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Siddaramaiah vs DKS: कर्नाटक मुख्यमंत्री पद को लेकर तीन साल की खींचतान तीन दिन में कैसे हुई खत्म, कब-क्या हुआ?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 28 May 2026 01:41 PM IST
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सार
कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद को लेकर मुकाबले का दौर कोई नया नहीं है। मई 2023 से लेकर नवंबर 2025 तक कई बार सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सीएम पद को लेकर खींचतान की खबरें सामने आईं। हालांकि, यह बदलाव अब पूरे तीन साल बाद होने जा रहा है।
कर्नाटक में सियासत जारी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद के लिए तीन साल पहले शुरू हुई जद्दोजहद आखिरकार खात्मे की ओर बढ़ती दिख रही है। दरअसल, 2023 में मई के महीने में ही कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी थी। तब पार्टी के दो कद्दावर नेताओं- सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार में मुख्यमंत्री बनने की होड़ मची थी। हालांकि, कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया के अनुभव पर भरोसा करते हुए उन्हें सीएम बनाने को मंजूरी दी, वहीं शिवकुमार को डिप्टी सीएम पद से संतोष करना पड़ा। तब यह भी अटकलें लगी थीं कि दोनों नेताओं के बीच ढाई-ढाई साल सीएम पद पर रहने की सहमति बनी है। यूं तो इसकी कभी पुष्टि नहीं हुई और बाद में सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद पर अपनी पकड़ को और मजबूत कर लिया, लेकिन अब कांग्रेस हाईकमान ने शिवकुमार को सीएम बनाए जाने पर सहमति जता दी है। इसी के साथ अब सिद्धारमैया जल्द ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर तीन साल पहले कर्नाटक में किस टकराव के बाद सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार को पीछे कर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की थी? दोनों के बीच इस पद को साझा करने को लेकर जिस गुप्त समझौते की चर्चा होती है, वह क्या था? कैसे सिद्धारमैया इस दौरान लगातार सीएम पद पर अपनी पकड़ और मजबूत करते चले गए और डीके शिवकुमार खुद इस कार्यकाल में मुख्यमंत्री पद न मिलने की बात लगभग मान चुके थे? फिर मई 2026 में कब-क्या ऐसा हुआ कि सीएम पद पर यह बदलाव संभव हुआ? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर तीन साल पहले कर्नाटक में किस टकराव के बाद सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार को पीछे कर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की थी? दोनों के बीच इस पद को साझा करने को लेकर जिस गुप्त समझौते की चर्चा होती है, वह क्या था? कैसे सिद्धारमैया इस दौरान लगातार सीएम पद पर अपनी पकड़ और मजबूत करते चले गए और डीके शिवकुमार खुद इस कार्यकाल में मुख्यमंत्री पद न मिलने की बात लगभग मान चुके थे? फिर मई 2026 में कब-क्या ऐसा हुआ कि सीएम पद पर यह बदलाव संभव हुआ? आइये जानते हैं...
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तीन साल पहले कर्नाटक में कैसे लगी थी सीएम पद की होड़?
तीन साल पहले- मई 2023 में जब कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी, तब मुख्यमंत्री पद के लिए सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच कड़ी होड़, जिसे गेम ऑफ थ्रोन्स भी कहा गया, शुरू हो गई थी। दोनों ही दिग्गजों ने इस शीर्ष पद के लिए अपनी मजबूत दावेदारी और पैरवी पेश की थी। उस समय दोनों ही नेताओं ने अपनी ताकत दर्शाते हुए सीएम पद पर दावा रखा था।1. क्या था सिद्धारमैया का पक्ष
सिद्धारमैया ने अपने पास राजनीति का लंबा अनुभव और पार्टी के 135 नवनिर्वाचित कांग्रेस विधायकों में से 90 का समर्थन होने की बात कही थी। इसके अलावा, अहिंदा यानी अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्गों और दलितों खासकर कुरुबा और मुस्लिम समुदायों के बीच उनका एक बहुत मजबूत और व्यापक जनाधार था।2. क्या था डीके शिवकुमार का पक्ष
डीके शिवकुमार ने कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पार्टी को मुश्किल समय से निकालते हुए राज्य में चुनाव अभियान का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था और कांग्रेस को एक शानदार जीत दिलाई थी। उन्हें राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों के नेताओं का भी कड़ा समर्थन हासिल है।सीएम पद साझा करने को लेकर जिस कथित गुप्त समझौते की चर्चा, वह क्या था?
