कुरुक्षेत्र: जम्मू-कश्मीर के नतीजे तय करेंगे आजाद की नई पारी, 'स्टार्टअप' सफल रहा तो कांग्रेस को देंगे चुनौती
Ghulam Nabi Azad: गुलाम नबी आजाद को जानने वाले कांग्रेस के ही एक नेता का कहना है कि आजाद बेहद आत्मकेंद्रित व्यक्ति हैं। उन्होंने पहले जी-23 के जरिए दबाव बनाकर अपने लिए राज्यसभा लेने और पार्टी में पहले जैसा रुतबा पाने की कोशिश की, लेकिन विफल रहे...
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गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने के बाद उनकी भावी राजनीति पर सबकी नजरें हैं। गुलाम नबी आजाद का राजनीतिक भविष्य जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों पर टिका है। वह राजनीति का जो स्टार्टअप बना रहे हैं, उसमें सियासी निवेश जम्मू-कश्मीर से कितना होता है इस पर उनकी इस स्टार्टअप कामयाबी या नाकामयाबी टिकी है। आजाद अगर कश्मीर में कामयाब हुए तो वह सियासी स्टार्टअप का विस्तार कांग्रेस के समानांतर राष्ट्रीय दल के रूप में करने की कोशिश करेंगे और कांग्रेस के उन नेताओं को नया मंच प्रदान करेंगे, जो कांग्रेस के प्रथम परिवार की रीति नीति से खुश नहीं हैं। और अगर आजाद के स्टार्टअप को जम्मू-कश्मीर की जनता ने माकूल सियासी निवेश नहीं दिया, तो सियासी जोड़-तोड़ करके वे फिर राज्यसभा में आ सकते हैं।
आजाद ने जी-23 गुट के नेताओं को दिया झटका
दूसरी तरफ कांग्रेस में उनकी अगुआई में बने जी-23 गुट के कई नेता आजाद के इस अप्रत्याशित कदम से झटका खा गए हैं क्योंकि उनकी योजना गुलाम नबी की अगुआई में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में अपने किसी प्रतिनिधि को चुनाव लड़वाने और जितवाने की थी, लेकिन गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर इस योजना को कमजोर कर दिया। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस नेता आनंद शर्मा, मनीष तिवारी, पृथ्वीराज चव्हाण और भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने आजाद से यह शिकवा किया है कि उन्हें इस तरह अपने साथियों को विश्वास में लिए बिना ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए था और पार्टी में रहते हुए अपनी लड़ाई लड़नी चाहिए थी। हालांकि इन नेताओं का कहना है कि उनकी यह मुलाकात महज शिष्टाचार भेंट थी, क्योंकि गुलाम नबी आजाद उनके दशकों पुराने सहयोगी रहे हैं। आजाद से मिलने गए भूपेंद्र सिंह हुड्डा के एक करीबी सूत्र के मुताबिक हुड्डा ने उन्हें यह सलाह दी है कि वह कांग्रेस नेतृत्व और राहुल गांधी पर जो कह चुके हैं अब उसे न दोहराएं और न ही उससे ज्यादा कुछ कहें। जब उन्होंने पार्टी छोड़ दी है तो अब अपनी पुरानी पार्टी के दोष गिनाने की बजाय अपने आगे के कदमों पर ध्यान दें।
जवाब में गुलाम नबी ने उन्हें अपनी जो योजना बताई, उसके मुताबिक जल्दी ही वह एक नई पार्टी बनाएंगे, जिसका नाम और चरित्र राष्ट्रीय होगा। लेकिन शुरू में उनका यह राजनीतिक प्रयोग जम्मू-कश्मीर में होगा और विधानसभा चुनाव में यह नई पार्टी मैदान में उतरेगी। आजाद ने इन नेताओं को भरोसा दिलाया कि जिस तरह जम्मू-कश्मीर में उनके कदम का कांग्रेस के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता समर्थन कर रहे हैं, उससे चुनावों में उनकी नई पार्टी को आशातीत कामयाबी मिलेगी और इसके बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प तैयार करेंगे और तब उन्हें पार्टी के तमाम नेता और कार्यकर्ताओं का समर्थन मिलेगा।
लेकिन आजाद को बेहद करीब से जानने वाले एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का कहना है कि गुलाम नबी आजाद कब क्या करेंगे ये उनके सिवा कोई दूसरा नहीं जानता है। करीब पचास सालों से कांग्रेस की राजनीति में विभिन्न पदों पर रहे इस कांग्रेस नेता के मुताबिक आजाद ने नेतृत्व और राहुल गांधी पर जो भी आरोप लगाए हैं, खुद आजाद की कार्यशैली भी उससे अलग कभी नहीं रही है। वह कांग्रेस के उन नेताओं में हैं, जिन्हें पार्टी ने सबसे ज्यादा और सब कुछ दिया। जिसका जिक्र खुद आजाद ने अपने त्यागपत्र में किया है।
इस नेता का कहना है कि आजाद की अगुआई में जी-23 ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को जो पत्र लिखा था, उसके ड्राफ्ट की जानकारी भी आजाद के अलावा सिर्फ दो और नेताओं को थी और बाकियों से उनके दस्तखत बिना पत्र दिखाए और पढ़ाए लिए गए थे। इस नेता ने यह भी बताया कि 2018 में आजाद ने ही यह बयान दिया था कि कांग्रेस में कार्यसमिति के चुनाव की कोई परंपरा नहीं है। जबकि अब वही पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को लेकर शिकायत कर रहे हैं।
नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के साथ कर सकते हैं चुनावी समझौता
गुलाम नबी आजाद को जानने वाले कांग्रेस के ही एक और नेता का कहना है कि आजाद बेहद आत्मकेंद्रित व्यक्ति हैं। उन्होंने पहले जी-23 के जरिए दबाव बनाकर अपने लिए राज्यसभा लेने और पार्टी में पहले जैसा रुतबा पाने की कोशिश की, लेकिन विफल रहे। अब उन्होंने अपने साथियों को भरोसे में लिए बिना पार्टी छोड़कर नया रास्ता पकड़ा है। हाल ही में दिल्ली में उनके सरकारी आवास को मिला एक्सटेंशन और आजाद द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ से काफी कुछ संकेत मिल जाता है। अब वह नया दल बनाकर जम्मू-कश्मीर में अपने उम्मीदवारों को चुनाव लड़वाएंगे। मुमकिन है कि वह नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के साथ कोई चुनावी समझौता करें और कांग्रेस के खिलाफ वही भूमिका निभाएं जो बिहार में चिराग पासवान ने जनता दल (यू) के खिलाफ निभाई थी। विधानसभा अगर त्रिशंकु हुई जिसकी काफी संभावना हो सकती है और आजाद की नई पार्टी के कुछ विधायक जीत गए, तो गुलाम नबी, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के साथ साझा सरकार बनाकर मुख्यमंत्री भी हो सकते हैं और अगर नेंका एवं पीडीपी तैयार नहीं हुए, तो वह भाजपा के साथ भी साझा सरकार बनाकर मुख्यमंत्री बन सकते हैं। और अगर इसमें भी कामयाब नहीं हुए तो जम्मू-कश्मीर से अपने लिए राज्यसभा का जुगाड़ तो कर ही लेंगे। लेकिन ये सब निर्भर करेगा कि उनके नए दल की सीटें कितनी आती हैं।
अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर घिर सकते हैं आजाद
इधर कांग्रेस में गुलाम नबी आजाद के पार्टी छोड़ने से होने वाले संभावित नुकसान से निपटने की तैयारी शुरू कर दी है। एक तरफ कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी जयराम रमेश समेत दिग्विजय सिंह, सचिन पायलट जैसे कई दिग्गज नेताओं ने पार्टी नेतृत्व और राहुल गांधी पर लगाए गए गुलाम नबी के आरोपों पर पलटवार किया है, तो दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर की प्रभारी रजनी पाटिल ने राज्य के उन नेताओं से बातचीत शुरू कर दी है, जिन्हें गुलाम नबी आजाद के विरोधी खेमे का माना जाता रहा है। क्योंकि गुलाम नबी आजाद के समर्थक कई नेता उनसे मिलकर पार्टी छोड़ने का एलान कर चुके हैं। कांग्रेस की कोशिश होगी कि गुलाम नबी को जम्मू-कश्मीर में ही नाकाम कर दिया जाए, ताकि वे राष्ट्रीय स्तर पर कोई चुनौती पेश करने के काबिल ही न रहें। इसके लिए कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी से भी यह अनुरोध कर सकती है कि वो गुलाम नबी आजाद के साथ कोई सियासी गठजोड़ न करें। क्योंकि कांग्रेस दोनों ही दलों से राज्य में गठजोड़ करके सरकार बना चुकी है। गुलाम नबी जब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने थे तब कांग्रेस ने पीडीपी के साथ मिलकर ही सरकार बनाई थी और राज्य में में तीन-तीन साल के लिए दोनों दलों के मुख्यमंत्री बनने का समझौता हुआ था। जबकि नेशनल कांफ्रेंस के साथ कांग्रेस ने सरकार में साझीदारी तो की, लेकिन मुख्यमंत्री पद नेकां के उमर अब्दुल्ला के पास ही रहा था।
अगर नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी को गुलाम नबी से दूर करने में कांग्रेस कामयाब हुई तो गुलाम नबी आजाद के लिए अपने दल के विधायक जिताना बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि वह कांग्रेस का नुकसान तो कर सकते हैं लेकिन अकेले अपने दम पर कितने विधायक जिता पाएंगे यह कहना मुश्किल है। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में उन्हें नेशनल कांफ्रेंस या पीडीपी का साथ लेना जरूरी होगा क्योंकि भाजपा का खुलकर साथ लेने पर यहां की बड़ी मुस्लिम आबादी न सिर्फ उन्हें खारिज कर देगी बल्कि आजाद के लिए भी अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर अपने पुराने रुख को बदलना आसान नहीं होगा। कुल मिलाकर गुलाम नबी आजाद की नई पारी का फैसला जम्मू-कश्मीर के आवाम के ही हाथ में है जहां से आजाद ने अपनी राजनीति शुरू की थी।