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चुनाव के बाद कितनी बदली राज्यसभा की तस्वीर: किसकी सीटों में हुआ इजाफा, कौन से दल रहे नुकसान में? जानें
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Tue, 17 Mar 2026 07:08 PM IST
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सार
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राज्यसभा की 37 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजे।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
संसद के उच्च सदन- राज्यसभा की खाली हो रही सीटों को भरने के लिए सोमवार को कराए गए चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हुए। 26 राज्यसभा सीटों पर निर्विरोध चुनाव हो गया। वहीं, बची हुई 11 सीटों के लिए सोमवार को मतदान के बाद नतीजे आए। इन सीटों के नतीजे आने के बाद राज्यसभा की स्थिति काफी बदली है।ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर राज्यसभा की खाली हो रही सीटों पर जो चुनाव तय हुए थे, उन सभी के नतीजे क्या रहे? किस राज्य की किस सीट पर कौन चुना गया? निर्विरोध चुने जाने वाले नेता कौन रहे? तीन राज्यों की 11 सीटों पर जो चुनाव कराया गया, उसका नतीजा क्या आया? इसके अलावा अब राज्यसभा में किस दल के पास कितना संख्याबल हो गया है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- राज्यसभा की 37 सीटों पर ही क्यों हुए चुनाव?
2026 में अलग-अलग समय पर राज्यसभा की कुल 73 सीटें खाली हो रही हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने अभी सिर्फ 37 सीटों पर चुनाव का एलान किया है। इसकी वजह यह है कि 37 सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल महीने में समाप्त होगा। इनमें से 22 सदस्य 2 अप्रैल को रिटायर हो रहे हैं। वहीं, 15 सदस्य 9 अप्रैल को रिटायर होंगे। यानी कुल 37 सदस्य अप्रैल में रिटायर हो रहे हैं।इसी तरह जून में 22 सांसदों का कार्यकल खत्म हो रहा है। इनमें से 17 सदस्य 21 जून को, चार 25 जून और एक सदस्य 23 जून को रिटायर होंगे। वहीं, 11 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल नवंबर महीने में पूरा होगा। ये सभी 25 नवंबर को रिटायर होंगे। यानी इस साल राज्यसभा के लिए फिर चुनाव होना तय है।
इन सदस्यों के अलावा दो अन्य सदस्यों का कार्यकाल भी 2026 में समाप्त होगा। इनमें पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई 16 मार्च 2026 को सेवानिवृत्त हो गए। वहीं, मिजोरम से एमएएफ के सांसद के. वनलालवेना 19 जुलाई 2026 को रिटायर होंगे। इसके साथ ही एक रिक्त सीट पर भी 2026 में ही चुनाव होगा। ये सीट झारखंड से राज्यसभा सदस्य रहे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के निधन के वजह से रिक्त पड़ी है।
दूसरी तरफ बाकी बची तीन राज्यों की 11 सीटों पर सोमवार को मतदान कराया गया। इन राज्यों में बिहार, ओडिशा और हरियाणा शामिल रहे। यहां बिहार की पांच सीटें दांव पर थीं तो ओडिशा की चार और हरियाणा की दो सीटों पर मुकाबला रहा।
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अब जानें- किस राज्य की कितनी सीटों पर निर्विरोध चुनाव, कहां हुआ मतदान?
10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के लिए तय चुनावों में से सात राज्यों में 26 उम्मीदवार निर्विरोध ही चुन लिए गए। इनमें- महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्य की सीटें शामिल रहीं।दूसरी तरफ बाकी बची तीन राज्यों की 11 सीटों पर सोमवार को मतदान कराया गया। इन राज्यों में बिहार, ओडिशा और हरियाणा शामिल रहे। यहां बिहार की पांच सीटें दांव पर थीं तो ओडिशा की चार और हरियाणा की दो सीटों पर मुकाबला रहा।
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तो कौन से राज्य में कौन निर्विरोध चुना गया?
