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Republic Day 2019: अंग्रेजी शासन की स्थापना के साथ ही शुरू हुआ था संवैधानिक विकास 

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Shilpa Thakur Updated Sat, 26 Jan 2019 08:40 AM IST
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Republic Day 2019: Know all about constitutional development of India
- फोटो : अमर उजाला

आज गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) है। ये वही दिन है जब हमारा संविधान लागू हुआ था। वो संविधान जो दुनिया में सबसे बड़ा लिखित संविधान है। संविधान किस तरह बना और इसमें किन बातों पर बल दिया गया, ये तो सभी जानते हैं। लेकिन इसकी शुरुआत कब हुई ये शायद ही सबको पता हो। आज हम आपको संवैधानिक विकास के बारे में बताने जा रहे हैं।


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आज गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) है। ये वही दिन है जब हमारा संविधान लागू हुआ था। वो संविधान जो दुनिया में सबसे बड़ा लिखित संविधान है। संविधान किस तरह बना और इसमें किन बातों पर बल दिया गया, ये तो सभी जानते हैं। लेकिन इसकी शुरुआत कब हुई ये शायद ही सबको पता हो। आज हम आपको संवैधानिक विकास के बारे में बताने जा रहे हैं।

संवैधानिक विकास की शुरुआत वास्तव में अंग्रेजी शासन की स्थापना के बाद ही शुरू हो गई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी के युद्ध में जीत हासिल करने के बाद बंगाल में अपने राज्य की स्थापना की। यूं तो ये लोग भारत में व्यापारिक लाभ के लिए आए थे, लेकिन भारत की कमजोर राजनीतिक व्यवस्था देख, उन्होंने इसका पूरा फायदा उठाया। 200 सालों तक भारत पर राज करने वाले अंग्रेजों ने समय-समय पर भारतीय शासन व्यवस्था में अनेक परिवर्तन किए। चलिए जानते हैं संवैधानिक विकास के बारे में-

रेगुलेटिंग एक्ट 1773

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 ने ही भारतीय संविधान की नींव रखी। इसके अंतर्गत बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के लिए एक परिषद की स्थापना की गई। जिसमें चार सदस्य और एक गवर्नर जनरल था। गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के पास बंगाल के फोर्ट विलियम के सैनिक और असैनिक प्रशासन के अधिकार थे। उसके अधिकार क्षेत्र में बंगाल, बिहार व उड़ीसा शामिल थे। इसी एक्ट के तहत कोलकाता में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 1774 में हुई। इसमें मुख्य न्यायाधीश सर अजीला इम्पे थे।

संशोधित अधिनियम 1781

संशोधन अधिनियम 1781 के तहत अधिकारियों के शासकीय कार्यों के मामलों को सर्वोच्च न्यायालय के परिधि से बाहर कर दिया गया। साथ ही  सर्वोच्च न्यायालय के कार्यक्षेत्र को स्पष्ट किया गया।

पिट्स इंडिया एक्ट 1784

साल 1784 में ब्रिटेन में तत्कालीन प्रधानमंत्री विलियम पिट ने देखा कि ईस्ट इंडिया कंपनी में व्यापक रूप से भ्रष्टाचार फैला हुआ है तथा कंपनी के अधिकारी अनुचित तरीकों से भारत में धन जमा कर रहे हैं। इसपर नियंत्रण के लिए 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट लाया गया। इसके तहत प्रशासन में फैले भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने के लिए 7 सदस्यीय बीओसी (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) और व्यापार (कंपनी) में फैले भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने के लिए 8 सदस्यीय बीओडी (बोर्ड ऑफ डायरेकटर्स) की स्थापना की गई। साथ ही गवर्नर जनरल को वीटो पावर दी गई।

चार्टर एक्ट 1793

1773 एक्ट के तहत कंपनी को अगले 20 वर्षों तक पूर्वी देशों में व्यापार करने की अनुमति दी गई थी। 1793 में वो अवधि खत्म हो गई। तो इस नए एक्ट में व्यापार की अवधि 20 साल और बढ़ा दी गई। इस एक्ट के तहत कंपनी के अधिकारियों, कर्मचारियों तथा बोर्ड के सदस्यों को वेतन-भत्ते पहली बार भारतीय राजकोष से देने की व्यवस्था की गई। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें पहले ब्रिटिश राजकोष से पैसे दिए जाते थे, जो देरी से मिलते थे। जिस कारण कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार करने लगे थे। 

