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विजय पदार्पण के साथ ही सत्ता के करीब: 8 ग्राम सोना मुफ्त जैसे वादों से द्रविड़ किला फतह, मिलेगा कांटों भरा ताज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: राकेश कुमार
Updated Mon, 04 May 2026 05:21 PM IST
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सार
विजय ने फिल्मी पर्दे की चमक को चुनावी जीत में बदलकर इतिहास तो रच दिया है, लेकिन सत्ता का सिंहासन बहुत कठिन है। यह जीत केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस बदलाव की है जिसका इंतजार तमिलनाडु वर्षों से कर रहा था। अब देखना होगा कि क्या विजय अपने 'वेलफेयर मॉडल' और 'एआई गवर्नेंस' के जरिए एक सफल प्रशासक बन पाते हैं या यह जीत केवल एक बड़ा फिल्मी सपना बनकर रह जाएगी। विजय की राह में कई चुनौतियां भी हैं। जानिए कैसे?
थलापति विजय, टीवीके प्रमुख
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
तमिलनाडु की राजनीति में आज का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। 4 मई 2026 की सुबह जब वोटों की गिनती शुरू हुई, तो रुझानों ने सबको हैरान कर दिया। सुपरस्टार विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम यानी टीवीके ने ऐसा सियासी 'भूकंप' ला दिया है जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। दशकों से राज्य पर राज करने वाली डीएमके और एआईएडीएमके पीछे छूटती दिख रही है। रुझानों में विजय की पार्टी 100 से ज्यादा सीटों पर बढ़त बनाकर सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी है। विजय खुद पेरांबुर और तिरुचिरापल्ली ईस्ट जैसी दोनों सीटों पर बड़े अंतर से आगे चल रहे हैं। यह पहली बार चुनाव लड़ रही किसी पार्टी के लिए एक करिश्माई प्रदर्शन है।
कैसे हुआ विजय का सियासी उदय?
विजय ने साल 2024 में जब अपनी पार्टी बनाई, तभी से उन्होंने जमीन पर काम करना शुरू कर दिया था। उनकी फिल्मी लोकप्रियता तो थी ही, लेकिन उन्होंने इसे केवल 'स्टार पावर' तक सीमित नहीं रखा। विजय ने अपने पुराने फैन क्लब 'विजय मक्कल इयक्कम' को एक अनुशासित राजनीतिक फौज में बदल दिया। उन्होंने युवाओं और महिलाओं को सीधे अपना निशाना बनाया। लोग डीएमके पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और पुरानी राजनीति से थक चुके थे। ऐसे में विजय ने साफ-सुथरी छवि और सिस्टम बदलने का वादा किया, जिसे जनता ने हाथों-हाथ लिया। राज्य में 85% मतदान होना इस बात का सबूत था कि लोग बदलाव चाहते थे।
घोषणापत्र के वो वादे जिन्होंने बदली हवा
विजय ने अप्रैल 2026 में अपना घोषणापत्र जारी किया था। उन्होंने कहा था कि वे केवल वही वादे करेंगे जो पूरे किए जा सकें। उनके वादों ने हर वर्ग को छुआ।
महिलाओं के लिए: घर की महिला मुखिया को हर महीने ₹2,500 की सीधी मदद। साल में 6 मुफ्त गैस सिलेंडर। गरीब बेटियों की शादी के लिए 8 ग्राम सोना और सिल्क साड़ी। स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त कर्ज।
युवाओं के लिए: देश में पहली बार 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (एआई) मंत्रालय बनाने का वादा। बेरोजगार स्नातकों को 4,000 रुपये और डिप्लोमा वालों को 2,500 रुपये का मासिक भत्ता। बिना किसी गारंटी के 25 लाख रुपये तक का एजुकेशन लोन।
किसानों के लिए: छोटे किसानों का कर्ज माफ करने और कुछ फसलों पर 3,500 रुपये प्रति क्विंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने का वादा।
आम जनता के लिए: हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली और 25 लाख रुपये तक का बड़ा हेल्थ इंश्योरेंस कवर।
जीत के बाद असली परीक्षा
भले ही विजय आज जीत का जश्न मना रहे हों, लेकिन उनकी राह में कांटों की कमी नहीं है। अगर विजय सीएम बनते हैं तो उनके सामने चुनौतियों का एक बड़ा हिमालय खड़ा है। सबसे बड़ी चुनौती 'पैसा' है। तमिलनाडु पर पहले से ही करीब आठ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है। विजय के लोकलुभावन वादों को पूरा करने के लिए सरकार को 4 से 12 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त बजट की जरूरत होगी। बिना राजस्व बढ़ाए इतने पैसे कहां से आएंगे, यह एक बड़ा सवाल है।
विजय के पास राजनीतिक अनुभव की कमी
दूसरी बड़ी चुनौती 'अनुभव' की है। विजय और उनकी टीम के पास सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है। उन्हें राज्य की अनुभवी ब्यूरोक्रेसी और अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाना होगा। विपक्ष में डीएमके और एआईएडीएमके जैसे पुराने खिलाड़ी बैठे हैं, जो उन्हें सदन से लेकर सड़क तक हर मोड़ पर घेरने की कोशिश करेंगे। इसके अलावा, केंद्र सरकार के साथ संबंध बनाना और तमिलनाडु की 1.5 ट्रिलियन यानी 1 लाख 50 हजार करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था के सपने को सच करना भी उनके लिए बहुत कठिन होगा। अगर विजय शुरुआती छह महीनों में अपने वादों को जमीन पर नहीं उतार पाए, तो जनता की यही उम्मीदें गुस्से में बदल सकती हैं।
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कैसे हुआ विजय का सियासी उदय?
