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आखिर इच्छामृत्यु क्या है: हरीश राणा से जुड़ी प्रक्रिया में कितने दिन लगेंगे, ऐसे मामलों में आगे राह क्या होगी?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Mon, 16 Mar 2026 08:26 PM IST
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सार
प्राचीन काल में इच्छामृत्यु को केवल एक चिकित्सकीय विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक नजरिए से देखा जाता था। इसके कुछ प्रमाण भी मिलते हैं। दर्द से मुक्ति और सही-गलत के बीच का यह द्वंद्व सदियों पुराना है। इसी बीच, देश में इच्छामृत्यु का एक मामला सामने आया है। जानिए, इसका इतिहास और आगे की राह...
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Harish Rana Passive Euthanasia Case know the process Court Order and Guidelines History Aruna Shanbaug news
हरीश राणा मामले में इच्छामृत्यु की नींव रखने वाले अदालती फैसले। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गाजियाबाद जिले का साहिबाबाद और यहां रहने वाले हरीश राणा। वही हरीश राणा, जिन्हें इच्छामृत्यु की सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिली है। उन्हें अंतिम विदाई देने से जुड़ी प्रक्रियाएं शुरू हो चुकी हैं। यह अपनी तरह का पहला मामला है। हरीश राणा की तस्वीरें और उनके परिवार की बातें भावुक कर देने वाली हैं। इस बीच, दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में हरीश के पैसिव यूथेनेशिया यानी असक्रिय इच्छामृत्यु दिए जाने का पहला चरण रविवार से शुरू हुआ। इस दिन उन्हें घर से एम्स लाया गया। परिवारजनों से आखिरी मुलाकात कराई गई। अब धीरे-धीरे हरीश को जिंदा रखने वाली जीवनरक्षक प्रणालियों को हटाया जाएगा। 


हरीश की इच्छामृत्यु को सर्वोच्च अदालत से मंजूरी मिलने के बाद भारत में एक बड़ी बहस शुरू हो गई। यह बहस है इच्छामृत्यु की मान्यता और इसके कानूनी प्रावधानों को लेकर। दरअसल, इससे पहले भारत की अदालतों में इच्छामृत्यु की मांग से जुड़े कई मामले आए। इन सभी मामलों में कोर्ट से इच्छामृत्यु की इजाजत नहीं मिली। हालांकि, अब हरीश राणा केस में इच्छामृत्यु की इजाजत दिए जाने के बाद इससे जुड़े नियमों पर बहस शुरू हो गई है। 


आइये जानते हैं कि यह निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने अब इसकी इजाजत क्यों दी है? अदालत के इस फैसले के बाद देश में इच्छामृत्यु का रास्ता कितना आसान या कठिन है? 

क्या है निष्क्रिय इच्छामृत्यु? साधारण इच्छामृत्यु से कितनी अलग?

इच्छामृत्यु का मतलब है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना जो किसी असाध्य या लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो। इस तरह की मृत्यु को मंजूरी देने का प्राथमिक उद्देश्य यही रखा गया था कि बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को असहनीय शारीरिक पीड़ा और कष्ट से मुक्ति मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट ने जिस निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मंजूरी दी, वह क्या है?

इच्छामृत्यु को मुख्यतः दो तरह से बांटा जाता है। एक- सक्रिय इच्छामृत्यु और दूसरी निष्क्रिय इच्छामृत्यु। 

1. सक्रिय इच्छामृत्यु

सक्रिय इच्छामृत्यु यानी एक्टिव यूथेनेशिया। इसमें मरीज की मृत्यु को संभव करने के लिए सीधे तौर पर कोई सक्रिय कदम उठाया जाता है। उदाहरण के लिए- मरीज को कोई घातक पदार्थ या इंजेक्शन (जैसे सोडियम पेंटोथोल) देना। इससे व्यक्ति को कुछ ही सेकंड में गहरी नींद आ जाए और उसकी नींद में ही दर्द रहित मृत्यु हो जाए। 

2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु

निष्क्रिय इच्छामृत्यु यानी पैसिव यूथेनेशिया। इसमें मरीज के जीवन को लंबे समय तक बनाए रखने वाले जरूरी चिकित्सा उपचार को रोक दिया जाता है या हटा लिया जाता है। इसमें डॉक्टर सक्रिय रूप से मरीज को मारते नहीं हैं, बल्कि वे जीवन बचाने वाले इलाज या प्रणालियों को रोक देते हैं। उदाहरण के लिए- जीवन रक्षक प्रणालियों जैसे वेंटिलेटर, कृत्रिम तौर पर जिंदा रखने की तकनीक या दवाओं को हटा लेना ताकि मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त कर सके।


हरीश राणा मामले में कैसे पूरी की जा रही प्रक्रिया?