Independence Day
Independence Day

चार्टर एक्ट 1813

इस एक्ट में कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करते हुए फिर से 20 वर्ष के लिए उसका भारतीय प्रदेशों और राजस्व पर नियंत्रण स्वीकार किया गया। कंपनी के पास चीन के साथ चाय के व्यापार का एकाधिकार अब भी था। ईसाई धर्म प्रचारकों को भारत में रहने की अनुमति मिल गई। इसमें एक सबसे बड़ा परिवर्तन ये था कि बंगाल के गवर्नर जनरल को पूरे भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। साथ ही उसकी कार्यकारिणी के सदस्यों की संख्या तीन से बढ़ाकर चार कर दी गई। ये चार्टर एक्ट एक तरह से इसलिए भी खास था क्योंकि इसमें दास प्रथा को खत्म करने का प्रावधान शामिल था। इसमें भारतीयों की शिक्षा पर प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान भी किया गया।

चार्टर एक्ट 1833

इसे सेंट हेलेना अधिनियम 1833 भी कहा जाता है। यह अधिनियम भारत का ब्रिटिश शासन में केंद्रीकरण की दिशा में अंतिम कदम था। इस एक्ट के तहत कंपनी के चार्टर को 20 वर्षों के लिए नवीनीकृत किया गया, लेकिन कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करके उसे एक राजनीतिक व प्रशासनिक संस्था बना दिया गया। भारतीय कानूनों के निर्माण और वर्गीकरण के लिए विधि आयोग का गठन किया गया। विधि आयोग का नाम लार्ड मैकाले विधि आयोग रखा गया था। वहीं ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम भी इसी एक्ट में बदला गया। कंपनी का नया नाम कंपनी ऑफ मर्चेंट ऑफ इंडिया रखा गया।

चार्टर एक्ट 1853

ये आखिरी चार्टर एक्ट था। इसमें कोई महत्वपूर्ण प्रावधान नहीं था। इसमें पहली बार भारत में कंपनी के प्रशासन की निरंतरता के लिए कोई सीमा तह नहीं की गई, जैसा की पहले 20 वर्ष तय की जाती थी। इस एक्ट के द्वारा शासकीय सेवा के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का प्रावधान किया गया। यानी पहली बार कंपनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा का आयोजन करने का प्रावधान आया। विधायी कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से अलग कर दिया गया। इसके साथ ही सेवाओं में नामजदी के सिद्धांत को समाप्त कर दिया गया। जानकारी के लिए बता दें सत्यनाथ टैगोर प्रथम भारतीय थे जो जून 1863 में सिविल सेवा में चयनित हुए थे। 

1857 में भ्रष्टाचार एवं क्रूरतापूर्ण शासन के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ न केवल भारत में बल्कि ब्रिटेन में भी आवाज उठने लगी। लोगों में कंपनी के प्रति बढ़ते असंतोष के बाद 1858 एक्ट आया।

भारत सरकार अधिनियम 1858

इस नए एक्ट में कंपनी के शासन को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया और भारत का शासन क्राउन (महारानी) को दे दिया गया, उस समय विक्टोरिया ब्रिटेन की महारानी थीं। इस एक्ट को एक्ट ऑफ बेटर गवर्नमेंट इन इंडिया भी कहा गया। प्रशासन के लिए ब्रिटेन में भारत सचिव नियुक्त किया गया जो महारानी के प्रति जवाबदेह था और भारत सचिव के प्रति भारत का गवर्नर जनरल जवाबदेह था। इस एक्ट के बाद भारत के शासन पर ब्रिटेन की संसद का सीधा व प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया। ब्रिटिश संसद में भारत मंत्री का पद, बीओसी और बीओडी खत्म करके 15 सदस्यीय भारतीय परिषद का गठन किया गया। भारत सचिव की सहायता के लिए इसका गठन हुआ था। अब गवर्नर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा। 

भारत परिषद अधिनियम 1861

भारतीयों को नियंत्रित करने, भारत में अपराधों एवं विवाद आदि के निपटारे और प्रशासन में भारतीयों को शामिल करने के लिए ये एक्ट आया। इसके तहत तीन कानूनों को तत्काल प्रभाव से लागू किया गया। ये तीन कानून थे, भारतीय दंड संहिता, दण्ड प्रक्रिया संहिता और सिविल प्रक्रिया संहिता। इसके अलावा वायसराय (गवर्नर जनरल) को अध्यादेश जारी करने का अधिकार तथा भारत परिषद में भारतीय जनता के बीच से प्रतिनिधि नामजद करने का अधिकार दिया गया। प्रशासकीय कार्यों में विभागीय प्रणाली की शुरुआत हुई। इस अधिनयम के जरिये वायसराय को अध्यादेश जारी करने के विशेषाधिकार दिए गए। यह भी कहा गया कि ब्रिटिश सम्राट भारत सचिव का सहयोग या राय लेकर किसी भी एक्ट को रद्द कर सकते हैं।