1. पश्चिम बंगाल
बंगाल में कुल पांच सीटों में चार सीटें तृणमूल कांग्रेस और एक भाजपा के खाते में आई। इनमें से तीन सीटें पहले से ही टीएमसी के पास थीं। दो अन्य सीटों में एक कांग्रेस और एक माकपा के पास थी। इस तरह राज्य में भाजपा और टीएमसी को एक-एक सीट फायदा हुआ। वहीं, माकपा और कांग्रेस को एक-एक सीट का नुकसान हुआ।
2. तमिलनाडु
तमिलनाडु में राज्यसभा सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध जरूर चुने गए, लेकिन इस बार द्रमुक ने अपने सहयोगियों को इन पर जीत दिलाई। इस बार चुनाव मैदान में गईं छह में से चार सीटों पर पिछली बार द्रमुक सांसद थे। लेकिन इस बार द्रमुक ने एक सीट अपनी सहयोगी पार्टी कांग्रेस और एक सीट अभिनेता विजयकांत की पार्टी देसीय मुरपोक्कु द्रविड़ कझगम (डीएमडीके) के लिए छोड़ दी थी। इन चारों सीटों पर द्रमुक के नेतृत्व को ही जीत मिली।
दूसरी तरफ राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी और एनडीए की साथी पार्टी अन्नाद्रमुक ने एक सीट अपने पास ही रखी। एक और सीट पर एनडीए के सहयोगी दल बरकरार रहे। यह सीट पहले तमिल मनीला कांग्रेस-मूपानार के पास थी और अब इस पर पत्तली मक्कल काची के अंबुमणि रामदास निर्विरोध जीते हैं।
3. महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में पिछले साल विधानसभा चुनाव के नतीजों का असर साफ देखने को मिला। यहां भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने सात में से छह सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की। विपक्ष की तरफ से सिर्फ शरद पवार ही निर्विरोध चुने गए।
4. असम
असम में भाजपा ने पिछली बार की दोनों सीटें अपने पास रखीं, हालांकि इन पर खड़े हुए चेहरे बदल दिए। दूसरी तरफ एनडीए गठबंधन की पार्टी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) उम्मीदवार को एक सीट पर निर्विरोध जीत मिली। यह सीट पहले कांग्रेस गठबंधन में शामिल रही पार्टी- असम गण मोर्चा के पास थी।
5. छत्तीसगढ़, तेलंगाना और हिमाचल
बाकी राज्यों की तरह ही छत्तीसगढ़ की दो सीटों, तेलंगाना की दो सीट और हिमाचल प्रदेश की एक सीट पर उम्मीदवारों का निर्विरोध चुनाव हुआ। जहां छत्तीसगढ़ में भाजपा-कांग्रेस के बीच एक-एक सीट बंट गई तो वहीं तेलंगाना में कांग्रेस ने एक सीट बरकरार रखी और दूसरी सीट पहले के. चंद्रशेखर राव की भारतीय राष्ट्र समिति (बीआरएस) पास थी। इस बार इस पर भी कांग्रेस उम्मीदवार को जीत मिली। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के अनुराग शर्मा ने भाजपा के पास रही सीट को बिना चुनाव के ही हासिल कर लिया।
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जिन राज्यों में हुए चुनाव वहां क्या रहे नतीजे?
बाकी बचे तीन राज्यों की 11 सीटों पर सोमवार को चुनाव कराए गए। इसमें बिहार की पांच सीटें, ओडिशा की चार सीटें और हरियाणा की दो सीटों के लिए मतदान हुआ। आइये जानते हैं, इन राज्यों में क्या नतीजे रहे...
