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Ujjal Bhuyan: 'दमन और डर के साये में विकसित भारत संभव नहीं', जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का बड़ा बयान

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलुरू Published by: राकेश कुमार Updated Mon, 23 Mar 2026 02:28 PM IST
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सार

UAPA के गलत इस्तेमाल को लेकर जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि असहमति की आवाजों को दबाना, अंधाधुंध गिरफ्तारियां विकसित भारत के लक्ष्य की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। अगर इस पर गौर नहीं किया गया तो अदालतों पर बोझ बढ़ता ही रहेगा। 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

Ujjal Bhuyan On UAPA: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने सामाजिक ताने-बाने को लेकर बड़ी बात कह दी है। बंगलुरु में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि 2047 तक 'विकसित भारत' का सपना केवल नारों से पूरा नहीं होगा। भुइयां ने कहा कि असहमति की आवाजों को दबाना, अंधाधुंध गिरफ्तारियां इस लक्ष्य की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं।
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UAPA के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल
जस्टिस भुइयां ने आतंकवाद विरोधी कानून (यूएपीए) के बढ़ते इस्तेमाल पर चेताया है। उन्होंने कहा 2019 से 2023 के बीच हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन सजा की दर महज 5 प्रतिशत के आसपास रही। उन्होंने कहा, "इतनी कम सजा दर क्या बताती है? यह कानून का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है?" उन्होंने आगे कहा कि बिना पर्याप्त सबूतों के की गई गिरफ्तारियां न केवल अदालतों पर बोझ बढ़ाती हैं बल्कि नागरिक स्वतंत्रता का भी हनन करती है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि एक विकसित देश में आलोचना के लिए जगह होनी चाहिए, उसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
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न्यायपालिका में 'कांच की दीवार'
इतना ही नहीं, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में महिलाओं की कम भागीदारी पर दुख जताया है। उन्होंने कहा कि जिला अदालतों में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं न्यायिक अधिकारी बन रही हैं, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंचते-पहुंचते यह संख्या क्यों गिर जाती है? उन्होंने कहा कि 1950 से अब तक सुप्रीम कोर्ट के 287 जजों में से केवल 11 महिलाएं रही हैं। उन्होंने कोलेजियम सिस्टम की 'सब्जेक्टिविटी' पर भी सवाल उठाया है। उनका मानना है कि जब तक चयन प्रक्रिया वस्तुनिष्ठ नहीं होगी, महिलाएं इस 'कांच की दीवार' को नहीं तोड़ पाएंगी।

कैसा हो विकसित भारत?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि विकास का मतलब सिर्फ ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि दलितों और पिछड़ों के प्रति सम्मान है। उन्होंने कहा कि जिस समाज में एक बच्चा दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दे, वह विकसित होने का दावा नहीं कर सकता।

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