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पद्मश्री गीता उपाध्याय का निधन: भारतीय नेपाली साहित्य के एक युग का अंत, साहित्य जगत में शोक की लहर

Wed, 15 Jul 2026 03:08 AM IST
N Arjun एन अर्जुन
Updated Wed, 15 Jul 2026 03:08 AM IST
सार

पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार गीता उपाध्याय का निधन हो गया। भारतीय नेपाली और असमिया साहित्य की इस अग्रणी हस्ती ने शिक्षा, अनुवाद और समाजसेवा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है।

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Padma Shri Awardee Geeta Upadhyay Passes Away, Literary World Mourns
पद्मश्री गीता उपाध्याय का निधन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय नेपाली साहित्य, असमिया साहित्य, शिक्षा और अनुवाद जगत की अग्रणी हस्ती तथा पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार गीता उपाध्याय के निधन से पूर्वोत्तर सहित पूरे देश के साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। उनके निधन को भारतीय नेपाली समाज, असम और देश की बहुभाषी सांस्कृतिक परंपरा के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।
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जन्म, पारिवारिक पृष्ठभूमि और बचपन
14 फरवरी 1939 को तत्कालीन दरंग जिले (अब विश्वनाथ जिला) के गंगमौथान गांव में जन्मीं गीता उपाध्याय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक छविलाल उपाध्याय के परिवार से थीं। वह टंकनाथ उपाध्याय और भागीरथी देवी की ज्येष्ठ पुत्री थीं। स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रभक्ति और साहित्यिक वातावरण के बीच उनका बचपन बीता, जिसने उनके व्यक्तित्व और लेखन को गहराई से प्रभावित किया।
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शिक्षा और शैक्षणिक उपलब्धियां
गीता उपाध्याय ने गंगमौथान बालिका प्राथमिक विद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बेहाली उच्च विद्यालय से माध्यमिक शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने गुवाहाटी के हेंडिक गर्ल्स कॉलेज से 1959 में स्नातक तथा 1964 में गुवाहाटी विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। वह असम के गोरखा समुदाय की पहली महिला स्नातक और पहली महिला स्नातकोत्तर बनीं, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
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उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने शिक्षण को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। वर्ष 1965 में उन्होंने शिवसागर कॉलेज में अध्यापन कार्य शुरू किया और 34 वर्षों तक विद्यार्थियों को शिक्षित करने के बाद राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष के पद से 1999 में सेवानिवृत्त हुईं। अपने विद्यार्थियों के बीच वह अनुशासन, सादगी और ज्ञान के लिए विशेष रूप से सम्मानित थीं।

गीता उपाध्याय का व्यक्तित्व साहित्य, शिक्षा और समाजसेवा का अद्वितीय संगम था। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, बाल साहित्य, जीवनी, यात्रा साहित्य, आत्मकथा, आलोचना और अनुवाद सहित दो दर्जन से अधिक कृतियों की रचना की। उनके साहित्य में राष्ट्रीयता, मानवीय मूल्यों, महिला चेतना, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

अनुवाद के क्षेत्र में दिया बड़ा योगदान
अनुवाद के क्षेत्र में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उन्होंने विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'ऐन फ्रैंक की डायरी' का नेपाली में अनुवाद कर अपने अनुवादक जीवन की शुरुआत की और बाद में इसके असमिया अनुवाद से भी जुड़ीं। उन्होंने महाकवि भानुभक्त आचार्य की रामायण का असमिया अनुवाद किया, जिसे असम साहित्य सभा ने प्रकाशित किया। इसके अलावा 'मुना-मदन', 'काला सूरज', 'थलुवा सन्तान', 'आनंदी गोपाल', 'दर्बारकी सुसारे' और 'अभिव्यक्ति' जैसी महत्वपूर्ण कृतियों का अनुवाद कर उन्होंने नेपाली और असमिया साहित्य के बीच स्थायी सांस्कृतिक संबंध स्थापित किए।
उनकी सर्वाधिक चर्चित कृति 'जन्मभूमि मेरो स्वदेश' भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि पर आधारित एक ऐतिहासिक उपन्यास है। अपने दादा और स्वतंत्रता सेनानी छविलाल उपाध्याय के जीवन से प्रेरित इस कृति में गोरखा समुदाय के इतिहास, सामाजिक चेतना, महिला जीवन, अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष और राष्ट्र निर्माण की भावना को प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया गया है। इसी कालजयी कृति के लिए उन्हें वर्ष 2016 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

