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कानून के समक्ष समानता: सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस बोले- तकनीक अब सांविधानिक साधन, न्याय तक पहुंच करती है मजबूत

एजेंसी, नई दिल्ली। Published by: Jyoti Bhaskar Updated Sun, 12 Apr 2026 01:29 AM IST
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सार

कानून के समक्ष समानता को लेकर चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा है कि तकनीक अब सांविधानिक साधन बन चुका है। इससे न्याय तक पहुंच मजबूत होती है। उन्होंने कहा, न्याय प्रणाली में सुधार का पैमाना यह है कि नागरिक, वकील और अन्य इससे कितने लाभान्वित हो रहे हैं।

Equality Before the Law CJI surya kant Says Technology Now Constitutional Tool Strengthens access to Justice
चीफ जस्टिस सूर्यकांत - फोटो : एएनआई
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि तकनीक अब केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि एक सांविधानिक साधन बन गई है। यह न्यायपालिका में समानता, समयबद्ध न्याय और पारदर्शिता को बढ़ावा देकर क्षेत्रीय तथा भौतिक बाधाओं को तोड़ते हुए कानून के समक्ष समानता को मजबूत करती है।

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सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत शनिवार को न्यायिक प्रक्रिया पुनर्रचना और डिजिटल परिवर्तन पर राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि किसी भी न्याय प्रणाली के मूल में एक सरल लेकिन स्थायी वादा निहित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति, चाहे उसके साधन या परिस्थितियां कुछ भी हों, निष्पक्ष, समयबद्ध और प्रभावी ढंग से न्याय प्राप्त करने में सक्षम होना चाहिए। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और जितिन प्रसाद की मौजूदगी में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों, न्यायिक अधिकारियों, हाईकोर्ट के न्यायाधीशों और जिला न्यायाधीशों से सीजेआई ने कहा कि न्याय प्रणाली में सुधार का पैमाना यह है कि नागरिक, वकील और अन्य हितधारक इससे कितने सार्थक रूप से लाभान्वित हो पाते हैं।
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हर कोर्ट एकीकृत न्यायालय के रूप में करे कार्य
उन्होंने कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक न्यायालय एक एकीकृत डिजिटल न्यायालय के रूप में कार्य करे, जो न केवल हाइब्रिड सुनवाई की सुविधाओं से सुसज्जित हो, बल्कि पूरी तरह से कागज-रहित न्यायालय के रूप में कार्य करने में भी सक्षम हो। तकनीक अब एक सांविधानिक साधन बन गई है। यह अब केवल एक प्रशासनिक सुविधा मात्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा उपकरण है जो कानून के समक्ष समानता को सुदृढ़ करता है, न्याय तक पहुंच का विस्तार करता है और न्यायपालिका को प्रक्रियागत कठोरताओं से ऊपर उठने में सक्षम बनाता है।

ई-कमेटी सक्रियता से डिजिटल आधार तैयार कर रही
उन्होंने कहा कि मूल रूप से डिजिटल इकोसिस्टम बनाने के लिए उनका एक बड़ा विजन है, एक ऐसा भविष्य, जहां न्याय केवल वह जगह न हो जहां कोई जाता है, बल्कि एक ऐसी सेवा हो जो निर्बाध, पारदर्शी और हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध हो। मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि अब यह केवल दूर के भविष्य की कोई आकांक्षा मात्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा कार्य है जो पहले से ही प्रगति पर है। ई-कमेटी सक्रिय रूप से एक डिजिटल आधार तैयार कर रही है, जो तकनीक को किसी मामले के पूरे जीवनचक्र में सेवा प्रदान करने और न्याय वितरण प्रणाली के प्रत्येक हितधारक को एकीकृत करने में सक्षम बनाएगा।

ई-सेवा केंद्र निभा रहे अहम भूमिका
उन्होंने कहा कि भारत जैसे सामाजिक और भौगोलिक रूप से विविध देश में डिजिटलीकरण तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक उसके साथ वास्तविक पहुंच भी न हो। इस संबंध में 2,331 ई-सेवा केंद्रों की स्थापना ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये केंद्र मामले की स्थिति जानने में सहायता प्रदान करते हैं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा देते हैं और उन लोगों को सहयोग देते हैं जिन्हें डिजिटल सिस्टम का इस्तेमाल करना मुश्किल लगता है। उन्होंने कहा कि ये पहलें यह सुनिश्चित करेंगी कि डिजिटल न्याय तक पहुंच किसी व्यक्ति की संपत्ति या भाषाई दक्षता पर निर्भर न हो। प्रौद्योगिकी को भौतिक और आर्थिक बाधाओं से ऊपर उठना चाहिए और यही हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत बना रहना चाहिए।

