पहुंचने का बेमिसाल सफर
ओडिशा के मयूरभंज के उपरबेड़ा गांव में जन्मीं, बेहद साधारण पृष्ठभूमि से उभरकर रायसीना हिल्स स्थित बेहद खास भारत के राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने वाली द्रौपदी मुर्मू, सबसे कम उम्र की राष्ट्रपति व आजादी के बाद जन्मीं देश की पहली राष्ट्रपति जैसी वजहों से तो असाधारण हैं हीं, लेकिन दो जवान बेटों और पति को खोने के बाद भी खुद को संभाले रखना, अपने आदर्शों व मूल्यों पर अडिग रहना उन्हें अनोखा और अभेद्य बनाता है। उन्हें करीब से जानने वालों का कहना है कि दया और दायित्वों के प्रति अटूट समर्पण उनकी असल ताकत है।
ठेठ आदिवासी परिवार में जन्म
20 जून, 1958 को संथाल जनजाति के कबीलाई मुखिया बिरंची नारायण टूडू के घर जन्मीं द्रौपदी मुर्मू ने उपरबेड़ा गांव के ही स्कूल से प्राथमिक शिक्षा हासिल की। उनके शिक्षक रहे विश्वेश्वर मोहंती कहते हैं, नेतृत्व का गुण उनमें जन्मजात था, हालांकि वह देश के शीर्ष पद तक पहुंचेंगी, यह कल्पना भी नहीं की थी। स्नातक करने वाली गांव की पहली लड़की हैं।
प्रेम विवाह
कॉलेज के दौरान ही वह सहपाठी श्याम चरण मुर्मू से प्रेम करने लगीं। पिता को मालूम चला तो वे नाराज हुए। द्रौपदी और श्याम के धैर्य व संकल्प के आगे पिता को झुकना पड़ा और आदिवासी गांव में उनका प्रेम विवाह हुआ और वह भी धूमधाम से।
लिपिक के तौर पर शुरू किया कॅरिअर
1979 में भुवनेश्वर के रमादेवी कॉलेज से बीए पास करने के बाद मुर्मू रायरंगपुर के श्रीअरविंदो इंटिग्रल एजुकेशन सेंटर में शिक्षक रहीं। इसके बाद सिंचाई और ऊर्जा विभाग में कनिष्ठ सहायक बनीं।
जनसेवा को बनाया जीवन
एक दशक सरकारी नौकरी के बाद उन्होंने 1997 में जनसेवा को ही जीवन बनाने का फैसला किया। ओडिशा में 1990 के दशक में पंचायतीराज व्यवस्था लागू होने के बाद उनके दादा और पिता दोनों गांव के सरपंच रहे। सियासत से मुर्मू का बस इतना ही परिचय था। वे रायरंगपुर नगर पंचायत के चुनाव में पार्षद चुनी गईं और नगर पंचायत की उपाध्यक्ष बनीं।
- 2000 और 2009 में रायरंगपुर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर विधायक भी बनीं। 2000 से 2004 तक नवीन पटनायक के मंत्रिमंडल में स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री रहीं। वाणिज्य, परिवहन, मत्स्य पालन व पशु संसाधन जैसे मंत्रालय संभाले।
- 2006 में भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चे की प्रदेश अध्यक्ष बनीं।
सरकार नहीं...जनता की राज्यपाल बनीं
2015 में जब वह राज्यपाल बनीं, तो उन्होंने राजभवन जनता के लिए खोल दिया। झारखंड के हजारों लोंगों के पास ऐसी कहानियां हैं, जिनमें मुर्मू ने उनकी मदद की। सत्ता पक्ष और विपक्ष को समभाव से देखते हुए वह हमेशा विवादों से दूर रहीं। 2017 में भाजपा सरकार के सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक को आदिवासियों के खिलाफ बताकर वापस लौटा दिया था। ऐसे मौके विरले ही होते हैं, जब अपनी ही पार्टी की सरकार के विधेयकों को कोई राज्यपाल इस तरह से लौटा दे।
अंतहीन पीड़ा
द्रौपदी मुर्मू का व्यक्तिगत जीवन अंतहीन पीड़ा से भरा है। 2010 से 2014 के बीच उनके दो बेटों और पति की मौत हो गई। बड़े बेटे लक्ष्मण की मौत रहस्यमयी ढंग से घर में ही हुई। 2012 में एक सड़क हादसे में छोटे बेटे बिरंची की मौत हो गई और 2014 में पति श्याम चरण मुर्मू की मौत हुई। इन हादसों के बाद मुर्मू ने गांव के अपने घर को बोर्डिंग स्कूल में बदल दिया। गांव वाले बताते हैं, 1984 में भी उनकी पहली संतान की तीन वर्ष की उम्र में मौत हो गई थी।
...अध्यात्म की ओर
रायरंगपुर में ब्रह्मकुमारी संस्थान की मुखिया सुप्रिया के मुताबिक, बेटों और पति को खोने के बाद वह अवसाद से बचने के िलए ध्यान करने लगीं। रोज सुबह 3:30 बजे बिस्तर छोड़ देती हैं और योग व ध्यान जरूर करती हैं।
नौ लाख जमापूंजी चार लाख देनदारी
2009 में मुर्मू दूसरी बार विधायक बनीं, उनके पास कुल जमापूंजी नौ लाख रुपये थी, जिस पर चार लाख रुपये की देनदारी थी। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ विधायक का नीलकंठ पुरस्कार जीता, यही उनकी असल पूंजी रही। उन्होंने देनदारियों को खत्म करने के लिए जमीन तक बेच दी थी। चुनावों में रसूख व धनबल की कड़वी हकीकत के बीच मुर्मू जैसे जनप्रतिनिधि सही मायनों में लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।
बधाइयों का सिलसिला
मैं नव निर्वाचित राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को बधाई देती हूं। मैं उनसे जल्द मुलाकात की उत्सुक हूं। - सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष
देश आपकी ओर गंभीरता से देखेगा कि संविधान के आदर्शों की रक्षा करें और लोकतंत्र की संरक्षक बनें। -ममता बनर्जी, सीएम, प. बंगाल
हार्दिक बधाई... राष्ट्रपति के रूप में आपके कार्यकाल की सफलता की कामना करता हूं। -शरद पवार, प्रमुख, एनसीपी
द्रौपदी जी को सर्वोच्च पद पर चुने जाने पर उनसे भेंट कर उन्हें बधाई दी। राष्ट्रपति चुनाव में उनकी प्रचंड विजय पर पूरा देश जश्न मना रहा है। -अमित शाह, गृहमंत्री
स्वर्णिम क्षण... आपकी दक्षता एवं अनुभव से राष्ट्र को अप्रतिम लाभ मिलेगा। -जेपी नड्डा, अध्यक्ष, बीजेपी
द्रौपदी मुर्मू जी गांव, गरीब, वंचितों के साथ झुग्गी-झोपड़ियों में भी लोक कल्याण के लिए सक्रिय रही हैं। वे सर्वोच्च सांविधानिक पद तक पहुंची हैं। यह भारतीय लोकतंत्र की ताकत का प्रमाण है। -राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री