पद्मश्री, सती साधनी और अन्य राष्ट्रीय सम्मान
इससे पहले वर्ष 2012 में प्रसिद्ध असमिया नाटक 'दर्बारकी सुसारे' के असमिया से नेपाली अनुवाद के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार मिला था। साहित्य और अनुवाद के क्षेत्र में उनके बहुआयामी योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2025 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। वह असम से पद्मश्री प्राप्त करने वाली पहली गोरखा महिलाओं में शामिल थीं। इसी वर्ष असम सरकार ने उन्हें साहित्य और संस्कृति में आजीवन योगदान के लिए 'सती साधनी पुरस्कार-2026' से भी सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्हें पद्मप्रसाद ढुंगाना पुरस्कार, परिजात मैत्री सम्मान, फूलचंद खंडेलवाल पुरस्कार, महाकवि देवकोटा शताब्दी सम्मान, भानु सम्मान तथा अनेक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सम्मानों से अलंकृत किया गया।

साहित्यिक सृजन के साथ-साथ वह सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहीं। उन्होंने नेपाली साहित्य परिषद, असम, अखिल असम लेखिका संस्था तथा भारतीय गोरखा परिसंघ की असम इकाई का नेतृत्व किया। महिला सशक्तीकरण, मातृभाषा संरक्षण, शिक्षा के प्रसार और सामाजिक समरसता के लिए उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा।
वरिष्ठ साहित्यकार और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. खगेन सरमा ने कहा कि गीता उपाध्याय भारतीय नेपाली साहित्य, असमिया साहित्य, शिक्षा, अनुवाद और सामाजिक चेतना की ऐसी हस्ती थीं, जिन्होंने अपने लेखन और विचारों से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि गीता उपाध्याय केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि नेपाली और असमिया समाज के बीच सांस्कृतिक सेतु थीं, जिनके निधन से भारतीय नेपाली समाज, असम और पूरे भारतीय साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है।

डॉ. खगेन सरमा ने दी श्रद्धांजलि
डॉ. सरमा ने कहा कि गीता उपाध्याय की सबसे बड़ी पहचान एक सेतु-व्यक्तित्व के रूप में थी, जिन्होंने भाषा और संस्कृति की सीमाओं को समाप्त करते हुए साहित्य को व्यापक समाज तक पहुंचाने का कार्य किया। उनके अनुवाद कार्यों ने दो भाषाओं और दो साहित्यिक परंपराओं को स्थायी रूप से जोड़ दिया। वहीं, वरिष्ठ साहित्यकार और बरुआ कॉलेज में असमिया विभाग की अध्यक्ष इंदु प्रभा देवी ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि गीता जी आज हमारे बीच नहीं हैं। उनका जाना व्यक्तिगत और साहित्यिक दोनों स्तरों पर एक बड़ी क्षति है। उन्होंने कहा कि गीता उपाध्याय केवल एक लेखिका नहीं थीं, बल्कि सादगी, संवेदनशीलता और विद्वता की मिसाल थीं। उनकी रचनाएं और उनके विचार आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करते रहेंगे।


गीता उपाध्याय का निधन केवल भारतीय नेपाली साहित्य की क्षति नहीं, बल्कि भारत की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक विरासत के लिए भी एक बड़ी क्षति है। उन्होंने अपने साहित्य, अनुवाद और सामाजिक कार्यों के माध्यम से भाषाओं और समुदायों के बीच संवाद, समझ और सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया। उनकी रचनाएं, उनके विचार और उनके द्वारा स्थापित साहित्यिक मूल्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।

गीता उपाध्याय: एक नजर में
  • जन्म: 14 फरवरी 1939, गंगमौथान, विश्वनाथ (तत्कालीन दरंग), असम
  • शिक्षा: हेंडिक गर्ल्स कॉलेज से स्नातक, गुवाहाटी विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर
  • उपलब्धि: असम के गोरखा समुदाय की पहली महिला स्नातक और स्नातकोत्तर
  • पेशा: शिक्षाविद, साहित्यकार, अनुवादक और समाजसेवी
  • शिक्षण सेवा: शिवसागर कॉलेज में 34 वर्षों तक अध्यापन
  • प्रमुख पहचान: नेपाली और असमिया साहित्य के बीच सांस्कृतिक सेतु
  • प्रमुख कृति: 'जन्मभूमि मेरो स्वदेश'
  • प्रमुख सम्मान: साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2016), साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार (2012), पद्मश्री (2025), सती साधनी पुरस्कार (2026)
गीता उपाध्याय की प्रमुख साहित्यिक उपलब्धियां
  • दो दर्जन से अधिक पुस्तकों की रचना और अनुवाद
  • 'ऐन फ्रैंक की डायरी' का नेपाली अनुवाद
  • भानुभक्त आचार्य की रामायण का असमिया अनुवाद
  • 'मुना-मदन', 'दर्बारकी सुसारे' और अन्य महत्वपूर्ण कृतियों का अनुवाद
  • भारतीय नेपाली और असमिया साहित्य के बीच सांस्कृतिक सेतु का निर्माण
  • महिला सशक्तीकरण और मातृभाषा संरक्षण के लिए आजीवन कार्य
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