1. बिहार
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने क्लीन स्वीप करते हुए सभी पांच सीटों पर जीत दर्ज की। गौरतलब है कि बिहार में किसी उम्मीदवार को जिताने के लिए 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। विधानसभा में विधायकों के संख्या बल के आधार पर एनडीए (202) के पास चार सीटें आसानी से जीतने का स्पष्ट बहुमत था। उसे सिर्फ पांचवीं सीट के लिए जद्दोजहद करनी थी।
विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास पांचवीं सीट जीतने का मौका था। दरअसल, राजद (25 विधायक) और कांग्रेस (छह) के साथ अगर लेफ्ट पार्टियों (2+1) और आईआईपी की एक सीटें मिला दी जाएं तो विपक्ष 35 प्रथम वरीयता वोट सीधे हासिल कर सकता था। इसके अलावा 41 वोट के जादुई आंकड़े के लिए उसे सिर्फ एआईएमआईएम (5 विधायक) और बसपा (1 विधायक) के समर्थन भी हासिल करना था। तेजस्वी यादव ने यह समर्थन हासिल कर भी लिया था।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने क्लीन स्वीप करते हुए सभी पांच सीटों पर जीत दर्ज की। गौरतलब है कि बिहार में किसी उम्मीदवार को जिताने के लिए 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। विधानसभा में विधायकों के संख्या बल के आधार पर एनडीए (202) के पास चार सीटें आसानी से जीतने का स्पष्ट बहुमत था। उसे सिर्फ पांचवीं सीट के लिए जद्दोजहद करनी थी।
विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास पांचवीं सीट जीतने का मौका था। दरअसल, राजद (25 विधायक) और कांग्रेस (छह) के साथ अगर लेफ्ट पार्टियों (2+1) और आईआईपी की एक सीटें मिला दी जाएं तो विपक्ष 35 प्रथम वरीयता वोट सीधे हासिल कर सकता था। इसके अलावा 41 वोट के जादुई आंकड़े के लिए उसे सिर्फ एआईएमआईएम (5 विधायक) और बसपा (1 विधायक) के समर्थन भी हासिल करना था। तेजस्वी यादव ने यह समर्थन हासिल कर भी लिया था।
दूसरी तरफ एनडीए के पास भाजपा और जदयू के बचे हुए 10 प्रथम वरीयता वोट (7 भाजपा+3 जदयू), लोजपा (रामविलास) के 19 प्रथम वरीयता वोट, हम के पांच, रालोमो के चार विधायक हैं। यानी एनडीए के पास कुल 38 प्रथम वरीयता वोट थे, जो कि एकजुट विपक्ष से कम साबित होते। यानी महागठबंधन इस एक सीट को आसानी से जीत सकता था।
हालांकि, ऐन मौके पर विपक्ष के चार विधायक, जिनमें कांग्रेस के तीन और राजद के एक विधायक शामिल थे मतदान से गायब रहे। विधायकों की इसके कारण विपक्ष 37 वोट ही हासिल कर पाया और एनडीए से पांचवीं सीट हार गया। इन नतीजों के बाद बिहार के विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने बयान दिया कि अगर उनके विधायकों ने उन्हें धोखा नहीं दिया होता तो वे यह सीट जरूर जीत जाते।
हालांकि, ऐन मौके पर विपक्ष के चार विधायक, जिनमें कांग्रेस के तीन और राजद के एक विधायक शामिल थे मतदान से गायब रहे। विधायकों की इसके कारण विपक्ष 37 वोट ही हासिल कर पाया और एनडीए से पांचवीं सीट हार गया। इन नतीजों के बाद बिहार के विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने बयान दिया कि अगर उनके विधायकों ने उन्हें धोखा नहीं दिया होता तो वे यह सीट जरूर जीत जाते।
2. ओडिशा
ओडिशा में चार राज्यसभा चुनावों के दौरान काफी कड़ा मुकाबला देखने को मिला, जिसमें हिंसा और विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप भी सामने आए। दरअसल, ओडिशा में राज्यसभा सीट जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को 30 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। मौजूदा समीकरण के मुताबिक भाजपा (79 सीट) ने दो तो बीजद (48 सीट) ने एक राज्यसभा सीट आसानी से जीत दर्ज की।
ओडिशा में असल मुकाबला चौथी सीट के लिए था। इस सीट पर बीजद (बचे हुए 18 प्रथम वरीयता वोट), कांग्रेस (14 प्रथम वरीयता वोट) और माकपा (1 प्रथम वरीयता वोट) ने मिलकर एक निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन किया था, जबकि भाजपा (19 प्रथम वरीयता वोट) ने दूसरे निर्दलीय उम्मीदवार- दिलीप रे को अपना समर्थन दिया था। यानी साफ था कि यहां भी विपक्ष के एकजुट होने से भाजपा समर्थित उम्मीदवार को हार मिल सकती थी। लेकिन क्रॉस वोटिंग के बाद इस कड़े मुकाबले में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप रे ने बाजी मारी।