हरीश राणा के मामले में जीवन रक्षक प्रणालियों को हटाने के लिए भारत का पहला विशेष मेडिकल प्रोटोकॉल अपनाया जा रहा है। 

  • विशेषज्ञ मेडिकल टीम का गठन: इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. सीमा मिश्र के नेतृत्व में एक विशेष टीम बनाई गई है। इस टीम में न्यूरोसर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया, पैलिएटिव केयर और मनोरोग विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हैं।
  • उपचार को धीरे-धीरे हटाना: डॉ. सुषमा भटनागर के मुताबिक, इस प्रक्रिया में अचानक सब कुछ बंद करने के बजाय कृत्रिम पोषण, ऑक्सीजन और अन्य दवाओं जैसे जीवन रक्षक उपायों को धीरे-धीरे रोका या वापस लिया जाता है।
  • दर्द निवारण: यह सुनिश्चित करने के लिए कि मरीज को इस दौरान किसी भी प्रकार की शारीरिक परेशानी, घबराहट या दर्द न हो, उसे पर्याप्त दर्द निवारक दवाएं और 'पैलिएटिव सिडेशन' (गहरी नींद या बेहोशी की दवा) दिया जाता है। डॉक्टरों का स्पष्ट उद्देश्य मृत्यु को जल्दी लाना या जीवन को अनावश्यक रूप से बढ़ाना नहीं है, बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से प्राकृतिक मृत्यु होने देना है।
  • प्रक्रिया में लगने वाला समय: न्यूज एजेंसी पीटीआई के सूत्रों के मुताबिक, हरीश के मामले में जीवन रक्षक प्रणालियों को पूरी तरह से हटाने और इस प्रक्रिया को पूरे होने में दो से तीन हफ्ते तक का समय लग सकता है।

दुनियाभर में इच्छामृत्यु का क्या इतिहास रहा?

प्राचीन काल

प्राचीन काल में मृत्यु को चिकित्सा के बजाय सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाता था। होमर के प्रसिद्ध महाकाव्य 'इलियड', जो कि लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व में रचा गया था, इसमें घायल योद्धाओं के दर्द को खत्म करने के लिए दया मृत्यु या इच्छा मृत्यु मांगने का जिक्र मिलता है। 

भारत में भी पुराने हिंदू ग्रंथों में तपस्वियों के लिए प्रायोपवेश (आमरण अनशन या व्रत द्वारा प्राण त्यागना) पारंपरिक चलन में था। इसका जिक्र महाभारत में भी मिलता है। 

दूसरी तरफ सुदूर यूनान में दार्शनिक प्लेटो ने अपनी किताब रिपब्लिक में असाध्य रूप से बीमार लोगों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था। हालांकि, लगभग 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली हिप्पोक्रेटिक ओथ ने सक्रिय इच्छामृत्यु को यह कहते हुए प्रतिबंधित कर दिया कि डॉक्टर किसी भी मरीज के मांगने पर उसे घातक दवा नहीं देंगे। 

रोमन साम्राज्य में सेनेका जैसे विचारकों ने असाध्य रोगियों के लिए तार्किक आत्महत्या की प्रशंसा की, जबकि चिकित्सक गैलेन ने उपचार रोक कर (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) मृत्यु का समर्थन किया।

मध्यकाल 

दुनियाभर में ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को सख्त रूप से वर्जित कर दिया गया। ऑगस्टीन और थॉमस एक्विनास ने इसे हत्या के समान और ईश्वर के विरुद्ध बताया। यहूदी धर्म में भी केवल अप्रत्यक्ष रूप से मृत्यु को आसान बनाने की अनुमति थी।

