Explainer: जिस कोयला घोटाला में बंद हुआ मनमोहन सिंह के खिलाफ केस, उसमें क्या थे उन पर आरोप, जांच में क्या हुआ?
जिस मामले में मनमोहन सिंह को उनके निधन के 19 महीने बाद क्लीन चिट मिली है, वह क्या था? इस मामले में मनमोहन सिंह पर क्या आरोप थे? सीबीआई की तरफ से जांच में क्या सामने आया? अब केंद्रीय एजेंसी ने अदालत से पूर्व पीएम के खिलाफ केस बंद करने की मांग क्यों की? आइये जानते हैं...
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विस्तार
गौरतलब है कि सीबीआई ने अपनी जांच में मनमोहन सिंह को कोयला घोटाला मामले में क्लीन चिट दी है। इसी के मद्देनजर सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दायर की। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागती और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने इस अपील को स्वीकार किया और केस बंद करने की सहमति दे दी।
पहले जानें- क्या है कथित कोयला आवंटन में गड़बड़ी का मामला?
कथित कोयला आवंटन घोटाला, जिसे कई धड़ों में कोल गेट के नाम से भी जाना जाता है, भारत सरकार की सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों को कोयला खदानों के आवंटन से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक और वित्तीय घोटाला कहा जाता रहा है। हालांकि, इससे जुड़े अधिकतर मामले अब धीरे-धीरे या तो बंद हो गए हैं या फिर इनसे जुड़े आरोपियों को लगातार क्लीन चिट मिल रही है।कैसे उठा यह मामला?
यह पूरा मामला नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट के बाद देश के सामने आया था। सीएजी के ऑडिट के मुताबिक, सरकार ने 2004 से 2009 (मुख्य रूप से 1993 से 2010 के बीच) के दौरान कोयला ब्लॉकों का आवंटन प्रतिस्पर्धी बोली या खुली नीलामी के बजाय एक अपारदर्शी स्क्रीनिंग कमेटी के प्रशासनिक फैसलों के माध्यम से किया। सरकार के पास नीलामी के जरिए आवंटन करने का अधिकार था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि पारदर्शी नीलामी न करने के कारण कंपनियों को भारी फायदा हुआ और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा। सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में इन कंपनियों को 10.67 लाख करोड़ रुपये के मुनाफे का अनुमान लगाया गया था, जिसे अंतिम रिपोर्ट में संशोधित करके 1.86 लाख करोड़ रुपये बताया गया। यानी सरकार को प्रक्रिया में गड़बड़ी की वजह से करीब इतने ही नुकसान का अनुमान लगाया गया था।
कैसे शुरू हुई मामले की जांच
इस मामले में केंद्रीय विजिलेंस आयोग (सीवीसी) के निर्देश पर जब सीबीआई ने जांच शुरू की, तो पाया गया कि कई कंपनियों ने ब्लॉक हासिल करने के लिए गलत तरीके अपनाए। कंपनियों पर अपनी वित्तीय क्षमता बढ़ा-चढ़ाकर बताने, पिछले आवंटनों की जानकारी छिपाने और कोयला खनन करने के बजाय प्राकृतिक संसाधनों की जमाखोरी करने जैसे गंभीर आपराधिक आरोप लगे। इस घोटाले में तत्कालीन यूपीए सरकार के कई बड़े नेताओं, नौकरशाहों और निजी कंपनियों के उद्योगपतियों पर भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के आरोप लगे।साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह से मनमाना और अवैध मानते हुए, 1993 से आवंटित किए गए 218 में से 214 कोयला ब्लॉकों के आवंटन को रद्द कर दिया। इसके साथ ही त्वरित न्याय के लिए सीबीआई की एक विशेष अदालत भी गठित की गई।
इस मामले में मनमोहन सिंह पर क्या आरोप लगे थे?
