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'15-18 वर्ष है प्रयोग की उम्र': POCSO पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- झूठी शान के लिए केस दर्ज न कराएं माता-पिता
Mon, 13 Jul 2026 08:30 PM IST
राकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Mon, 13 Jul 2026 08:30 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के आपसी सहमति के संबंधों में पॉक्सो कानून के दुरुपयोग पर गहरी चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि 15-18 साल की उम्र प्रयोग की होती है और माता-पिता के सामाजिक सम्मान के चक्कर में युवा जेल चले जाते हैं। इस मामले में अब व्यावहारिक सुधारों और शिक्षा को लेकर 17 जुलाई को अगली सुनवाई होगी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को किशोरों के आपसी संबंधों में पॉक्सो कानून के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति बीवी नागरथना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि जब 16 से 18 साल के बच्चे आपस में रिश्ता बनाकर चले जाते हैं, तो माता-पिता अपने तथाकथित सम्मान की रक्षा के लिए उन पर आपराधिक केस दर्ज करा देते हैं।
शीर्ष अदालत ने साफ-साफ कहा कि राज्य किसी लड़के और लड़की के भागने को भला कैसे रोक सकता है? पॉक्सो कानून बच्चों के यौन उत्पीड़न और शोषण को रोकने के लिए बना है। 15 से 18 साल की उम्र बहुत संवेदनशील होती है। यह जीवन में प्रयोग करने की उम्र है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन मामलों को वास्तव में पॉक्सो का केस माना जाना चाहिए? अदालत ने चिंता जताई कि ऐसे मामलों में आखिर में हमें युवाओं को बरी ही करना पड़ता है।
कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला किशोरों की निजता के अधिकार से जुड़ा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट खुद संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है। दरअसल, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में किशोर लड़कियों को 'दो मिनट के आनंद' के लिए रिश्तों में न फंसने और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की सलाह दी थी।
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सुलझ चुका है विवाद: वकील माधवी
सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित टिप्पणी को पूरी तरह खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने शीर्ष अदालत को बताया कि जिस घटना से यह विवाद शुरू हुआ था, वह अब पूरी तरह सुलझ चुका है। वह मामला एक नाबालिग लड़की के 25 साल के व्यक्ति के साथ भागने का था। सुप्रीम कोर्ट की बनाई समिति और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बातचीत के बाद रिपोर्ट दी गई थी कि इस तरह के पॉक्सो मामलों में हमारी मौजूदा व्यवस्था कैसे विफल हो रही है।
यह भी पढ़ें: भोजशाला परिसर: मुस्लिम पक्ष की याचिका पर सुनवाई करेगा शीर्ष कोर्ट; हाईकोर्ट ने बताया था मंदिर; क्या है विवाद?
पुनर्वास, शिक्षा और निगरानी पर बहस
वकील माधवी दीवान ने बताया कि वह लड़की अब अपने पति के साथ बहुत खुश है और पूरी तरह सेटल हो चुकी है। उन्होंने कहा कि असली समस्या 17-18 साल के लड़कों को जेल भेजने की है, जिससे उनका जीवन खराब होता है। केंद्र सरकार के वकील ने इस पर सुझाव दिया कि कक्षा छह से ही बच्चों को पॉक्सो कानून और किशोर शिक्षा के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। दीवान ने इन मामलों की ट्रैकिंग के लिए एक ऑनलाइन डैशबोर्ड की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि हर राज्य और हाईकोर्ट के पास अपनी बाल अधिकार कमेटी है, इसलिए केंद्र सरकार को इसकी निगरानी सौंपने की कोई जरूरत नहीं है। इस बेहद महत्वपूर्ण मामले पर अगली सुनवाई अब शुक्रवार, 17 जुलाई को होगी।
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शीर्ष अदालत ने साफ-साफ कहा कि राज्य किसी लड़के और लड़की के भागने को भला कैसे रोक सकता है? पॉक्सो कानून बच्चों के यौन उत्पीड़न और शोषण को रोकने के लिए बना है। 15 से 18 साल की उम्र बहुत संवेदनशील होती है। यह जीवन में प्रयोग करने की उम्र है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन मामलों को वास्तव में पॉक्सो का केस माना जाना चाहिए? अदालत ने चिंता जताई कि ऐसे मामलों में आखिर में हमें युवाओं को बरी ही करना पड़ता है।
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कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला किशोरों की निजता के अधिकार से जुड़ा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट खुद संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है। दरअसल, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में किशोर लड़कियों को 'दो मिनट के आनंद' के लिए रिश्तों में न फंसने और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की सलाह दी थी।
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सुलझ चुका है विवाद: वकील माधवी
सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित टिप्पणी को पूरी तरह खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने शीर्ष अदालत को बताया कि जिस घटना से यह विवाद शुरू हुआ था, वह अब पूरी तरह सुलझ चुका है। वह मामला एक नाबालिग लड़की के 25 साल के व्यक्ति के साथ भागने का था। सुप्रीम कोर्ट की बनाई समिति और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बातचीत के बाद रिपोर्ट दी गई थी कि इस तरह के पॉक्सो मामलों में हमारी मौजूदा व्यवस्था कैसे विफल हो रही है।
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पुनर्वास, शिक्षा और निगरानी पर बहस
वकील माधवी दीवान ने बताया कि वह लड़की अब अपने पति के साथ बहुत खुश है और पूरी तरह सेटल हो चुकी है। उन्होंने कहा कि असली समस्या 17-18 साल के लड़कों को जेल भेजने की है, जिससे उनका जीवन खराब होता है। केंद्र सरकार के वकील ने इस पर सुझाव दिया कि कक्षा छह से ही बच्चों को पॉक्सो कानून और किशोर शिक्षा के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। दीवान ने इन मामलों की ट्रैकिंग के लिए एक ऑनलाइन डैशबोर्ड की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि हर राज्य और हाईकोर्ट के पास अपनी बाल अधिकार कमेटी है, इसलिए केंद्र सरकार को इसकी निगरानी सौंपने की कोई जरूरत नहीं है। इस बेहद महत्वपूर्ण मामले पर अगली सुनवाई अब शुक्रवार, 17 जुलाई को होगी।