बताया जाता है कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री पद के लिए कड़े मुकाबले को सुलझाने के लिए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने हस्तक्षेप किया और एक कथित समझौता कराया। इस समझौते के तहत सिद्धारमैया को राज्य का मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया गया।हालांकि, यह व्यवस्था लंबे समय तक पूरी तरह शांत नहीं रही। शिवकुमार के समर्थकों का लगातार यह दावा करते रहे हैं कि सरकार गठन के समय ढाई-ढाई साल के लिए रोटेशनल मुख्यमंत्री का फॉर्मूला तय किया गया था। दावा किया जाता है कि इसके तहत डीके शिवकुमार ने केवल इस आश्वासन पर उपमुख्यमंत्री का पद स्वीकारा था कि ढाई साल बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। यही वजह रही कि लगभग ढाई साल बीतने के बाद शिवकुमार के समर्थकों ने इस समझौते को लागू करने की मांग तेज कर दिया था। हालांकि, तब तक सिद्धारमैया इस पद पर पकड़ को काफी मजबूत कर चुके थे।
सिद्धारमैया ने कैसे मजबूत की सीएम पद पर अपनी पकड़?
विधायकों का भारी समर्थन: चूंकि कांग्रेस के 135 विधायकों में से 90 ने सिद्धारमैया का खुलकर समर्थन किया था। ऐसे में सीएम पद पर उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती रही। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्नाटक कांग्रेस में गुटबाजी के बीच भी उनके पास 34 लिंगायत और 9 कुरुबा विधायकों का कड़ा समर्थन रहा।अहिंदा वोट बैंक पर मजबूत पकड़: सिद्धारमैया को कांग्रेस का सबसे बड़ा सामाजिक गठबंधन बनाने वाला नेता माना जाता है। उन्होंने दशकों की कल्याणकारी राजनीति और जमीनी प्रभाव के जरिए कुरुबा, मुस्लिम और दलित समुदायों के बीच एक बेहद मजबूत और व्यापक जनाधार बनाया। वहीं, डीके शिवकुमार के पास अभी भी इस सामाजिक वर्ग में वह भावनात्मक जुड़ाव और समर्थन नहीं है जो सिद्धारमैया ने इतने वर्षों में कमाया।
चुनावी समीकरणों में निर्णायक भूमिका: कुरुबा समुदाय के मतदाता उत्तरी कर्नाटक की 60 से 70 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में अगर सिद्धारमैया को जबरदस्ती पद से हटाया जाता है, तो उत्तर कर्नाटक में कांग्रेस को कुरुबा समुदाय के लगभग पांच फीसदी वोटों का नुकसान होने की आशंका रहती। इसके अलावा मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी यह संदेश जा सकता है कि नया नेतृत्व सिद्धारमैया जितना समावेशी नहीं है।
पार्टी का इकलौता ओबीसी चेहरा: राज्य की राजनीति में सिद्धारमैया का अनुभव और राजनीतिक कद बहुत बड़ा है। सबसे अहम बात यह है कि वह वर्तमान में कांग्रेस शासित सभी राज्यों में एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) से आते हैं। भाजपा नेताओं का भी मानना रहा है कि अगर राहुल गांधी उन्हें पद से हटाते हैं, तो इंडिया गठबंधन के ओबीसी सहयोगियों और मतदाताओं के बीच यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस ओबीसी के पक्ष में नहीं है और इसका फायदा उठाया जा सकता है।
इसके चलते सीएम पद पर सिद्धारमैया की पकड़ लगातार मजबूत रही। कांग्रेस आलाकमान के लिए उन्हें हटाकर डीके शिवकुमार को सत्ता सौंपना एक बहुत बड़ा जोखिम बन गया, क्योंकि इससे पार्टी का सावधानीपूर्वक बुना गया सामाजिक समीकरण टूटने और 2028 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर पैदा होने का खतरा था।
पार्टी का इकलौता ओबीसी चेहरा: राज्य की राजनीति में सिद्धारमैया का अनुभव और राजनीतिक कद बहुत बड़ा है। सबसे अहम बात यह है कि वह वर्तमान में कांग्रेस शासित सभी राज्यों में एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) से आते हैं। भाजपा नेताओं का भी मानना रहा है कि अगर राहुल गांधी उन्हें पद से हटाते हैं, तो इंडिया गठबंधन के ओबीसी सहयोगियों और मतदाताओं के बीच यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस ओबीसी के पक्ष में नहीं है और इसका फायदा उठाया जा सकता है।
इसके चलते सीएम पद पर सिद्धारमैया की पकड़ लगातार मजबूत रही। कांग्रेस आलाकमान के लिए उन्हें हटाकर डीके शिवकुमार को सत्ता सौंपना एक बहुत बड़ा जोखिम बन गया, क्योंकि इससे पार्टी का सावधानीपूर्वक बुना गया सामाजिक समीकरण टूटने और 2028 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर पैदा होने का खतरा था।
कब शिवकुमार ने मान ली पांच साल तक सीएम बने रहेंगे सिद्धारमैया?
