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Supreme Court: दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं के बहिष्कार का मामला, नौ जजों की पीठ सुनाएगी फैसला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Sat, 30 May 2026 04:02 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने पारसी महिला दीना बुधराजा की याचिका पर कहा है कि वह 9 जजों की संविधान पीठ के फैसले का इंतजार करेगा। महिला ने आरोप लगाया कि दूसरे धर्म में शादी करने के बाद उसे नागपुर अगियारी में प्रवेश से रोका गया। याचिका में कहा गया कि पारसी महिलाओं के साथ भेदभाव हो रहा है, जबकि पुरुषों को वही अधिकार मिलते हैं। आइए, विस्तार से इस मामले को समझते हैं...
पारसी महिलाओं से भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने एक पारसी महिला के साथ कथित धार्मिक भेदभाव के मामले में कहा है कि वह इस मुद्दे पर फैसला देने से पहले 9 जजों की संविधान पीठ के निर्णय का इंतजार करेगा। मामला उस पारसी महिला से जुड़ा है जिसने दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी की, लेकिन अपना धर्म नहीं बदला। इसके बावजूद उसे नागपुर के पारसी अगियारी यानी अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोक दिया गया। अदालत ने कहा कि यह मामला महिलाओं के धार्मिक अधिकारों और समानता से जुड़ा बड़ा संवैधानिक सवाल है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे। अदालत दीना बुधराजा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। दीना ने एक हिंदू व्यक्ति से विवाह किया था, लेकिन उन्होंने पारसी धर्म नहीं छोड़ा। इसके बावजूद 2024 में उनकी दादी के अंतिम संस्कार के दौरान उन्हें नागपुर अगियारी में प्रवेश नहीं करने दिया गया। महिला ने अदालत से मांग की कि उसे अपने परिवार के धार्मिक कार्यक्रमों और प्रार्थनाओं में शामिल होने की अनुमति दी जाए।
क्या है पूरा विवाद?
दीना बुधराजा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि नागपुर पारसी पंचायत के संविधान का नियम 5(2) महिलाओं के साथ भेदभाव करता है। इस नियम के तहत अगर कोई पारसी महिला दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करती है तो उसे धार्मिक पहचान और अगियारी में प्रवेश का अधिकार खोना पड़ता है। वहीं पारसी पुरुष अगर दूसरे धर्म की महिला से शादी करे तो उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता। याचिका में कहा गया कि यह नियम संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ है।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसी तरह के धार्मिक और लैंगिक भेदभाव से जुड़े मामलों पर 9 जजों की संविधान पीठ पहले से सुनवाई कर चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसमें सबरीमाला मंदिर समेत कई धार्मिक मामलों में महिलाओं के अधिकारों पर सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने संकेत दिया कि उस फैसले का असर इस मामले पर भी पड़ेगा। इसलिए अभी अंतिम आदेश देने से पहले संविधान पीठ के फैसले का इंतजार किया जाएगा।
याचिका में किन अधिकारों का हवाला दिया गया?
याचिका में कहा गया कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के सामने बराबरी का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21 सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। महिला का कहना है कि शादी के बाद भी उसकी धार्मिक पहचान खत्म नहीं हो सकती।
किन पक्षों को नोटिस जारी किया गया?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, नागपुर पारसी पंचायत, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी किया है। अदालत ने इन सभी पक्षों से जवाब मांगा है। याचिका वकील रोहित अनिल राठी के जरिए दाखिल की गई है। इसमें मांग की गई है कि महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करने वाले नियम को रद्द किया जाए।
क्या मांग कर रही हैं पारसी महिलाएं?
याचिका में कहा गया है कि पारसी महिलाओं को भी वही अधिकार मिलने चाहिए जो पारसी पुरुषों को मिलते हैं। महिला ने अदालत से यह भी मांग की कि केस लंबित रहने तक उसे नियमित रूप से नागपुर अगियारी में प्रवेश करने और अपने रिश्तेदारों की प्रार्थनाओं में शामिल होने दिया जाए। यह मामला अब महिलाओं की धार्मिक पहचान और बराबरी के अधिकार पर बड़ी कानूनी बहस बनता जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे। अदालत दीना बुधराजा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। दीना ने एक हिंदू व्यक्ति से विवाह किया था, लेकिन उन्होंने पारसी धर्म नहीं छोड़ा। इसके बावजूद 2024 में उनकी दादी के अंतिम संस्कार के दौरान उन्हें नागपुर अगियारी में प्रवेश नहीं करने दिया गया। महिला ने अदालत से मांग की कि उसे अपने परिवार के धार्मिक कार्यक्रमों और प्रार्थनाओं में शामिल होने की अनुमति दी जाए।
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क्या है पूरा विवाद?
दीना बुधराजा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि नागपुर पारसी पंचायत के संविधान का नियम 5(2) महिलाओं के साथ भेदभाव करता है। इस नियम के तहत अगर कोई पारसी महिला दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करती है तो उसे धार्मिक पहचान और अगियारी में प्रवेश का अधिकार खोना पड़ता है। वहीं पारसी पुरुष अगर दूसरे धर्म की महिला से शादी करे तो उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता। याचिका में कहा गया कि यह नियम संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ है।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसी तरह के धार्मिक और लैंगिक भेदभाव से जुड़े मामलों पर 9 जजों की संविधान पीठ पहले से सुनवाई कर चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसमें सबरीमाला मंदिर समेत कई धार्मिक मामलों में महिलाओं के अधिकारों पर सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने संकेत दिया कि उस फैसले का असर इस मामले पर भी पड़ेगा। इसलिए अभी अंतिम आदेश देने से पहले संविधान पीठ के फैसले का इंतजार किया जाएगा।
याचिका में किन अधिकारों का हवाला दिया गया?
याचिका में कहा गया कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के सामने बराबरी का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21 सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। महिला का कहना है कि शादी के बाद भी उसकी धार्मिक पहचान खत्म नहीं हो सकती।
किन पक्षों को नोटिस जारी किया गया?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, नागपुर पारसी पंचायत, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी किया है। अदालत ने इन सभी पक्षों से जवाब मांगा है। याचिका वकील रोहित अनिल राठी के जरिए दाखिल की गई है। इसमें मांग की गई है कि महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करने वाले नियम को रद्द किया जाए।
क्या मांग कर रही हैं पारसी महिलाएं?
याचिका में कहा गया है कि पारसी महिलाओं को भी वही अधिकार मिलने चाहिए जो पारसी पुरुषों को मिलते हैं। महिला ने अदालत से यह भी मांग की कि केस लंबित रहने तक उसे नियमित रूप से नागपुर अगियारी में प्रवेश करने और अपने रिश्तेदारों की प्रार्थनाओं में शामिल होने दिया जाए। यह मामला अब महिलाओं की धार्मिक पहचान और बराबरी के अधिकार पर बड़ी कानूनी बहस बनता जा रहा है।