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अध्ययन में खुलासा: लोग अब भी जेब से खर्च कर रहे इलाज का आधा पैसा, 80 फीसदी विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 15 Jun 2026 03:50 AM IST
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सार
एक हालिया अध्ययन में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कई चुनौतियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के अधिकांश पद खाली हैं, जिससे विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। कई स्वास्थ्य संस्थान बुनियादी सुविधाओं, उपकरणों और पर्याप्त स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि इलाज पर लोगों का निजी खर्च अब भी काफी अधिक है।
भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं का क्या हाल?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
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विस्तार
देश के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब 80% पद खाली पड़े हैं। वहीं अभी भी लोगों को इलाज पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 48% अपनी जेब से देना पड़ रहा है।
यह जानकारी हाल ही में एम्स कल्याणी (पश्चिम बंगाल), एम्स मंगलगिरी (आंध्र प्रदेश) और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (दिल्ली) के विशेषज्ञों के अध्ययन से सामने आई है। "पब्लिक हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन इन इंडिया" नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति, चुनौतियों और भविष्य की दिशा के बारे में बताया गया है।
ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चिकित्सकों की कमी का सबसे अधिक असर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में देखने को मिलता है, जहां लोगों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी संविदा पर कार्यरत हैं, जिससे नौकरी की अस्थिरता और कर्मचारियों के पलायन की समस्या बनी रहती है।
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जर्जर भवनों में चल रहे उपकेंद्र
रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई उपकेंद्र आज भी किराये या जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में लैब और जांच सुविधाओं की कमी है, जबकि कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ, रक्त भंडारण इकाई और नवजात शिशु देखभाल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के तहत स्थापित कई शहरी स्वास्थ्य केंद्र पर्याप्त स्टाफ और उपकरणों के अभाव से जूझ रहे हैं।
एक व्यक्ति पर सरकार खर्च कर रही आठ रुपये
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 2.1% है, जबकि वैश्विक औसत 5 से 6% के बीच है। आंकड़ों को देखें तो 2022-23 में सरकारी स्वास्थ्य व्यय प्रति व्यक्ति लगभग 2,800–2,900 रुपये सालाना तक पहुंच गया था। सरकार एक भारतीय नागरिक के स्वास्थ्य पर करीब आठ रुपये प्रतिदिन खर्च करती है।
राज्यों के बीच गहरी असमानता
स्वास्थ्य सेवाओं और परिणामों में राज्यों के बीच बड़ा अंतर है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य स्वास्थ्य सूचकांकों में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि बिहार और यूपी जैसे राज्यों को अभी लंबा रास्ता तय करना है।
यह जानकारी हाल ही में एम्स कल्याणी (पश्चिम बंगाल), एम्स मंगलगिरी (आंध्र प्रदेश) और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (दिल्ली) के विशेषज्ञों के अध्ययन से सामने आई है। "पब्लिक हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन इन इंडिया" नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति, चुनौतियों और भविष्य की दिशा के बारे में बताया गया है।
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ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चिकित्सकों की कमी का सबसे अधिक असर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में देखने को मिलता है, जहां लोगों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी संविदा पर कार्यरत हैं, जिससे नौकरी की अस्थिरता और कर्मचारियों के पलायन की समस्या बनी रहती है।
जर्जर भवनों में चल रहे उपकेंद्र
रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई उपकेंद्र आज भी किराये या जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में लैब और जांच सुविधाओं की कमी है, जबकि कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ, रक्त भंडारण इकाई और नवजात शिशु देखभाल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के तहत स्थापित कई शहरी स्वास्थ्य केंद्र पर्याप्त स्टाफ और उपकरणों के अभाव से जूझ रहे हैं।
एक व्यक्ति पर सरकार खर्च कर रही आठ रुपये
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 2.1% है, जबकि वैश्विक औसत 5 से 6% के बीच है। आंकड़ों को देखें तो 2022-23 में सरकारी स्वास्थ्य व्यय प्रति व्यक्ति लगभग 2,800–2,900 रुपये सालाना तक पहुंच गया था। सरकार एक भारतीय नागरिक के स्वास्थ्य पर करीब आठ रुपये प्रतिदिन खर्च करती है।
राज्यों के बीच गहरी असमानता
स्वास्थ्य सेवाओं और परिणामों में राज्यों के बीच बड़ा अंतर है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य स्वास्थ्य सूचकांकों में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि बिहार और यूपी जैसे राज्यों को अभी लंबा रास्ता तय करना है।