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Lipulekh: क्या है लिपुलेख पास का इतिहास? इस रास्ते से कैलाश मानसरोवर की यात्रा से क्यों है नेपाल को एतराज

आईएएनएस, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Mon, 04 May 2026 05:23 PM IST
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सार

नेपाल ने कैलाश मानसरोवर यात्रा को लिपुलेख पास से गुजरने पर आपत्ति जताई है। हालांकि भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी कर स्थिति साफ कर दी है। आइए जानते हैं कि नेपाल को क्या है आपत्ति और क्या है लिपुलेख का इतिहास। 

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कैलाश मानसरोवर की जल्द होने वाली है शुरुआत - फोटो : आईएएनएस
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विस्तार

कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख पास के इस्तेमाल को लेकर नेपाल की बालेंद्र शाह की सरकार ने परेशानी खड़ी कर दी है। नेपाल सरकार का कहना है कि भारत और चीन के लिए कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने को लिपुलेख की जमीन का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, इस पर भारत के विदेश मंत्रालय की तरफ से भी बयान सामने आ चुका है। आइए जानते हैं कि लिपुलेख से होकर मानसरोवर की यात्रा को लेकर बालेंद्र शाह की सरकार को क्या ऐतराज है। 
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क्या है कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर क्यों है नेपाल को आपत्ति?
दरअसल, भारत के विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल को कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 को फिर से शुरू करने की घोषणा की, जो जून और अगस्त के बीच होनी है। इसमें 50-50 तीर्थयात्रियों के दस बैच उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से तिब्बत जाएंगे। इसके बाद ही नेपाल की तरफ से इस मामले में ऐतराज जताया गया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने रविवार को एक आधिकारिक बयान में कहा कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी, महाकाली नदी के पूरब में बसे इलाके हैं, जो 1816 की सुगौली संधि के बाद से नेपाल का अहम हिस्सा रहे हैं।
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विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसने डिप्लोमैटिक तरीकों से भारत और चीन दोनों को अपनी स्थिति और चिंताएं बता दी हैं और अपनी पुरानी मांग दोहराई है कि भारत इस इलाके में सड़क बनाने, बॉर्डर पर व्यापार और तीर्थयात्रा जैसे किसी भी काम से दूर रहे। इसके साथ ही इसने यह भी पुष्टि की है कि लिपुलेख इलाके पर नेपाल के दावे के बारे में चीन को आधिकारिक तौर पर बता दिया गया है।

नेपाल की आपत्ति पर भारत ने क्या कहा?
वहीं, नेपाल के दावे को लेकर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा, 'इस बारे में भारत का रुख एक जैसा और साफ रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक पुराना रास्ता रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से होती आ रही है। यह कोई नई बात नहीं है। जहां तक इलाके के दावों की बात है, भारत ने हमेशा कहा है कि ऐसे दावे न तो सही हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित हैं। इलाके के दावों को इस तरह एकतरफा बनावटी तरीके से बढ़ाना सही नहीं है।' जायसवाल ने कहा, 'भारत, नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों के सभी मुद्दों पर कंस्ट्रक्टिव बातचीत के लिए तैयार है, जिसमें बातचीत और डिप्लोमेसी के जरिए तय सीमा मुद्दों को सुलझाना भी शामिल है।'

लिपुलेख क्यों है अहम?
लिपुलेख पास हिमालय में स्थित एक ऊंचा दर्रा है। यह भारत के उत्तराखंड, नेपाल और चीन का त्रिकोणीय जंक्शन है। 1962 के बाद से इस क्षेत्र पर भारतीय सुरक्षा बलों का नियंत्रण है। हालांकि, नेपाल इस पर अपना दावा करता है। भारत के पास इसके ऐतिहासिक सबूत भी रहे हैं। 1954 से भारत के श्रद्धालु लिपुलेख पास के रास्ते से ही कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते हैं। 2015 में भारत और चीन ने लिपुलेख को व्यापार और यात्रा के लिए खोलने पर सहमति जताई थी। हालांकि, इस फैसले में नेपाल शामिल नहीं हुआ था। इसके बाद, 2025 में फिर से भारत और चीन लिपुलेख को व्यापार और यात्रा के लिए खोलने पर राजी हुए। इस बार भी नेपाल ने अपनी नाराजगी जताई। नेपाल के पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली ने इस मुद्दे को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने उठाया, लेकिन कोई हल नहीं निकला।


 
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