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संसदीय समिति की सिफारिश: 20 की उम्र के बाद हर छह महीने में कराना होगा किडनी टेस्ट? जानें किसे ज्यादा खतरा
Tue, 11 Aug 2026 09:20 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 11 Aug 2026 09:20 PM IST
सार
20 साल की उम्र के बाद हर छह महीने में केएफटी की सिफारिश से किडनी बीमारी की शुरुआती पहचान पर जोर दिया गया है। समिति का फोकस डायलिसिस तक पहुंचने से पहले बीमारी रोकने और उसकी रफ्तार धीमी करने पर है।
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किडनी टेस्ट (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
देश में बढ़ते क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) के मामलों को देखते हुए संसदीय समिति ने किडनी की बीमारी की समय रहते पहचान और रोकथाम के लिए बड़ा कदम सुझाया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि 20 साल और उससे अधिक उम्र के हर व्यक्ति का हर छह महीने में किडनी फंक्शन टेस्ट (केएफटी) कराया जाए।
गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) रहने वाले लोगों के लिए यह जांच मुफ्त और गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) वालों के लिए मामूली शुल्क पर उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है।
समिति ने यह सिफारिश राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपी-एनसीडी) के तहत करने को कहा है। राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव की अध्यक्षता वाली समिति ने क्रॉनिक किडनी डिजीज की रोकथाम, जांच, इलाज और प्रबंधन को लेकर कुल 66 सिफारिशें की हैं। समिति की 177वीं रिपोर्ट 'भारत में क्रॉनिक किडनी डिजीज का प्रसार-रोकथाम, निदान, उपचार और प्रबंधन' शीर्षक से है। यह रिपोर्ट सात अगस्त को राज्यसभा में पेश और लोकसभा के पटल पर रखी गई थी।
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हाई रिस्क वालों की हर साल जांच की सिफारिश
समिति ने कहा है कि किडनी की बीमारी के ज्यादा जोखिम वाले लोगों की हर साल स्क्रीनिंग होनी चाहिए। इसमें किडनी की कार्यक्षमता जांचने के लिए eGFR (estimated glomerular filtration rate) और पेशाब में एल्ब्यूमिन और प्रोटीन की जांच शामिल होनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर ऐसे मरीजों को विशेषज्ञ के पास भेजने और आगे की निगरानी की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
समिति के मुताबिक, अभी सीकेडी की जांच काफी हद तक 'ऑपर्च्युनिस्टिक स्क्रीनिंग' पर निर्भर है। यानी लोग जब किसी स्वास्थ्य केंद्र या आयुष्मान आरोग्य मंदिर पहुंचते हैं, तभी जांच हो पाती है। इससे जोखिम वाले सभी लोगों की नियमित जांच सुनिश्चित नहीं हो पाती।
किन लोगों को किडनी बीमारी का ज्यादा खतरा?
समिति ने कुछ समूहों को विशेष रूप से हाई रिस्क श्रेणी में रखा है। इनमें शामिल हैं:-
लंबे समय तक किडनी को नुकसान पहुंचाने वाली दवाएं लेने वाले लोग, जिनमें कुछ NSAIDs भी शामिल हैं। समिति ने कहा कि देश में सीकेडी के अधिकांश मामलों के पीछे डायबिटीज और हाइपरटेंशन प्रमुख जोखिम कारकों में हैं।
किडनी की बीमारी शुरू में पता क्यों नहीं चलती?