भारत परिषद अधिनियम 1892

भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना का जन्म होते देख अंग्रेजी प्रशासन में भारतीयों को स्थान देने का दबाव बढ़ने लगा। 1858 और 1861 एक्ट के तहत भारत परिषद अधिनियम में इसकी कोशिश की गई थी लेकिन भारतीय जनता इससे खुश नहीं थी। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण साल  1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना भी हुई। जिसने संवैधानिक सुधारों की मांग की। इसके बाद ये एक्ट पास हुआ। पार्टी की स्थापना सेफ्टी वाल्व पालिसी के तहत अंग्रेजों एवं भारतीयों के बीच बातचीत में मध्यस्थता करने हेतु की गई थी। इसकी स्थापना ए.ओ.ह्यूम ने की थी।

इस एक्ट के तहत गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में सदस्यों की संख्या को बढ़ाकर न्यूनतम 10 और अधिकतम 15 किया गया। इस एक्ट में पहली बार भारत में अप्रत्यक्ष निर्वाचन या चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत हुई। 

भारत परिषद अधिनियम 1909  

इसे मार्ले-मिन्टो सुधार भी कहा जाता है। उस समय भारत सचिव मार्ले और वायसराय मिंटो थे। इस एक्ट के तहत केंद्रीय विधान मंडल के सदस्यों की संख्या 16 से 60 तक बढ़ाई गई। इसमें भारतीयों को बजट पर प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया लेकिन गवर्नर जनरल उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं थे। एकता को खत्म करने के लिए मुस्लिमों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया गया। यानी सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति की शुरुआत हुई। गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में पहली बार एक भारतीय सदस्य सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा को शामिल किया गया। प्रांतीय विधायिकाओं में भी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।

भारत सरकार अधिनियम 1919

इस एक्ट को मौन्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत द्विसदनात्मक व्यवस्था का निर्माण हुआ जो आज लोकसभा और राज्यसभा के रूप में जाने जाते हैं। उस वक्त लोकसभा को केंद्रीय विधानसभा और राज्यसभा को राज्य परिषद कहा जाता था। केंद्रीय विधानसभा में 140 सदस्य (57 निर्वाचित) और राज्य परिषद में 60 सदस्य (33 निर्वाचित) थे।

भारत सचिव नियुक्त होने के कुछ समय बाद ही मांटेग्यू ने 1917 में कॉमन सभा में ब्रिटिश सरकार के उद्देश्य पर एक महत्वपूर्ण घोषणा की जिसमें उन्होंने भारत में स्वशासी संस्थाओं के विकास एवं सामाजिक सुधारों पर प्रकाश डाला। 

भारत सरकार अधिनियम 1935

भारत सरकार अधिनियम 1935 तीन गोलमेज सम्मेलनों के बाद आया। यह अधिनियम सबसे अधिक बड़ा था। जिसमें 321 अनुच्छेद थे। इस एक्ट के तहत भारत परिषद को समाप्त कर दिया गया और प्रांतीय विधानमंडलों की संख्या में वृद्धि की गई। इसके अलावा बर्मा के प्रशासन को भारत के प्रशासन से अलग कर दिया गया। इसके बाद भारत में पहली बार आम चुनाव संपन्न हुए। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे "दासता का नया चार्टर" कहा था।



 

संविधान सभा 1946

संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया गया। इसकी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई। संविधान सभा में भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। जिसे गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

दूसरा विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री क्लेमेंट रिचर्ड एटली बने। जो लेबर पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे। ये पार्टी भारत की आजादी चाहती थी। मार्च 1946 में एक केबिनैट कमीशन भारत भेजा गया और नेहरू के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का निर्माण किया गया। इसी दौरान मुस्लिम लीग ने अलग देश की मांग की। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के नए वायसराय थे, उन्होंने भारत के विभाजन की योजना प्रस्तुत की। मुस्लिम लीग अपनी मांग पर अड़ी रही जिसके बाद विभाजन को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद 14 अगस्त, 1947 की आधी रात को भारत आजाद हुआ। जिसके बाद से हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जात है।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947

भारतीय स्वतंत्रता अधिनयम ब्रिटिश संसद में 1947 को पारित हुआ। इसके तहत भारत का क्षेत्रीय विभाजन भारत और पाकिस्तान के रूप में किया गया। ब्रिटिश सरकार का राज 15 अगस्त को समाप्त किया गया। भारतीय रियायतों को कहा गया कि वह जहां चाहे, उसी देश में शामिल हो सकती हैं। भारतीय रियायतों पर भी ब्रिटिश क्राउन का प्रभुत्व खत्म हो गया। भारत सचिव का पद खत्म किया गया। इसके अलावा एक्ट में दो नवगठित देशों के बीच बंगाल और पंजाब के प्रांतों का विभाजन भी शामिल किया गया।

भारत के आजाद होने के बाद मुस्लिम लीग ने लियाकत अली को प्रधानमंत्री और जिन्ना को गवर्नर जनरल बनाया। वहीं भारत में कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरु को प्रधानमंत्री और लॉर्ड माउंटबेटन को गवर्नर जनरल बनाया।
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