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Sabarimala: महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामले में फैसला सुरक्षित, संविधान पीठ में सुनवाई पूरी

पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Thu, 14 May 2026 05:36 PM IST
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सार

सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित तौर पर अनुरोध किया था कि इस पर प्रतिबंध बरकरार रहे। इसी तरह अन्य धार्मिक स्थलों पर भी महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं।

Nine judge Supreme Court bench reserves order on pleas pertaining to religious discrimination against women
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गुरुवार को केरल के सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव की याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। इसमें विभिन्न धर्मों द्वारा प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाएं भी शामिल हैं। यह मामला लंबे समय से विचाराधीन था और इसने देश भर में महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी थी।
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सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की 16 दिनों तक सुनवाई की। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ताओं सी.एस. वैद्यनाथन, अभिषेक सिंघवी, मुकुल रोहतगी, इंदिरा जयसिंह, नीरज किशन कौल और गोपाल शंकरनारायणन सहित कई प्रमुख कानूनी दिग्गजों ने अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए। पीठ में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसनउद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वाराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे।
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सबरीमाला मंदिर में प्रतिबंध बरकरार रखने की मांग
सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने लिखित दलीलें पेश की थीं और शीर्ष अदालत से सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म वाली आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को बरकरार रखने का अनुरोध किया था। केंद्र सरकार का तर्क था कि यह मुद्दा धार्मिक विश्वास और सांप्रदायिक स्वायत्तता के दायरे में आता है और न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है।

गौरतलब है कि सितंबर 2018 में पांच-न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। सदियों पुरानी इस हिंदू धार्मिक प्रथा को अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली एक अन्य पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने 3:2 के बहुमत से विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ को सौंप दिया था।

बड़ी पीठ के समक्ष उठाए गए क्या सवाल?
उस समय पीठ ने विभिन्न धर्मों में स्वतंत्रता से संबंधित व्यापक मुद्दे उठाए थे, यह कहते हुए कि उन्हें किसी विशेष मामले के तथ्यों के बिना तय नहीं किया जा सकता है। सबरीमाला मामले के अलावा, इस फैसले में मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश और गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के पवित्र अग्नि स्थल में प्रवेश के मुद्दों को भी बड़ी पीठ को भेजा गया था।

16 फरवरी को शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह इस मामले की अंतिम सुनवाई सात अप्रैल को शुरू करेगी, जिसके 22 अप्रैल तक समाप्त होने की उम्मीद थी। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल मेहता ने सबरीमाला फैसले की समीक्षा के लिए दायर याचिकाओं का समर्थन किया था, जिसने केरल के पहाड़ी मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी।

धार्मिक स्वतंत्रता पर संविधान के अनुच्छेद
इससे पहले शीर्ष अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सात प्रश्न पढ़े थे, जिन्हें उसने तैयार किया था। पीठ ने कहा कि वह उठाए गए मुद्दों में जोड़ और घटाव के लिए तैयार है और "भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे और सीमा" पर विचार करेगी। दूसरे मुद्दे के बारे में, उसने कहा, "भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों के बीच क्या संबंध है?" तीसरा प्रश्न यह है कि क्या अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अलावा अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।

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चौथा प्रश्न था, "संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत 'नैतिकता' शब्द के दायरे और सीमा क्या है, और क्या इसका मतलब संवैधानिक नैतिकता को शामिल करना है?" पीठ ने यह भी कहा कि वह अनुच्छेद 25 के तहत संदर्भित धार्मिक प्रथाओं के संबंध में "न्यायिक समीक्षा के दायरे और सीमा" की भी जांच करेगी। "भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (बी) में उल्लिखित 'हिंदुओं के वर्ग' अभिव्यक्ति का क्या अर्थ है?" यह छठा मुद्दा था। शीर्ष अदालत ने सातवें प्रश्न के रूप में यह जांच करने के लिए कहा कि क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, वह जनहित याचिका दायर करके उस "धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह" की प्रथा पर सवाल उठा सकता है।
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