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क्या है दलबदल विरोधी कानून, जिसका नाम लेकर शरद पवार ने एनसीपी विधायकों को चेताया

Mon, 25 Nov 2019 02:49 PM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Mon, 25 Nov 2019 02:49 PM IST
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Know about What is anti defection law that Sharad Pawar warned To NCP MLAs supporting Ajit Pawar
शरद पवार - फोटो : PTI
महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर चले ड्रामे के बीच शरद पवार के एक बयान ने काफी सुर्खियां बटोरीं। उन्होंने अपने बयान में कहा था कि राकांपा के बागी विधायकों को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि दलबदल विरोधी कानून है और यह पक्ष बदलने पर लागू होगा।




आइए जानते हैं क्या है ये कानून...
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देवेंद्र फडणवीस-अजित पवार - फोटो : ANI

आखिर क्या है मसला

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के बाद किसी भी पार्टी की सरकार नहीं बन पाई थी। इसके बाद वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। हालांकि बीते शनिवार 23 नवंबर को नाटकीय ढंग से अलसुबह भाजपा के देवेंद्र फडणवीस और एनसीपी के अजित पवार ने सरकार बनाने का दावा ठोक दिया।

यही नहीं राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सुबह ही देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला दी। इस पूरे घटनाक्रम के बाद शरद पवार ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में सफाई भी दी।

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शरद पवार और उद्धव ठाकरे - फोटो : ANI

क्या कहा था एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के अध्यक्ष शरद पवार ने पार्टी के विधायकों को चेतावनी देते हुए कहा था कि जो विधायक अजित पवार का समर्थन कर रहे हैं उनको पता होना चाहिए कि दलबदल विरोधी कानून है और यदि वे पक्ष बदलते हैं तो यह लागू होगा।उन्होंने यह बात मुंबई में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही थी।

शरद पवार ने कहा था कि अजित पवार के साथ केवल 10-11 विधायक हैं और एनसीपी के अधिकांश विधायक उनके साथ हैं। उन्होंने दोहराया कि राकांपा भाजपा के साथ सरकार बनाने का पुरजोर विरोध कर रही है। बात दें कि महाराष्ट्र में वर्तमान में एनसीपी के 54 विधायक हैं।

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नेताओं का दलबदल - फोटो : Amar Ujala

क्या है दलबदल विरोधी कानून?

साल 1985 में विधायकों और सांसदों को उनकी सुविधा और जरूरत के अनुसार जल्दी-जल्दी अपनी पार्टी बदलने से रोकने के लिए दलबदल विरोधी कानून लाया गया था। 1985 से पहले ऐसा कोई कानून नहीं था।इस कानून के ना होने पर विधायक और सांसद अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए पुराने दल को छोड़कर नए दल में शामिल हो जाते थे।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हरियाणा में देखने को मिलता है। यहां एक विधायक गया लाल ने साल 1967 में एक ही दिन में लगभग नौ घंटे के भीतर कांग्रेस में शामिल होने के लिए संयुक्त मोर्चा छोड़ दिया था और फिर से संयुक्त मोर्चा में वापस जाने के लिए कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था।

साल 1985 में नेताओं की इस तरह की गतिविधि पर रोक लगाने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची में उपबंध को जोड़ा गया था। यह एक विधायक या सांसद को दलबदल के लिए अयोग्य ठहराए जाने के आधार को निर्धारित करता है। इसमें किसी विधायक या सांसद का उसकी पार्टी के सदस्या छोड़ने या पार्टी के निर्देशों/व्हिप का पालन नहीं करने पर दलबदल माना जाता है।

आगे पढ़ें: कानून में एक अपवाद भी

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कानून में एक अपवाद भी

दलबदल कानून में एक अपवाद (91वां संविधान संशोधन, वर्ष 2003) भी है। इसके तहत यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई या अधिक विधायक किसी अन्य पार्टी के साथ विलय करने का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें दलबदल के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है। शेष बचे हुए लोग जो अपने दल के साथ ही रहना पसंद करते हैं, वे ऐसे समय में कानूनी कार्रवाई से सुरक्षित रहते हैं।

आगे पढ़ें: क्या है संविधान की दसवीं अनुसूची?

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