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19वीं और 20वीं सदी

19वीं सदी में मेडिकल साइंस (सर्जरी और एनेस्थीसिया) के विकास के बाद यह बहस फिर से शुरू हुई। 1870 में सैमुअल डी. विलियम्स ने अंतिम अवस्था वाले मरीजों के लिए क्लोरोफॉर्म के इस्तेमाल का सुझाव दिया। 

20वीं सदी में, नाजी जर्मनी के टी4 प्रोग्राम चलाया गया। 1939-1945 के बीच नाजियों ने इस इच्छामृत्यु की अवधारणा का गलत इस्तेमाल किया और यहूदियों की बड़े पैमाने पर हत्याएं की गईं। नाजियों का दावा था कि उन्होंने तीन लाख तथाकथित अयोग्य और मंदबुद्धि लोगों को गैस चैंबर में भेजकर मारा है। इसके बाद पूरी दुनिया में इच्छामृत्यु को लेकर डर पैदा हो गया। हालांकि, इसके बाद दुनियाभर में इच्छामृत्यु को लेकर सुधार की लहर चली और ब्रिटेन में 1935 में 'वॉलंटरी यूथेनेशिया सोसाइटी' का गठन हुआ।

क्या दुनिया में अब कहीं मान्य है इच्छामृत्यु?

जर्मनी में इच्छामृत्यु को लेकर जो नरसंहार की घटनाएं हुईं, उसके बाद इसे मंजूरी देने पर लंबे समय तक बहस जारी रही। हालांकि, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के उदय के साथ इच्छामृत्यु को कानूनी अधिकार मिलने लगे। इस ओर सबसे पहला कदम ऑस्ट्रेलिया में उठाया गया, जहां नॉर्दर्न टेरिटरी ने 'राइट्स ऑफ द टर्मिनली इल' कानून पारित किया, जिसके तहत कुछ मरीजों को इच्छामृत्यु दी गई। हालांकि इसे बाद में रद्द कर दिया गया। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया की ओर से की गई पहल को बाद में कई देशों ने अपनाया। 

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1. कौन से देशों में इच्छामृत्यु को मान्यता?

नीदरलैंड ने 2001 और बेल्जियम ने 2002 में स्पष्ट नियमों और दिशा-निर्देशों के साथ सक्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी रूप से वैध किया है। बेल्जियम और लक्जमबर्ग (2010) ने इस अधिकार को नाबालिगों के लिए भी विस्तारित किया है। 

कनाडा ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया गया था, जिसके तहत वर्ष 2024 में 15,300 से अधिक इच्छामृत्यु के मामले (कुल मौतों का 4.7%) सामने आए। 
स्विट्जरलैंड में 1942 से ही सहायता प्राप्त आत्महत्या को कानूनी मान्यता प्राप्त है, जिसका संचालन डिग्निटास जैसी संस्थाएं करती हैं।

अमेरिका के ओरेगन राज्य ने 1997 में ही डेथ विद डिग्निटी एक्ट लागू कर दिया था। 2026 की स्थिति के अनुसार, अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में यह मॉडल मान्य है, जबकि 40 राज्यों में इस पर सख्त प्रतिबंध है।
एशिया में जापान जीवन रक्षक प्रणालियों को हटाने यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देता है।

अन्य देश: स्पेन (2021), ऑस्ट्रिया (2022), ऑस्ट्रेलिया (2017), न्यूजीलैंड (2021 में जनमत संग्रह द्वारा), कोलंबिया (2014) और इक्वाडोर (2024) में भी सहायता प्राप्त मृत्यु के विभिन्न रूपों को कानूनी अनुमति मिली हुई है। जर्मनी में 2020 से सहायता प्राप्त मृत्यु की अनुमति है।

स्कैंडिनेवियाई देश: स्वीडन और नॉर्वे जैसे देशों में मरीजों की स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए कुछ सख्त शर्तों के साथ डॉक्टरों की मदद से मृत्यु की अनुमति देते हैं।

2. इच्छामृत्यु पर कहां-कहां सख्त प्रतिबंध?

फ्रांस और ब्रिटेन में भी सक्रिय रूप से मृत्यु देने के बजाय मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए सिडेशन (नशे वाली दवाओं से दर्द दूर करना) और बेहतर देखभाल को प्राथमिकता दी जाती है।
 

भारत में इच्छामृत्यु पर क्या स्थिति, पुराने मामले क्या?

