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China: सरकारी ठेकों में चीनी कंपनियों की वापसी की तैयारी, गलवां में झड़प के बाद लगे प्रतिबंध हटाने पर विचार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Fri, 09 Jan 2026 03:58 AM IST
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सार
India-China Relations: केंद्र सरकार गलवां झड़प के बाद चीनी कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रही है। कई मंत्रालयों ने परियोजनाओं में देरी का हवाला देते हुए ढील की मांग की है। हालांकि भारत का रुख अब भी सतर्क है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर पाबंदियां जारी रहेंगी।
भारत और चीन के झंडे। (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
भारत सरकार सरकारी ठेकों में चीनी कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंध हटाने की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। वर्ष 2020 में गलवां घाटी में हुई झड़प के बाद लगाए गए इन प्रतिबंधों को अब धीरे-धीरे नरम करने पर विचार किया जा रहा है। सीमा पर तनाव में कमी और बदलते वैश्विक हालात के बीच यह फैसला आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर अहम माना जा रहा है।
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नई दिल्ली में चल रही चर्चाओं के अनुसार, केंद्र सरकार सरकारी परियोजनाओं में चीनी कंपनियों की भागीदारी पर लगे प्रतिबंधों की समीक्षा कर रही है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ, पाकिस्तान और अमेरिका के बीच बढ़ती नजदीकियों और चीन के साथ संबंधों में आई नरमी के चलते यह कदम उठाया जा रहा है। वर्ष 2020 में गलवां झड़प के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर चीनी कंपनियों को सरकारी ठेकों से बाहर कर दिया गया था।
क्यों बन रही है ढील की जरूरत
कई मंत्रालयों और सरकारी विभागों ने वित्त मंत्रालय को पत्र लिखकर बताया है कि प्रतिबंधों के कारण कई अहम परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं। बुनियादी ढांचा, ऊर्जा और परिवहन जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा कम होने से लागत बढ़ी है और काम में देरी हो रही है। पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गाबा की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति ने भी प्रतिबंधों में आंशिक ढील देने की सिफारिश की है।
ये भी पढ़ें- भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग को नई रफ्तार, सह-विकास और सह-उत्पादन पर बनी सहमति
गलवां के बाद क्या बदला गया था?
गलवां झड़प के बाद चीनी कंपनियों के लिए सरकारी ठेकों में भागीदारी की शर्तें कड़ी कर दी गई थीं। उन्हें भारत में पंजीकरण, राजनीतिक मंजूरी और सुरक्षा स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई थी। इन शर्तों के चलते कई चीनी कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गईं। सरकार का मानना है कि अब हालात बदले हैं, लेकिन सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
संबंध सुधरे, लेकिन सतर्कता बरकरार
भारत और चीन के बीच रिश्तों में भले ही सुधार दिख रहा हो, लेकिन भारत का रुख अब भी सतर्क बना हुआ है। चीनी कंपनियों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर लगी पाबंदियां फिलहाल जारी रहेंगी। अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय स्तर पर लिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की दिशा साफ होती है, तो भारत-चीन संबंधों में और नरमी आ सकती है।
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क्यों बन रही है ढील की जरूरत
कई मंत्रालयों और सरकारी विभागों ने वित्त मंत्रालय को पत्र लिखकर बताया है कि प्रतिबंधों के कारण कई अहम परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं। बुनियादी ढांचा, ऊर्जा और परिवहन जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा कम होने से लागत बढ़ी है और काम में देरी हो रही है। पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गाबा की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति ने भी प्रतिबंधों में आंशिक ढील देने की सिफारिश की है।
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गलवां के बाद क्या बदला गया था?
गलवां झड़प के बाद चीनी कंपनियों के लिए सरकारी ठेकों में भागीदारी की शर्तें कड़ी कर दी गई थीं। उन्हें भारत में पंजीकरण, राजनीतिक मंजूरी और सुरक्षा स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई थी। इन शर्तों के चलते कई चीनी कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गईं। सरकार का मानना है कि अब हालात बदले हैं, लेकिन सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
संबंध सुधरे, लेकिन सतर्कता बरकरार
भारत और चीन के बीच रिश्तों में भले ही सुधार दिख रहा हो, लेकिन भारत का रुख अब भी सतर्क बना हुआ है। चीनी कंपनियों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर लगी पाबंदियां फिलहाल जारी रहेंगी। अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय स्तर पर लिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की दिशा साफ होती है, तो भारत-चीन संबंधों में और नरमी आ सकती है।
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