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Hindi News ›   India News ›   Kolkata Metro completes 40 years Amar Ujala special conversation with pilot Tapan Kumar

40 की हुई कोलकाता मेट्रो: पहली बार चलाने वाले तपन ने सुनाई दास्तां, कहा-भीड़ इतनी कि दरवाजे नहीं हो रहे थे बंद

Thu, 24 Oct 2024 05:22 AM IST
एन. अर्जुन Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Thu, 24 Oct 2024 05:22 AM IST
सार

कोलकाता मेट्रो को पहली बार चलाने वाले पायलट तपन कुमार ने कहा कि उस दिन हम लगातार कोशिश कर रहे थे कि मेट्रो के दरवाजे बंद हों लेकिन दरवाजे हैं कि बंद ही नहीं हो रहे थे, क्योंकि भीड़ इतनी आ गई थी। देश में पहली बार मेट्रो चल रही थी और हर कोई चाहता था कि वह उसका गवाह बने। 

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Kolkata Metro completes 40 years Amar Ujala special conversation with pilot Tapan Kumar
कोलकाता मेट्रो के 40 साल पूरे - फोटो : पीटीआई

विस्तार

कोलकाता मेट्रो बृहस्पतिवार को 40 साल की हो गई है। 24 अक्तूबर 1984 को धर्मतला से सुबह 8:10 पर पहली बार मेट्रो चली थी। अमर उजाला ने इस पहली मेट्रो को चलाने वाले पायलट तपन कुमार से बातचीत की।

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तपन ने कहा कि उस दिन हम लगातार कोशिश कर रहे थे कि मेट्रो के दरवाजे बंद हों लेकिन दरवाजे हैं कि बंद ही नहीं हो रहे थे, क्योंकि भीड़ इतनी आ गई थी। देश में पहली बार मेट्रो चल रही थी और हर कोई चाहता था कि वह उसका गवाह बने। धर्मतला मेट्रो स्टेशन पर लोगों की इतनी भीड़ थी कि उनको संभालना मुश्किल हो रहा था। तपन कहते हैं, मुझे व संजय कुमार को सुरक्षा अधिकार किसी तरह अंदर लेकर गए। पहली मेट्रो  3.4 किमी की दूरी तय कर भवानीपुर (अब नेताजी भवन) 8.18 मिनट पर पहुंची। जब ट्रेन भवानीपुर पहुंची तो कई यात्री उतरने को तैयार ही नहीं था।
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चार महीने मॉस्को में लिया था प्रशिक्षण
तपन कुमार ने बताया कि उनकी मेट्रो रेलवे में भर्ती के बाद रेलवे की ओर से 6 लोगों को मेट्रो चलाने के लिए चुना गया। कुल दो वर्ष का प्रशिक्षण हुआ था। अधिकतर प्रशिक्षण भारत में ही हुआ। बाकी चार महीने के लिए उनको रूस की राजधानी मॉस्को भेजा गया था। सितंबर 1983 को वे मॉस्को गए थे और जनवरी, 1984 को वे प्रशिक्षण लेकर वापस भारत लौटे। इस दौरान दस दिन का प्रशिक्षण सेंट पीटर्सबर्ग में दिया गया। उन्होंने बताया क्योंकि भारत में पहली बार मेट्रो चल रही थी और वह भी भूमिगत तो उनको भूमिगत मेट्रो का प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान सिखाया गया कि किस तरह से दरवाजे लॉक करना है, किस गति से मेट्रो को चलान है। और बाकी सावधानियों का प्रशिक्षण दिया गया।
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किसी तरह की कोई घबराहट नहीं हुई
तपन ने बताया कि पहली बार मट्रो चलाने में किसी तरह की कोई घबराहट या दिक्कत नहीं हुई। क्योंकि हमें भूमिगत मेट्रो चलाने की प्रशिक्षण के लिए ही मॉस्को भेजा गया था। क्योंकि तब तक देश में अंडरग्राउंड मेट्रो तो था नहीं। हमने मॉस्को में पैसेंजर ट्रेन भी चलाई। ताकि उन सभी अनुभव हमें मिल सके, जो भूमिगत मेट्रो चलाने के दौरान जरूरत होती है।


हमें लगता है कि मेट्रो तो हमारा बच्चा है
तपन कहते हैं, जब हमने मेट्रो ज्वाइन किया तब तो मेट्रो नहीं था। आज हमें मेट्रो अपना बच्चा जैसा लगता है। आज से चालीस साल पहले हमने जैसे एक बच्चे को हाथ पकड़ कर सिखाते हैं, वैसे ही मेट्रो को चलना सिखाया। आज कोलकाता मेट्रो जवान हो गई है और जिम्मेदार भी। आज मेट्रो कोलकाता की लाइफ लाइन बन गई है। आप बहुत आसानी और सुगमता से लोग एक जगह से दूसरी जगह यात्रा कर पा रहे हैं। सबसे बड़ी बात है कि मेट्रो समय की पाबंद है। यह हमारे लिए बड़ी उपलब्धि है। आज हम गर्व महसूस करते हैं कि हम इस मेट्रो परिवार के साथ जुड़े हुए हैं। कहते हैं, देश के हर बड़े शहर में मेट्रो सेवा शुरू होनी चाहिए, क्योंकि मेट्रो अनेक समस्याओं का एक हल है।

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