भारत में इच्छामृत्यु को अब तक प्रतिबंधित रखा गया था। दरअसल, भारत का संविधान अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार (राइट टू लाइफ) की पूर्ण मान्यता देता है। ऐसे में मृत्यु का अधिकार जीवन के अधिकार के बिल्कुल उलट है। भारत में इस संवैधानिक पेंच की वजह से लंबे समय तक इच्छामृत्यु पर बहस जारी रही है। देश की हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इच्छामृत्यु की मांग वाली याचिकाएं दायर हुईं। हालांकि, कोर्ट इन मांगों को नकारती आई है। हालांकि, दो मामलों ने इस स्थिति को बदला है।

1. अरुणा शानबाग केस

2011 के अरुणा शानबाग मामले के बाद स्थिति काफी बदली है। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि अरुणा शानबाग नाम की एक महिला, जो कि मुंबई के केईएम अस्पताल में एक नर्स थीं, उन पर 1973 में दुष्कर्म के दौरान एक क्रूर हमला हुआ था। इसके कारण उनके मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक गई और वह 40 से अधिक वर्षों तक 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' यानी अचेत अवस्था में रहीं। 

2009 में पत्रकार पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर अरुणा को भोजन देना बंद करने और उन्हें शांति से मृत्यु देने की मांग की। मार्च 2011 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भारत में इच्छामृत्यु पर अदालत के रुख को कई तरीकों से बदल दिया।

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निष्क्रिय इच्छामृत्यु को ऐतिहासिक मंजूरी: इस मामले से पहले भारत में इच्छामृत्यु की अनुमति देने वाला कोई कानून नहीं था। हालांकि, दो जजों की पीठ (जस्टिस मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र) ने अपने ऐतिहासिक फैसले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी अनुमति दे दी। अदालत ने माना कि अचेत अवस्था जैसी स्थिति वाले मरीजों के जीवन रक्षक उपचार को कुछ सख्त शर्तों के तहत हटाया जा सकता है।

सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बीच स्पष्ट अंतर: अदालत ने स्पष्ट किया कि मरीज को कोई घातक इंजेक्शन या दवा देकर उसकी जान लेना (सक्रिय इच्छामृत्यु) भारत सहित दुनिया के कई देशों में अपराध है। अदालत ने कहा कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर सक्रिय रूप से मरीज को मारते नहीं हैं, बल्कि वे केवल जीवन रक्षक प्रणालियों को रोक देते हैं, जिसे अपराध नहीं माना जा सकता।

दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश: अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए एक कड़ी प्रक्रिया तय की। इसके तहत...
  • किसी भी मामले में संबंधित हाईकोर्ट में याचिका दायर करनी होगी, जहां कम से कम दो जजों की बेंच इस पर फैसला करेगी। 
  • बेंच तीन प्रतिष्ठित डॉक्टरों (जिसमें न्यूरोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक और फिजिशियन हों) की एक मेडिकल कमेटी नियुक्त करेगी, जो मरीज की स्थिति की जांच कर रिपोर्ट देगी।
  • राज्य, मरीज के करीबी रिश्तेदारों या उनके न होने पर मरीज के सबसे करीबी मित्र, जो उसके लिए फैसले कर सकें, को नोटिस जारी करेंगे।

अदालत ने इस मामले में अरुणा की दोस्त और याचिकाकर्ता पिंकी विरानी के बजाय केईएम अस्पताल के कर्मचारियों को अरुणा का करीबी दोस्त माना, क्योंकि वे 40 वर्षों से दिन-रात उनकी देखभाल कर रहे थे। अस्पताल के कर्मचारियों की इच्छा थी कि अरुणा जीवित रहें। इसलिए अदालत ने अरुणा पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु लागू करने से इनकार कर दिया और उन्हें प्राकृतिक मृत्यु तक जीने दिया। 

इस मामले में अरुणा शानबाग के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी गई, लेकिन इसी मामले ने भारत में इस बहस को एक नई दिशा दी और न्यायिक निगरानी के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु को एक वैध कानूनी विकल्प के रूप में स्थापित कर दिया।