कथित कोयला आवंटन घोटाले में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर मुख्य तौर पर इसलिए सवाल उठे क्योंकि विवादित आवंटन के दौरान खासकर 2004 से कोयला मंत्रालय का प्रभार उन्हीं के पास था।तालाबिरा-II ब्लॉक का आवंटन: डॉ. मनमोहन सिंह पर मुख्य आरोप 2005 में ओडिशा के तालाबिरा-II कोयला ब्लॉक को हिंडाल्को इंडस्ट्रीज को आवंटित करने से जुड़ा था। जांच में यह आरोप लगा था कि इस आवंटन को मंजूरी देने से एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी (पीएसयू) को वित्तीय नुकसान हुआ और एक निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
नीलामी की चेतावनियों की अनदेखी: तत्कालीन कोयला सचिव पीसी. पारेख, जिन्हें इस मामले का व्हिसलब्लोअर माना जाता है, ने दावा किया कि उन्होंने 2004 में ही प्रधानमंत्री को विवेकाधीन आवंटन प्रक्रिया में धोखाधड़ी की संभावना के बारे में लिखित रूप में सूचित किया था और खुली नीलामी की वकालत की थी। आरोप था कि प्रधानमंत्री ने इसे नजरअंदाज कर दिया और उनके कोयला मंत्रालय के कार्यकाल में बिना नीलामी के 142 कोयला ब्लॉक आवंटित कर दिए गए।
भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के आरोप: मार्च 2015 में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने डॉ. मनमोहन सिंह, पीसी. पारख, कुमार मंगलम बिड़ला और अन्य को आपराधिक साजिश (आईपीसी की धारा-120), लोक सेवक द्वारा विश्वासघात (धारा 409) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराओं के तहत आरोपी मानते हुए समन जारी किया था।
सीबीआई की तरफ से जांच में क्या सामने आया?
- सीबीआई ने इस मामले की जांच में यह निष्कर्ष निकाला कि डॉ. मनमोहन सिंह पर मुकदमा चलाने के लिए कोई भी साक्ष्य या आधार मौजूद नहीं है। इसी के चलते सीबीआई ने उन्हें क्लीन चिट देते हुए अदालत में एक नहीं, बल्कि दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी और मामला बंद करने की सिफारिश की।
- सीबीआई की तरफ से क्लीन चिट दिए जाने के बावजूद, मार्च 2015 में विशेष सीबीआई अदालत(ट्रायल कोर्ट) ने इन क्लोजर रिपोर्ट्स को खारिज कर दिया और अपनी तरफ से संज्ञान लेते हुए डॉ. सिंह को बतौर आरोपी समन जारी कर दिया। इसके बाद सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
अब मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया, क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में उनके निधन के डेढ़ साल बाद दोषमुक्त कर दिया है। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में कई अहम कदम उठाए और टिप्पणियां भी कीं।सुप्रीम कोर्ट ने क्या कदम उठाए?
निचली अदालत का समन रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने विशेष सीबीआई अदालत के 2015 के उस आदेश को पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिसमें डॉ. सिंह को बतौर आरोपी समन भेजा गया था।सीबीआई की क्लीन चिट मंजूर: अदालत ने सीबीआई की ओर से पेश की गई केस बंद करने की अपील वाली क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किया। इसमें पूर्व पीएम को क्लीन चिट दी गई थी। इसके साथ ही उनके खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद कर दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सीबीआई ने अपनी जांच के बाद उन्हें क्लीन चिट दे दी थी तो निचली अदालत के पास इस क्लोजर रिपोर्ट को नामंजूर करने और डॉ. सिंह के खिलाफ संज्ञान लेने का कोई ठोस या वैध कारण नहीं था। पीठ ने यह भी कहा कि विशेष जज ने जांच एजेंसियों की ओर से दायर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों को लागू करने में चूक की।चूंकि सीबीआई दो बार यह कह चुकी थी कि मुकदमा चलाने के लिए कोई सबूत या सामग्री नहीं है, इसलिए निचली अदालत को उन नतीजों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए था।
- मनमोहन सिंह से जुड़े केस पर सुप्रीम कोर्ट
इस फैसले के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी रूप से अब यह स्थापित कर दिया कि डॉ. मनमोहन सिंह पर मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं था, जिससे इस मामले में उन्हें ऐतिहासिक और पूर्ण न्याय मिला।