विजय ने साल 2024 में जब अपनी पार्टी बनाई, तभी से उन्होंने जमीन पर काम करना शुरू कर दिया था। उनकी फिल्मी लोकप्रियता तो थी ही, लेकिन उन्होंने इसे केवल 'स्टार पावर' तक सीमित नहीं रखा। विजय ने अपने पुराने फैन क्लब 'विजय मक्कल इयक्कम' को एक अनुशासित राजनीतिक फौज में बदल दिया। उन्होंने युवाओं और महिलाओं को सीधे अपना निशाना बनाया। लोग डीएमके पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और पुरानी राजनीति से थक चुके थे। ऐसे में विजय ने साफ-सुथरी छवि और सिस्टम बदलने का वादा किया, जिसे जनता ने हाथों-हाथ लिया। राज्य में 85% मतदान होना इस बात का सबूत था कि लोग बदलाव चाहते थे।
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घोषणापत्र के वो वादे जिन्होंने बदली हवा
विजय ने अप्रैल 2026 में अपना घोषणापत्र जारी किया था। उन्होंने कहा था कि वे केवल वही वादे करेंगे जो पूरे किए जा सकें। उनके वादों ने हर वर्ग को छुआ।
महिलाओं के लिए: घर की महिला मुखिया को हर महीने ₹2,500 की सीधी मदद। साल में 6 मुफ्त गैस सिलेंडर। गरीब बेटियों की शादी के लिए 8 ग्राम सोना और सिल्क साड़ी। स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त कर्ज।
युवाओं के लिए: देश में पहली बार 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (एआई) मंत्रालय बनाने का वादा। बेरोजगार स्नातकों को 4,000 रुपये और डिप्लोमा वालों को 2,500 रुपये का मासिक भत्ता। बिना किसी गारंटी के 25 लाख रुपये तक का एजुकेशन लोन।
किसानों के लिए: छोटे किसानों का कर्ज माफ करने और कुछ फसलों पर 3,500 रुपये प्रति क्विंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने का वादा।
आम जनता के लिए: हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली और 25 लाख रुपये तक का बड़ा हेल्थ इंश्योरेंस कवर।
जीत के बाद असली परीक्षा
भले ही विजय आज जीत का जश्न मना रहे हों, लेकिन उनकी राह में कांटों की कमी नहीं है। अगर विजय सीएम बनते हैं तो उनके सामने चुनौतियों का एक बड़ा हिमालय खड़ा है। सबसे बड़ी चुनौती 'पैसा' है। तमिलनाडु पर पहले से ही करीब आठ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है। विजय के लोकलुभावन वादों को पूरा करने के लिए सरकार को 4 से 12 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त बजट की जरूरत होगी। बिना राजस्व बढ़ाए इतने पैसे कहां से आएंगे, यह एक बड़ा सवाल है।
विजय के पास राजनीतिक अनुभव की कमी
दूसरी बड़ी चुनौती 'अनुभव' की है। विजय और उनकी टीम के पास सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है। उन्हें राज्य की अनुभवी ब्यूरोक्रेसी और अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाना होगा। विपक्ष में डीएमके और एआईएडीएमके जैसे पुराने खिलाड़ी बैठे हैं, जो उन्हें सदन से लेकर सड़क तक हर मोड़ पर घेरने की कोशिश करेंगे। इसके अलावा, केंद्र सरकार के साथ संबंध बनाना और तमिलनाडु की 1.5 ट्रिलियन यानी 1 लाख 50 हजार करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था के सपने को सच करना भी उनके लिए बहुत कठिन होगा। अगर विजय शुरुआती छह महीनों में अपने वादों को जमीन पर नहीं उतार पाए, तो जनता की यही उम्मीदें गुस्से में बदल सकती हैं।
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