Supreme Court: बंगाल में ED रेड में अड़चन मामले पर सुनवाई; 'इंडस्ट्री की परिभाषा' मुद्दा नौ जजों की पीठ के पास
पश्चिम बंगाल में तलाशी लेने गई केंद्रीय जांच एजेंसी- प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों को रोके जाने का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। बंगाल सरकार के अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने ईडी के अफसरों की छापेमारी के दौरान अड़चन पैदा करने की कोशिश की। बता दें कि इस मामले में खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम भी सुर्खियों में रहा है। दरअसल, ईडी के अधिकारी जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) का काम देखने वाली कंपनी- आई-पैक के ठिकानों पर तलाशी लेने गए थे, उसी समय खुद सीएम ममता बनर्जी मौके पर पहुंची थीं। राज्य के प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दल- भाजपा ने आरोप लगाया है कि ममता बनर्जी ने अहम कागजात अपने पास रख लिए, जिससे ईडी की कार्रवाई में बाधा पहुंची। अब पूरा मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट प्रवर्तन निदेशालय (डीई) की उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य लोगों पर छापेमारी में बाधा डालने का आरोप लगाया गया है।
इंडस्ट्री की परिभाषा के दायरे में कौन से उद्योग? नौ जजों की पीठ करेगी फैसला
89 साल पुराने कानून के आधार पर तय की गई परिभाषा के मुद्दे पर भी सुप्रीम कोर्ट को अहम फैसला सुनाना है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत 'उद्योग' यानी इंडस्ट्री शब्द की परिभाषा से संबंधित विवादास्पद मुद्दे पर सुनवाई के लिए नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ गठित की गई है। कोर्ट को इस जटिल सांविधानिक मुद्दे पर अपना फैसला सुनाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ नगर निगम को निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ नगर निगम को निर्देश दिया कि वह विधि अधिकारी पद के लिए दो अभ्यर्थियों को समायोजित करने के लिए एक अतिरिक्त पद बनाए। अदालत ने पाया कि भर्ती परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न के दोनों अभ्यर्थियों के उत्तर सही माने जा सकते हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच चरण प्रीत सिंह की ओर से दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस अपील में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें एक अन्य अभ्यर्थी अमित कुमार शर्मा के पक्ष में निर्णय दिया गया था। मामला लिखित परीक्षा के एक बहुविकल्पीय प्रश्न के उत्तर को लेकर विवाद से जुड़ा था। विवाद परीक्षा के प्रश्न संख्या 73 को लेकर था, जिसमें पूछा गया था- संविधान की निम्नलिखित में से कौन-सी अनुसूची मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से मुक्त है?
भर्ती करने वाली संस्था ने 'नौवीं अनुसूची' को सही उत्तर माना था, जबकि शर्मा ने 'उपरोक्त में से कोई नहीं' विकल्प चुना था। इसके कारण उन्हें नेगेटिव मार्किंग का सामना करना पड़ा और उनकी कुल मेरिट प्रभावित हुई। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जजों के बीच भी सही उत्तर को लेकर मतभेद था। ऐसे में अभ्यर्थियों से इस जटिल सांविधानिक प्रश्न का निश्चित उत्तर देने की अपेक्षा करना उचित नहीं है। जस्टिस करोल की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा,जब हाई कोर्ट के जज ही सही उत्तर को लेकर एकमत नहीं हैं, तो नगर निगम में विधि अधिकारी पद के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे सामान्य कानून स्नातकों से सही निष्कर्ष पर पहुंचने की उम्मीद करना उचित नहीं है।
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