और किन फैसलों ने भारत में इच्छामृत्यु पर मजबूत किए फैसले

1. कॉमन कॉज केस (2018)

अरुणा शानबाग मामले के अलावा 2018 का सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला बेहद अहम रहा। यह याचिका एक एनजीओ कॉमन कॉज की ओर से दाखिल की गई थी। इस केस में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में गरिमापूर्ण मृत्यु को अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार के तहत मौलिक अधिकार माना। यानी गरिमापूर्ण मृत्यु को जीवन का अधिकार करार दिया गया। 

इसके तहत मरीजों को लिविंग विल (जिंदा घोषणा) का अधिकार मिला। इसका मतलब है कि कोई भी सक्षम व्यक्ति पहले से यह लिखित निर्देश दे सकता है कि अगर भविष्य में वह किसी ऐसी लाइलाज स्थिति में पहुंच जाए जहां उसके ठीक होने की कोई उम्मीद न हो, तो उसे कृत्रिम जीवन रक्षक समर्थन (जैसे वेंटिलेटर) पर न रखा जाए।


2. एमएआरएस रेवती केस (2023)

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में लिविंग विल बनाने की जटिल नोटरी प्रक्रिया को आसान कर दिया, ताकि आम लोग भी अपनी इच्छा के अनुसार अंतिम समय पर इलाज को लेकर फैसला ले सकें। 
 

3. सरकार ने बीएनएस के जरिए इच्छामृत्यु को बनाया आसान

केंद्र सरकार ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 के तहत 'आत्महत्या के प्रयास' को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। इसे पहले आईपीसी की धारा 309 के तहत इसे अपराध माना गया था। यानी बीएनएस के जरिए इच्छामृत्यु को एक कानूनी सहारा मिला। विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार का विचार यही था कि इसे सजा के बजाय मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में देखा जाए। हालांकि, आत्महत्या के लिए उकसाना (बीएनएस की धारा 108) अभी भी अपराध है, जिसमें 10 साल तक की कैद हो सकती है।

4. संसद में अब तक लंबित है इससे जुड़ा विधेयक

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से लंबे समय तक इच्छामृत्यु को मंजूरी नहीं दी गई। दरअसल, कोर्ट का कहना था कि संविधान और लोकहित से जुड़े मामलों पर संसद में कानून बनना चाहिए और इसके बाद ही बदलाव लागू होने चाहिए। हालांकि, अलग-अलग सरकारों में इस मुद्दे को ज्यादा तूल नहीं दिया गया। 

संसद में 2016 में 'मेडिकल ट्रीटमेंट ऑफ टर्मिनली इल पेशेंट्स बिल' लाया गया था, जो अब तक लंबित है। इसलिए मौजूदा समय में भी सुप्रीम कोर्ट की ओर से अलग-अलग केसों के जरिए तय किए गए दिशा-निर्देश ही कानून के रूप में लागू हैं।

इच्छामृत्यु पर भारत में चिंताएं क्यों?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का स्वास्थ्य ढांचा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील मुद्दे को संभालने के लिए तैयार नहीं है। पैलियम इंडिया की स्मृति राणा का कहना है कि मरीजों को लाइलाज बीमारी या असहनीय दर्द वाली समस्याओं से निपटने के लिए बेहतरीन दर्द निवारक देखभाल मिलनी चाहिए, ताकि चिकित्सा की कमी के कारण वे मजबूरी में इच्छामृत्यु का रास्ता न चुनें।

2025 में एक कार्यक्रम के दौरान नेफ्रॉन क्लीनिक के चेयरमैन डॉ. संजीव बगाई ने भारत में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता देने का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने तर्क दिया था कि भारत जैसे देश में इसका भारी दुरुपयोग हो सकता है, क्योंकि यहां ऐसी मजबूत प्रणाली का अभाव है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यह निर्णय किसी बाहरी दबाव के बिना लिया गया है। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में, जहां परिवार भारी मेडिकल बिलों से जूझ रहे होते हैं, वहां मरीजों पर इच्छामृत्यु का दबाव डाला जा सकता है। इसके अलावा, संपत्ति हड़पने के लिए रिश्तेदारों द्वारा डॉक्टरों के साथ साजिश रचने का भी गंभीर खतरा रहता है।


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