समिति ने बताया कि भारत में सीकेडी का अनुमानित संयुक्त प्रसार करीब 13.24 प्रतिशत है। बीमारी की शुरुआती अवस्था में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। ऐसे में मरीज को बीमारी का पता तब चलता है, जब किडनी की कार्यक्षमता को काफी और कई बार स्थायी नुकसान हो चुका होता है।
इसी वजह से समिति ने देशभर में एनपी-एनसीडी के तहत एक समान सीकेडी स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल लागू करने की सिफारिश की है। आयुष्मान आरोग्य मंदिर समेत सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर हाई रिस्क लोगों की जांच के लिए एक मानक प्रक्रिया होनी चाहिए।
यह भी पढ़ें: गांजा पीकर पायलट उड़ा था विमान: एअर इंडिया फ्लाइट टर्बुलेंस मामले में अहम खुलासा, दूसरा डोप टेस्ट आया पॉजिटिव
सिर्फ क्रिएटिनिन टेस्ट काफी नहीं, eGFR भी जरूरी
समिति ने किडनी की जांच के तरीके में भी बदलाव की सिफारिश की है। उसका कहना है कि जब भी किसी सरकारी या निजी लैब में सीरम क्रिएटिनिन की जांच हो, तो उसके साथ eGFR की गणना और रिपोर्ट अपने आप होनी चाहिए। इसके लिए मरीज को अलग से टेस्ट लिखवाने या अतिरिक्त शुल्क देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
समिति ने eGFR की गणना के लिए सीकेडी-ईपीआई इक्वेशन को प्राथमिकता देने की बात कही है। हाई रिस्क वाले लोगों की किडनी जांच में पेशाब में एल्ब्यूमिन की जांच को भी शामिल करने की सिफारिश की गई है। समिति के मुताबिक केवल सीरम क्रिएटिनिन के आधार पर शुरुआती किडनी बीमारी पकड़ना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि किडनी की कार्यक्षमता काफी कम होने के बावजूद इसका स्तर सामान्य सीमा में रह सकता है।
हर साल 2.2 लाख नए मरीज, डायलिसिस पर बढ़ रहा दबाव
संसदीय समिति ने यह भी कहा कि भारत में हर साल करीब 2.2 लाख नए मरीज एंड-स्टेज किडनी डिजीज की स्थिति में पहुंचते हैं। इससे हर साल करीब 3.4 करोड़ अतिरिक्त डायलिसिस सेशन की जरूरत पैदा होती है।
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम के तहत सालाना हेमोडायलिसिस सेशन की संख्या पिछले पांच वर्षों में करीब 25 लाख से बढ़कर 70 लाख हो गई है। समिति ने ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में पेरिटोनियल डायलिसिस को भी बढ़ावा देने की सिफारिश की है।
ट्रांसप्लांट के बाद एक साल तक इलाज कवर करने की सिफारिश
समिति ने आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई के तहत किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मिलने वाली कवरेज को मौजूदा 15 दिन से बढ़ाकर एक साल करने की सिफारिश भी की है। इस अवधि में फॉलोअप परामर्श, जरूरी जांच, इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं और ट्रांसप्लांट से जुड़ी जटिलताओं के इलाज को शामिल करने की बात कही गई है। इसके अलावा समिति ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत सीकेडी के लिए एक एकीकृत डिजिटल सिस्टम बनाने की सिफारिश की है। इसमें मरीजों का डिजिटल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक रेफरल और हाई रिस्क मरीजों की निगरानी को प्रस्तावित राष्ट्रीय सीकेडी रजिस्ट्री से जोड़ा जा सकता है।
समिति ने जिला अस्पतालों में नेफ्रोलॉजी सेवाएं मजबूत करने, विशेषज्ञों के पास रेफरल की व्यवस्था बेहतर करने और बच्चों की किडनी संबंधी बीमारियों के लिए अलग राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू करने की भी सिफारिश की है।
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गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) रहने वाले लोगों के लिए यह जांच मुफ्त और गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) वालों के लिए मामूली शुल्क पर उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है।
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समिति ने यह सिफारिश राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपी-एनसीडी) के तहत करने को कहा है। राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव की अध्यक्षता वाली समिति ने क्रॉनिक किडनी डिजीज की रोकथाम, जांच, इलाज और प्रबंधन को लेकर कुल 66 सिफारिशें की हैं। समिति की 177वीं रिपोर्ट 'भारत में क्रॉनिक किडनी डिजीज का प्रसार-रोकथाम, निदान, उपचार और प्रबंधन' शीर्षक से है। यह रिपोर्ट सात अगस्त को राज्यसभा में पेश और लोकसभा के पटल पर रखी गई थी।
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हाई रिस्क वालों की हर साल जांच की सिफारिश
समिति ने कहा है कि किडनी की बीमारी के ज्यादा जोखिम वाले लोगों की हर साल स्क्रीनिंग होनी चाहिए। इसमें किडनी की कार्यक्षमता जांचने के लिए eGFR (estimated glomerular filtration rate) और पेशाब में एल्ब्यूमिन और प्रोटीन की जांच शामिल होनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर ऐसे मरीजों को विशेषज्ञ के पास भेजने और आगे की निगरानी की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
समिति के मुताबिक, अभी सीकेडी की जांच काफी हद तक 'ऑपर्च्युनिस्टिक स्क्रीनिंग' पर निर्भर है। यानी लोग जब किसी स्वास्थ्य केंद्र या आयुष्मान आरोग्य मंदिर पहुंचते हैं, तभी जांच हो पाती है। इससे जोखिम वाले सभी लोगों की नियमित जांच सुनिश्चित नहीं हो पाती।
किन लोगों को किडनी बीमारी का ज्यादा खतरा?
