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Supreme Court: 'गर्भवती मां की प्रजनन स्वायत्तता सर्वोच्च', सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग को गर्भपात की अनुमति दी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Pavan Updated Mon, 27 Apr 2026 06:56 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गर्भवती महिला, खासकर नाबालिग, की प्रजनन स्वायत्तता सर्वोच्च महत्व रखती है। इसी के साथ अदालत ने 15 वर्षीय लड़की को 28 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा कि महिला की इच्छा, अजन्मे बच्चे के हित से अधिक महत्वपूर्ण है और जबरन गर्भ जारी रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

Reproductive autonomy of mother-to-be must be accorded highest importance: SC
Supreme Court - फोटो : PTI
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने 28 सप्ताह से अधिक की गर्भवती 15 वर्षीय लड़की को गर्भपात की अनुमति दी है। न्यायालय ने कहा कि गर्भवती मां की प्रजनन स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। संवैधानिक अदालतों को गर्भावस्था समाप्त करने की मांग करने वाली माताओं के प्रति निषेधात्मक दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने यह आदेश 24 अप्रैल को पारित किया। पीठ ने कहा कि गर्भवती महिला की पसंद महत्वपूर्ण है, न कि जन्म लेने वाले बच्चे की। ऐसी गर्भावस्था जारी रखने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षिक संभावनाओं और सामाजिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
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अवांछित गर्भावस्था पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायालय ने जोर दिया कि अवांछित गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। शरीर से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न अंग है। कोई भी अदालत किसी महिला, खासकर नाबालिग को, उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। ऐसा करने से उसे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात हो सकता है। राहत न देने से नाबालिग को अपरिवर्तनीय परिणाम भुगतने पड़ते। यह प्रजनन पसंद को मौलिक अधिकार मानने वाले संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत होगा।

अवांछित गर्भावस्था के परिणाम
न्यायालय ने कहा कि अवांछित बच्चे को जन्म देने के लिए गर्भवती महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मजबूर करना गलत है। यह गर्भवती महिला के कल्याण को नकारता है और उसे जन्म लेने वाले बच्चे के अधीन कर देता है। संवैधानिक अदालतों को गर्भवती महिला के कल्याण से जुड़े मामलों पर विचार करना चाहिए। उन्हें गर्भावस्था समाप्त करने के इच्छुक पक्ष के दृष्टिकोण से सभी तथ्यों को देखना चाहिए।

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अवैध गर्भपात का खतरा
न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि अवांछित गर्भावस्था को जारी रखने का निर्देश दिया जाता, तो लोग अवैध गर्भपात केंद्रों का सहारा लेंगे। इससे गर्भवती महिला अधिक असुरक्षित और खतरों के संपर्क में आ जाएगी। निषेधात्मक दृष्टिकोण देर से गर्भपात को नहीं रोकेगा, बल्कि उन्हें कानून के दायरे से बाहर धकेल देगा। यह मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के उद्देश्यों के विपरीत होगा, जो असुरक्षित गर्भपात से बचना चाहता है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि नाबालिग की बेटी को एम्स में जल्द से जल्द गर्भपात कराने की अनुमति दी जाए।

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