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पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी से जुड़ी याचिका SC ने की खारिज: कहा- सिस्टम पर भरोसा रखिए; जानें क्या है मामला?
Wed, 15 Jul 2026 04:50 PM IST
प्रशांत तिवारी
आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Wed, 15 Jul 2026 04:50 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों पर कार्रवाई की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता पहले कानून के तहत उपलब्ध सभी वैकल्पिक उपाय अपनाए।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर कार्रवाई की मांग की गई थी। याचिका खारिज करते हुए अदालत कहा कि याचिकाकर्ता पहले कानून के तहत उपलब्ध सभी वैकल्पिक उपाय अपनाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस और आईटी नियमों के तहत कार्रवाई की व्यवस्था मौजूद है, इसलिए सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख नहीं किया जा सकता।
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क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का इस्तेमाल किए बिना ऐसे मामलों में सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता।
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कोर्ट ने याचिका पर क्या टिप्पणी की?
सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि इस तरह की याचिकाओं का उद्देश्य कई बार मामलों को अनावश्यक रूप से सनसनीखेज बनाना प्रतीत होता है। अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि क्या उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों की जानकारी है, क्योंकि इस तरह की शिकायतों के समाधान के लिए पहले से ही कानूनी व्यवस्था मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, 'हम समझते हैं। अनुच्छेद 32 के तहत दायर इन याचिकाओं का उद्देश्य कुछ और ही प्रतीत होता है।'
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कोर्ट ने क्या निर्देश दिए?
आखिरकार अदालत ने जनहित याचिका खारिज कर दी और कहा कि ऐसे मामलों में याचिकाकर्ता को पहले कानून के तहत उपलब्ध सभी उपाय अपनाने चाहिए। इसमें संबंधित पुलिस अधिकारियों से संपर्क करना और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना शामिल है।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पहले पुलिस और कानून के तहत उपलब्ध सभी उपाय अपनाइए।
- अदालत ने साफ किया कि हर शिकायत लेकर सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट नहीं आया जा सकता।
- याचिका में वायरल पॉडकास्ट से कथित आपत्तिजनक वीडियो हटाने और सोशल मीडिया के लिए सख्त नियम बनाने की मांग की गई थी।
- कोर्ट ने कहा कि अगर तय कानूनी प्रक्रिया से राहत न मिले, तब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
याचिका में क्या-क्या मांगें की गई थीं?
एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड अंसार अहमद चौधरी द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से उन वीडियो और पोस्ट की पहचान कर उन्हें हटाने की मांग की गई थी, जिनमें पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक और आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं। इसके साथ ही केंद्र सरकार को ऐसे दिशा-निर्देश बनाने और लागू करने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी, जो डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे कंटेंट के प्रकाशन और प्रसार को नियंत्रित करें, जिसमें पैगंबर मोहम्मद और भगवान राम जैसी सम्मानित धार्मिक हस्तियों के प्रति जानबूझकर अपमानजनक, आपत्तिजनक या उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणियां की गई हों।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को लेकर क्या दलील दी गई?
याचिका में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय लागू करने की भी मांग की गई थी, ताकि धार्मिक भावनाएं आहत होने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने जैसी स्थितियों से बचा जा सके।
पूरा मामला क्या है?
याचिका के अनुसार, यह मामला एक वायरल पॉडकास्ट क्लिप से जुड़ा है। इसमें प्रतिवादी नाजिया इलाही खान ने कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद के बारे में ऐसी टिप्पणियां कीं, जिन्हें याचिकाकर्ता ने अपमानजनक बताया और कहा कि इससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाएं गंभीर रूप से आहत हुई हैं। याचिका में कहा गया कि ये टिप्पणियां एक रिकॉर्डेड पॉडकास्ट के दौरान की गई थीं। इंटरव्यू लेने वाले के पास कथित आपत्तिजनक हिस्से को संपादित करने या हटाने का अवसर था, लेकिन उसने पूरा पॉडकास्ट प्रकाशित कर दिया, जिससे यह सामग्री और व्यापक स्तर पर फैल गई। याचिका में यह भी कहा गया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन इस अधिकार पर संविधान के तहत उचित प्रतिबंध भी लागू होते हैं। किसी सम्मानित धार्मिक हस्ती के बारे में जानबूझकर अपमानजनक टिप्पणी करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं आता, क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है।
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किन-किन को बनाया गया था पक्षकार?
याचिका में केंद्रीय गृह मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), यूट्यूब, फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर) और नाजिया इलाही खान को प्रतिवादी बनाया गया था। इससे पहले 7 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की पीठ ने याचिकाकर्ता को सलाह दी थी कि वह सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के बजाय पहले पुलिस अधिकारियों से संपर्क करे। उस समय जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा था,'पुलिस मौजूद है। हमारे सिस्टम पर भरोसा रखिए। हम सर्वोच्च अदालत हैं और निगरानी की भूमिका में हैं।' उन्होंने यह भी कहा था कि यदि कानूनी प्रक्रिया के बाद भी राहत नहीं मिलती है, तो याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है। याचिका के साथ संलग्न तारीखों के विवरण के अनुसार, कथित टिप्पणियों के संबंध में 23 जून को मुंबई में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके बाद 2 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका दायर की गई।