एआई और नई तकनीक के इस्तेमाल में मानवीय संवेदना जरूरी
उन्होंने कहा कि जैसे ई-कोर्ट्स, डिजिटल फाइलिंग जैसी तकनीक ने न्याय प्रणाली को अधिक सुलभ और नागरिक-केंद्रित बना दिया है, जिससे यह संविधान की मूल भावना के अनुरूप काम करती है। डिजिटल उपकरण दूर-दराज के क्षेत्रों के लोगों को भी न्यायिक प्रक्रिया में भाग लेने में सक्षम बनाते हैं। उन्होंने ई-कोर्ट्स के तीसरे चरण की शुरुआत का जिक्र करते हुए कहा कि ई-प्रिज़न और डिजिटल समन जैसी तकनीकें न्याय वितरण को कुशल बनाती हैं। साथ ही कहा कि एआई और नई तकनीक का उपयोग करते समय मानवीय संवेदनाओं को बरकरार रखना भी आवश्यक है।

कानूनों और अदालती आदेशों में स्पष्टता से उनका सुचारू क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा: मेघवाल
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि जीवन की सुगमता, व्यापार की सुगमता और न्याय की सुगमता के तीन सिद्धांतों को हासिल करने के लिए लोगों को कानून, कानूनी दस्तावेज और अदालती आदेशों को समझने में सक्षम होना चाहिए। कानूनों, कानूनी दस्तावेज और अदालती फैसलों में स्पष्टता से उनका कार्यान्वयन अधिक सुचारू रूप से हो सकेगा। उन्होंने कहा कि विभिन्न परियोजनाओं के लिए आवंटित निधियों के समय पर उपयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय ई-कोर्ट प्रणाली की प्रगति धीमी हो सकती है, लेकिन इससे संबंधित पक्षों को हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। इसे तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि महत्वाकांक्षी ई-कोर्ट्स परियोजना का तीसरा चरण कार्यान्वयन के अधीन है। इसका उद्देश्य अदालती दस्तावेज का डिजिटलीकरण करना और निचली न्यायपालिका के डिजिटलीकरण को उन्नत बनाना है।

सुलह-समझौता आधुनिक और जवाबदेह न्याय प्रणाली के अभिन्न अंग : जस्टिस नागरत्ना
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि मध्यस्थता और सुलह-समझौता आधुनिक और जवाबदेह न्याय प्रणाली के अभिन्न अंग हैं और इन्हें केवल पारंपरिक मुकदमेबाजी के विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना भारतीय मध्यस्थता परिषद के वैश्वीकरण के युग में मध्यस्थता विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रही थीं। उन्होंने कहा कि विवाद केवल कानूनी सवाल ही नहीं होते, बल्कि सामाजिक, वाणिज्यिक और आपसी संबंधों से जुड़े प्रश्न भी होते हैं। इनके समाधान के लिए अदालत के निर्णय की तुलना में अधिक स्वैच्छिक उपायों की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में मध्यस्थता और सुलह-समझौता केवल मुकदमेबाजी के विकल्प मात्र नहीं हैं, बल्कि एक आधुनिक और संवेदनशील न्याय प्रणाली के अभिन्न अंग हैं। उन्होंने कहा कि विवादों के समाधान के पारंपरिक तरीकों से हटकर अब मध्यस्थता और पंचनिर्णय जैसी वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) व्यवस्थाओं की ओर एक स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है।

उन्होंने कहा कि सीमापार वाणिज्यिक विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता सबसे पसंदीदा तरीका बनकर उभरा है, क्योंकि इसमें निष्पक्ष मंच, प्रक्रियागत लचीलापन, गोपनीयता और पक्षों की स्वायत्तता जैसे लाभ मिलते हैं। इसके लाभ अर्थात निष्पक्ष मंच, प्रक्रियात्मक लचीलापन, गोपनीयता, पक्षों की स्वायत्तता और अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत निर्णयों की प्रवर्तनीयता ने इसे वैश्विक वाणिज्य में पेशेवरों के लिए अपरिहार्य बना दिया है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रभावशीलता न्यूयॉर्क कन्वेंशन से और मजबूत होती है, जिसके तहत मध्यस्थता निर्णयों को 170 से अधिक अधिकार-क्षेत्रों में मान्यता दी जा सकती है और उन्हें लागू किया जा सकता है।

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