ईरान में युद्ध पर सियासत: भारत के रुख को लेकर आलोचनाओं के बीच बोले थरूर- यह कायरता नहीं जिम्मेदार कूटनीति है
ईरान पर अमेरिका-इस्राइल हमले को लेकर भारत सरकार की चुप्पी पर कांग्रेस में मतभेद उभर आए हैं। शशि थरूर ने इसे राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर अपनाई गई जिम्मेदार कूटनीति बताया, जबकि सोनिया गांधी ने इस चुप्पी को जिम्मेदारी से पलायन करार दिया।
विस्तार
पश्चिम एशिया में जंग को लेकर भारत सरकार की चुप्पी पर कांग्रेस के भीतर ही अलग-अलग राय सामने आई है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकार के रुख का बचाव करते हुए इसे जिम्मेदार कूटनीति बताया है, जबकि कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसी चुप्पी को जिम्मेदारी से पलायन करार दिया था।
विदेश नीति में केवल नैतिकता के आधार पर फैसले नहीं लिए जाते- थरूर
अपने लेख में शशि थरूर ने कहा कि भले ही यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और भारत के मूल सिद्धांतों संप्रभुता, अहिंसा और शांतिपूर्ण समाधान का उल्लंघन करता है, लेकिन विदेश नीति में केवल नैतिकता के आधार पर फैसले नहीं लिए जा सकते। उन्होंने कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हित, रणनीतिक साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए संतुलित रुख अपनाना होता है। थरूर के मुताबिक, सरकार की चुप्पी कायरता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है, और कई बार बिना बयान दिए भी कूटनीतिक रास्ते खुले रखे जा सकते हैं।
थरूर ने यह भी कहा कि भारत के पश्चिम एशिया में बड़े हित जुड़े हैं करीब 200 अरब डॉलर का व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और लगभग 90 लाख भारतीयों की मौजूदगी, ऐसे में किसी भी कड़े सार्वजनिक बयान से इन हितों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने अमेरिका के साथ भारत के रक्षा और तकनीकी संबंधों का भी जिक्र करते हुए कहा कि नैतिक भाषण देकर इन संबंधों को खतरे में डालना समझदारी नहीं होगी।
मौन रहना तटस्थता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है- सोनिया
वहीं, सोनिया गांधी ने अपने लेख में सरकार की चुप्पी पर कड़ा सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि ईरान के शीर्ष नेता की हत्या जैसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भारत का मौन रहना तटस्थता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है। उनके अनुसार, ऐसी घटनाएं वैश्विक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए गंभीर चुनौती हैं और भारत जैसे देश को इस पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
सरकार की आलोचना पर क्या बोले थरूर?
थरूर ने सोनिया गांधी और अन्य आलोचकों के विचारों से आंशिक सहमति जताते हुए यह जरूर कहा कि युद्ध उचित नहीं है, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की आलोचना करना सही नहीं है, क्योंकि विदेश नीति में फैसले व्यावहारिक परिस्थितियों और दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति का हवाला देते हुए कहा कि भारत हमेशा से सिद्धांत और व्यवहारिकता के बीच संतुलन बनाता आया है और आज के दौर में मल्टी-अलाइनमेंट इसी सोच का विस्तार है।
थरूर ने निष्कर्ष में कहा कि भारत की चुप्पी युद्ध का समर्थन नहीं, बल्कि यह समझ है कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए संयम जरूरी है, और यही जिम्मेदार कूटनीति की पहचान है।
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