समिति ने कुछ समूहों को विशेष रूप से हाई रिस्क श्रेणी में रखा है। इनमें शामिल हैं:-
- डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोग।
- 60 साल से अधिक उम्र के लोग।
- परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास रखने वाले लोग।
- मोटापे से जूझ रहे लोग।
- तंबाकू का इस्तेमाल करने वाले लोग।
- पहले कभी एक्यूट किडनी इंजरी झेल चुके लोग।
- बार-बार यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई) होने वाले लोग।
- बार-बार किडनी स्टोन की समस्या वाले लोग।
लंबे समय तक किडनी को नुकसान पहुंचाने वाली दवाएं लेने वाले लोग, जिनमें कुछ NSAIDs भी शामिल हैं। समिति ने कहा कि देश में सीकेडी के अधिकांश मामलों के पीछे डायबिटीज और हाइपरटेंशन प्रमुख जोखिम कारकों में हैं।
किडनी की बीमारी शुरू में पता क्यों नहीं चलती?
समिति ने बताया कि भारत में सीकेडी का अनुमानित संयुक्त प्रसार करीब 13.24 प्रतिशत है। बीमारी की शुरुआती अवस्था में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। ऐसे में मरीज को बीमारी का पता तब चलता है, जब किडनी की कार्यक्षमता को काफी और कई बार स्थायी नुकसान हो चुका होता है।
इसी वजह से समिति ने देशभर में एनपी-एनसीडी के तहत एक समान सीकेडी स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल लागू करने की सिफारिश की है। आयुष्मान आरोग्य मंदिर समेत सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर हाई रिस्क लोगों की जांच के लिए एक मानक प्रक्रिया होनी चाहिए।
यह भी पढ़ें: गांजा पीकर पायलट उड़ा था विमान: एअर इंडिया फ्लाइट टर्बुलेंस मामले में अहम खुलासा, दूसरा डोप टेस्ट आया पॉजिटिव
सिर्फ क्रिएटिनिन टेस्ट काफी नहीं, eGFR भी जरूरी
समिति ने किडनी की जांच के तरीके में भी बदलाव की सिफारिश की है। उसका कहना है कि जब भी किसी सरकारी या निजी लैब में सीरम क्रिएटिनिन की जांच हो, तो उसके साथ eGFR की गणना और रिपोर्ट अपने आप होनी चाहिए। इसके लिए मरीज को अलग से टेस्ट लिखवाने या अतिरिक्त शुल्क देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
समिति ने eGFR की गणना के लिए सीकेडी-ईपीआई इक्वेशन को प्राथमिकता देने की बात कही है। हाई रिस्क वाले लोगों की किडनी जांच में पेशाब में एल्ब्यूमिन की जांच को भी शामिल करने की सिफारिश की गई है। समिति के मुताबिक केवल सीरम क्रिएटिनिन के आधार पर शुरुआती किडनी बीमारी पकड़ना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि किडनी की कार्यक्षमता काफी कम होने के बावजूद इसका स्तर सामान्य सीमा में रह सकता है।
हर साल 2.2 लाख नए मरीज, डायलिसिस पर बढ़ रहा दबाव
संसदीय समिति ने यह भी कहा कि भारत में हर साल करीब 2.2 लाख नए मरीज एंड-स्टेज किडनी डिजीज की स्थिति में पहुंचते हैं। इससे हर साल करीब 3.4 करोड़ अतिरिक्त डायलिसिस सेशन की जरूरत पैदा होती है।
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम के तहत सालाना हेमोडायलिसिस सेशन की संख्या पिछले पांच वर्षों में करीब 25 लाख से बढ़कर 70 लाख हो गई है। समिति ने ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में पेरिटोनियल डायलिसिस को भी बढ़ावा देने की सिफारिश की है।
ट्रांसप्लांट के बाद एक साल तक इलाज कवर करने की सिफारिश
समिति ने आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई के तहत किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मिलने वाली कवरेज को मौजूदा 15 दिन से बढ़ाकर एक साल करने की सिफारिश भी की है। इस अवधि में फॉलोअप परामर्श, जरूरी जांच, इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं और ट्रांसप्लांट से जुड़ी जटिलताओं के इलाज को शामिल करने की बात कही गई है। इसके अलावा समिति ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत सीकेडी के लिए एक एकीकृत डिजिटल सिस्टम बनाने की सिफारिश की है। इसमें मरीजों का डिजिटल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक रेफरल और हाई रिस्क मरीजों की निगरानी को प्रस्तावित राष्ट्रीय सीकेडी रजिस्ट्री से जोड़ा जा सकता है।
समिति ने जिला अस्पतालों में नेफ्रोलॉजी सेवाएं मजबूत करने, विशेषज्ञों के पास रेफरल की व्यवस्था बेहतर करने और बच्चों की किडनी संबंधी बीमारियों के लिए अलग राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू करने की भी सिफारिश की है।