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चिंताजनक: हृदय रोग के 10 में सात मरीज बिना बीमा, इलाज खर्च लाख पार; कर्ज में डूबे परिवार, बढ़ा आर्थिक संकट
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: Shivam Garg
Updated Thu, 26 Mar 2026 05:47 AM IST
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सार
क्या दिल की बीमारी अब सिर्फ सेहत का संकट नहीं, बल्कि जेब पर पड़ने वाला सबसे बड़ा हमला बन चुकी है? भारत में हर साल हजारों परिवार इलाज के खर्च के बोझ तले दब रहे हैं और चौंकाने वाली बात यह है कि ज्यादातर मरीजों के पास कोई बीमा तक नहीं है।
हृदय रोग
- फोटो : फ्रीपिक डॉट कॉम
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विस्तार
भारत में हार्ट फेलियर अब सिर्फ एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि तेजी से उभरता आर्थिक संकट भी बनता जा रहा है। एक नए अध्ययन के मुताबिक देश में 10 में से 7 मरीजों के पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है, जिसके कारण उन्हें अपने इलाज का 90 फीसदी से ज्यादा खर्च खुद उठाना पड़ता है। औसतन एक मरीज पर सालाना 1लाख रुपए का खर्च आता है, जो सीमित आय वाले परिवारों के लिए भारी आर्थिक बोझ साबित हो रहा है।
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केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित श्री चित्रा तिरुनल आयुर्विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के इस अध्ययन में देशभर के 1,859 हार्ट फेलियर मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। यह शोध ग्लोबल हार्ट जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन साफ संकेत देता है कि भारत में हृदय रोगों का इलाज बड़ी संख्या में परिवारों को आर्थिक रूप से कमजोर कर रहा है।हार्ट फेलियर एक दीर्घकालिक बीमारी है, जिसमें मरीज को लगातार दवाइयों, जांच और अस्पताल के नियमित दौरे की जरूरत होती है। इसी वजह से इलाज का खर्च लगातार बढ़ता रहता है। अध्ययन के अनुसार एक मरीज का औसत वार्षिक खर्च 1,06,566 रुपए है, जो कई परिवारों की कुल आय के बराबर या उससे अधिक है।इस बीमारी का असर सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मरीज और उसके परिवार की आय पर भी पड़ता है।
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कई मरीज काम करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि परिवार के अन्य सदस्य को देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है। अध्ययन में पाया गया कि लगभग एक-तिहाई परिवारों की आय में गिरावट दर्ज की गई।रिपोर्ट के मुताबिक करीब 38 फीसदी परिवारों को कैटास्ट्रॉफिक खर्च का सामना करना पड़ा, यानी इलाज पर इतना खर्च हुआ कि उनकी आय का बड़ा हिस्सा खत्म हो गया। इतना ही नहीं, लगभग 18 फीसदी परिवारों को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ा या अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी। यह स्थिति उन्हें लंबे समय तक आर्थिक अस्थिरता की ओर धकेल सकती है।
बीमा से राहत लेकिन पहुंच अब भी सीमित
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों के पास स्वास्थ्य बीमा था, उनके ऊपर आर्थिक दबाव अपेक्षाकृत कम रहा। बावजूद इसके, करीब 70 फीसदी मरीज अब भी बीमा से वंचित हैं, जिससे वे इलाज के खर्च का बोझ अकेले उठाने को मजबूर हैं।
नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत
शोधकर्ताओं ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा है कि हार्ट फेलियर का इलाज भारत में एक स्वास्थ्य चुनौती के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक समस्या भी बन गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस संकट से निपटने के लिए स्वास्थ्य बीमा कवरेज का विस्तार, सस्ती और सुलभ चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता तथा टिकाऊ वित्तीय मॉडल विकसित करना जरूरी है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि यदि समय रहते प्रभावी नीतिगत कदम नहीं उठाए गए, तो हृदय रोगों का बढ़ता बोझ लाखों परिवारों को गरीबी और आर्थिक असुरक्षा की ओर धकेल सकता है।