बीते साल नवंबर में जब कर्नाटक सरकार के ढाई साल पूरे हुए तब उसी 'गुप्त समझौते' की चर्चाएं शुरू हो गईं, जिसके तहत डीकेएस को सीएम पद सौंपा दिया जाना था। इसे लेकर शिवकुमार समर्थकों ने आवाज भी उठाई, हालांकि दोनों ही नेता खुलकर इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोले। इस बीच 21 नवंबर 2025 को डीकेएस ने सार्वजनिक रूप से यह बात मान ली थी कि सिद्धारमैया पूरे पांच साल के कार्यकाल के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने रहेंगे।इस स्वीकरण के बावजूद सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने नवंबर में दो बार साथ में नाश्ता किया, जिसमें कथित तौर पर सीएम पद में बदलाव को लेकर चर्चा हुई। हालांकि, मुख्यमंत्री पद में परिवर्तन को लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया था।
मई 2026 में कब-क्या ऐसा हुआ कि सीएम पद पर यह बदलाव संभव हुआ?
मई 2026 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद पर इस बड़े बदलाव की पटकथा मुख्य रूप से 26 मई से 28 मई के बीच हुए तेज राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण लिखी गई। हालांकि, इसकी कहानी 21 मई से शुरू होती है, जब कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि कांग्रेस हाईकमान कर्नाटक में सारे मुद्दों को खत्म करने के लिए मई के अंतिम सप्ताह में बड़ी बैठक करने वाला है और इसके लिए सिद्धारमैया और शिवकुमार को दिल्ली बुलाया जा सकता है। इन खबरों के बाद शिवकुमार ने कहा था- 'अच्छा समय जल्द आएगा।'26 मई 2026 (मंगलवार): दिल्ली में मैराथन बैठकें और नया प्रस्ताव
शीर्ष नेतृत्व के साथ वार्ता: मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को कांग्रेस आलाकमान ने दिल्ली तलब किया, जहां उनकी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ लंबी चर्चा हुई।
प्रियंका गांधी का दबाव: इन मैराथन बैठकों के बाद, प्रियंका गांधी ने नेतृत्व परिवर्तन (डीके शिवकुमार को सत्ता सौंपने) के लिए अपनी तरफ से जोर दिया।
राज्यसभा और राष्ट्रीय भूमिका का ऑफर: कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, राहुल गांधी ने सिद्धारमैया के साथ अलग से एक-एक बैठक की। इसमें सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के लिए सिद्धारमैया को दिल्ली में एक बड़ी राष्ट्रीय भूमिका और राज्यसभा सीट का प्रस्ताव दिया गया। उनसे इस पर विचार करने के लिए कहा गया। साथ ही, समझौते के तहत उनके बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को कैबिनेट में जगह देने पर भी चर्चा हुई।
27 मई 2026 (बुधवार): सिद्धारमैया गुट की शर्तें
कांग्रेस के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला बेंगलुरु पहुंचे और उन्होंने सिद्धारमैया व अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकें कीं। बताया जाता है कि सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार के हाथ में पूरी ताकत जाने से रोकने के लिए आलाकमान के सामने कड़ी शर्तें रखीं। उन्होंने मांग की कि डीके शिवकुमार के अधीन कई उप-मुख्यमंत्री बनाए जाएं ताकि सत्ता का संतुलन बना रहे। इसके लिए यतींद्र सिद्धारमैया, प्रियांक खड़गे, यूटी खादर और एमबी पाटिल जैसे नाम सुझाए गए।इसके अलावा, यह भी शर्त रखी गई कि नया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (केपीसी प्रमुख) सिद्धारमैया की पसंद का नेता हो, जैसे- सतीश जारकीहोली।
28 मई 2026 (गुरुवार): इस्तीफे का आधिकारिक एलान
बंगलूरू में मुख्यमंत्री आवास पर एक नाश्ते पर बैठक के दौरान, सिद्धारमैया ने अपने कैबिनेट सहयोगियों को स्पष्ट कर दिया कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं। इस बैठक में डीके शिवकुमार भी उनके बगल में मौजूद थे और जारी की गई तस्वीरों में शिवकुमार को सिद्धारमैया के पैर छूकर आशीर्वाद लेते देखा गया।सिद्धारमैया की तरफ से पार्टी आलाकमान का निर्णय स्वीकार कर लेने के बाद ही डीके शिवकुमार के लिए मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हुआ। कर्नाटक सरकार में मंत्री एचके पाटिल ने बताया कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया 3 बजे इस्तीफा देंगे। मुख्यमंत्री कार्यालय की आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया, 'मुख्यमंत्री सिद्धारमैया आज दोपहर 2:30 बजे लोक भवन का दौरा करेंगे। इसके बाद वह दोपहर 3 बजे अपने दूसरे आधिकारिक आवास ‘कृष्णा’ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे।'