हुआ कुछ यूं कि तीन कांग्रेस विधायकों और आठ बीजद विधायकों ने दिलीप रे का समर्थन कर दिया। यानी जिन प्रथम वरीयता के वोटों पर विपक्ष ने भरोसा किया था, वही उससे दूर हो गए और भाजपा के पाले में चले गए। नतीजतन निर्दलीय दिलीप रे को जरूरी 30 विधायकों का समर्थन मिला और वे राज्यसभा चुनाव जीत गए। यानी बीजद को कुल मिलाकर पिछली बार के मुकाबले एक सीट का घाटा हुआ। खास बात यह है कि निर्दलीय उतरे दिलीप रे बीजू जनता दल (बीजद) के संस्थापक नेताओं में से एक हैं और बाद में पार्टी से अलग हुए।
ओडिशा में चार राज्यसभा चुनावों के दौरान काफी कड़ा मुकाबला देखने को मिला, जिसमें हिंसा और विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप भी सामने आए। दरअसल, ओडिशा में राज्यसभा सीट जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को 30 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। मौजूदा समीकरण के मुताबिक भाजपा (79 सीट) ने दो तो बीजद (48 सीट) ने एक राज्यसभा सीट आसानी से जीत दर्ज की।
ओडिशा में असल मुकाबला चौथी सीट के लिए था। इस सीट पर बीजद (बचे हुए 18 प्रथम वरीयता वोट), कांग्रेस (14 प्रथम वरीयता वोट) और माकपा (1 प्रथम वरीयता वोट) ने मिलकर एक निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन किया था, जबकि भाजपा (19 प्रथम वरीयता वोट) ने दूसरे निर्दलीय उम्मीदवार- दिलीप रे को अपना समर्थन दिया था। यानी साफ था कि यहां भी विपक्ष के एकजुट होने से भाजपा समर्थित उम्मीदवार को हार मिल सकती थी। लेकिन क्रॉस वोटिंग के बाद इस कड़े मुकाबले में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप रे ने बाजी मारी।
हुआ कुछ यूं कि तीन कांग्रेस विधायकों और आठ बीजद विधायकों ने दिलीप रे का समर्थन कर दिया। यानी जिन प्रथम वरीयता के वोटों पर विपक्ष ने भरोसा किया था, वही उससे दूर हो गए और भाजपा के पाले में चले गए। नतीजतन निर्दलीय दिलीप रे को जरूरी 30 विधायकों का समर्थन मिला और वे राज्यसभा चुनाव जीत गए। यानी बीजद को कुल मिलाकर पिछली बार के मुकाबले एक सीट का घाटा हुआ। खास बात यह है कि निर्दलीय उतरे दिलीप रे बीजू जनता दल (बीजद) के संस्थापक नेताओं में से एक हैं और बाद में पार्टी से अलग हुए।
3. हरियाणा
हरियाणा में राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव के करीब सवा नौ घंटे बाद घोषित परिणाम में भाजपा और कांग्रेस ने एक-एक सीट पर जीत दर्ज की। भाजपा उम्मीदवार संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौद्ध विजयी रहे। हरियाणा में राज्यसभा सीट जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को 31 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। राज्य में मौजूदा समय में 48 सीटों के साथ भाजपा सबसे मजबूत है। हालांकि, कांग्रेस भी 37 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर है। यानी भाजपा-कांग्रेस के लिए एक-एक सीट के साथ मुकाबला बराबर रहना तय था। हालांकि, इसमें पेच निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष सतीश नांदल की वजह से आया।
बताया गया है कि चुनाव के दौरान कांग्रेस के पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की, जबकि कुल पांच वोट रद्द हुए। इसमें कांग्रेस के चार व भाजपा का एक वोट शामिल है। दूसरी तरफ इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के दो विधायकों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। ऐसे में किसी उम्मीदवार को राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए कुल 28.66 वोट हासिल करने थे।
इसे ऐसे समझें- हरियाणा में कुल 90 सीटें हैं। इनमें इनेलो के दो विधायकों ने हिस्सा नहीं लिया, जबकि पांच वोट रद्द हुए। यानी कुल वोट 83। भाजपा के 48, निर्दलीय तीन और कांग्रेस के पांच क्रॉस वोट और एक वोट रद्द। यानी भाजपा के पास कुल वोट हुए- 55, जबकि जीत के लिए समर्थन का आंकड़ा था 28.66 वोटों का। इसके बाद भाजपा के संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौद्ध को जीत मिली, जबकि सतीश नांदल को हार मिली।
हरियाणा में राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव के करीब सवा नौ घंटे बाद घोषित परिणाम में भाजपा और कांग्रेस ने एक-एक सीट पर जीत दर्ज की। भाजपा उम्मीदवार संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौद्ध विजयी रहे। हरियाणा में राज्यसभा सीट जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को 31 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। राज्य में मौजूदा समय में 48 सीटों के साथ भाजपा सबसे मजबूत है। हालांकि, कांग्रेस भी 37 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर है। यानी भाजपा-कांग्रेस के लिए एक-एक सीट के साथ मुकाबला बराबर रहना तय था। हालांकि, इसमें पेच निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष सतीश नांदल की वजह से आया।
बताया गया है कि चुनाव के दौरान कांग्रेस के पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की, जबकि कुल पांच वोट रद्द हुए। इसमें कांग्रेस के चार व भाजपा का एक वोट शामिल है। दूसरी तरफ इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के दो विधायकों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। ऐसे में किसी उम्मीदवार को राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए कुल 28.66 वोट हासिल करने थे।
इसे ऐसे समझें- हरियाणा में कुल 90 सीटें हैं। इनमें इनेलो के दो विधायकों ने हिस्सा नहीं लिया, जबकि पांच वोट रद्द हुए। यानी कुल वोट 83। भाजपा के 48, निर्दलीय तीन और कांग्रेस के पांच क्रॉस वोट और एक वोट रद्द। यानी भाजपा के पास कुल वोट हुए- 55, जबकि जीत के लिए समर्थन का आंकड़ा था 28.66 वोटों का। इसके बाद भाजपा के संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौद्ध को जीत मिली, जबकि सतीश नांदल को हार मिली।
इन चुनावों के बाद 37 सीटों पर किसका जलवा?
इन चुनावों में एनडीए ने 37 में से 21 सीटें जीती हैं, जिससे उच्च सदन में सत्ताधारी गठबंधन और खासकर भाजपा की स्थिति और मजबूत हुई है। इस चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसने अपनी पिछली नौ सीटों के मुकाबले 12 सीटें जीतकर तीन सीटों का फायदा हासिल किया है।वहीं, विपक्षी इंडिया गठबंधन को कुल 13 सीटें मिली हैं। इसमें कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस दोनों को 1-1 सीट का फायदा हुआ है। इन चुनावों में राजद और द्रमुक को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है, दोनों ही पार्टियों ने अपने खाते से दो-दो सीटें गंवाई हैं।
क्या है राज्यसभा की मौजूदा स्थिति?
इस चुनाव से पहले राज्यसभा में भाजपा के 103 सांसद थे, जबकि कांग्रेस के 27 और तृणमूल कांग्रेस के 12 सांसद थे। हालांकि, अब स्थिति बदल गई है। कुल 37 सीटों में हुए चुनाव में भाजपा पिछली बार के मुकाबले तीन अधिक सीटों पर विजयी हुआ है। यानी अब राज्यसभा में उसके पास 106 सीटें हैं। इसी तरह कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को भी राज्यसभा में एक-एक सीट का लाभ हुआ है। जहां कांग्रेस के सदन में अब 28 सांसद हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस के 13 सांसद होंगे।इसके अलावा नुकसान वाली पार्टियों की बात करें तो डीएमके ने अपनी दो सीटें सहयोगियों को दी थीं, इसलिए उसके पास अब राज्यसभा में आठ सीटें ही रह गई हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के पास पहले पांच के मुकाबले चुनाव के बाद सिर्फ तीन सांसद ही रह गए हैं। इनके अलावा बड़ी-छोटी पार्टियों को एक सीट ज्यादा या एक सीट कम मिली है। अधिकतर पार्टियों के सांसद में कोई बदलाव नहीं हुआ है।