पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
फ्री ई-पेपर
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court says Non-supply of chargesheet copy to accused can not be ground for default bail

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- चार्जशीट की प्रति नहीं मिलने मात्र से डिफॉल्ट जमानत का अधिकार नहीं

Wed, 01 Jul 2026 05:37 PM IST
Devesh Tripathi पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 01 Jul 2026 05:37 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगर जांच एजेंसी समयसीमा के भीतर आरोपपत्र दाखिल कर देती है, तो केवल उसकी प्रति आरोपी को न मिलने के आधार पर डिफॉल्ट जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि निर्धारित अवधि में वैध चार्जशीट दाखिल होने के साथ ही डिफॉल्ट जमानत का अधिकार समाप्त हो जाता है। शीर्ष अदालत ने इस संबंध में बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी।

विज्ञापन
Supreme Court says Non-supply of chargesheet copy to accused can not be ground for default bail
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को आरोप-पत्र (चार्जशीट) की प्रति उपलब्ध नहीं कराए जाने को डिफॉल्ट जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक आरोपी की ऐसी ही एक याचिका खारिज कर दी गई थी।
विज्ञापन


आरोपी का तर्क था कि उसे चार्जशीट की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई, इसलिए उसे डिफॉल्ट जमानत दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 193(8) के तहत चार्जशीट की अतिरिक्त प्रतियां दाखिल नहीं किए जाने से स्वयं चार्जशीट अमान्य नहीं हो जाती।
विज्ञापन


कब मिल सकती है डिफॉल्ट जमानत?
अदालत ने कहा कि पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की तरह ही बीएनएसएस के तहत भी डिफॉल्ट जमानत का अधिकार तभी उत्पन्न होता है, जब जांच एजेंसी 60 या 90 दिनों की निर्धारित अवधि के भीतर, जैसा भी मामला हो, चार्जशीट दाखिल नहीं करती।
विज्ञापन
विज्ञापन


पीठ ने कहा, "निर्धारित अवधि के भीतर बीएनएसएस की धारा 193(3) के तहत निर्धारित प्रारूप में चार्जशीट दाखिल हो जाने के बाद डिफॉल्ट जमानत का अधिकार समाप्त हो जाता है। बीएनएसएस की धारा 193(8) का पालन नहीं करने को धारा 187(3) के समान नहीं माना जा सकता।" बता दें कि बीएनएसएस, 2023 की धारा 187(3) डिफॉल्ट जमानत से संबंधित प्रावधानों को नियंत्रित करती है।

साइबर ठगी से जुड़े मामले पर हो रही थी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज एक मामले में गिरफ्तार आरोपी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह मामला करीब 3.81 करोड़ रुपये की कथित बड़े पैमाने की साइबर ठगी से जुड़ा है। सीबीआई के अनुसार, अज्ञात साइबर अपराधी अत्याधुनिक डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर लोगों से ठगी कर रहे हैं। इसके लिए वे फर्जी पहचान, जाली दस्तावेज और अन्य तकनीकी तरीकों का उपयोग करते हैं।

बरकरार रखा बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला
जांच एजेंसी का यह भी दावा है कि साइबर ठगी से हासिल रकम को बैंक खातों में जमा कराने में कुछ बैंक अधिकारी भी उनकी मदद कर रहे हैं। आरोपी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में डिफॉल्ट जमानत की मांग करते हुए कहा था कि भले ही चार्जशीट निर्धारित समयसीमा के भीतर दाखिल कर दी गई थी, लेकिन उसे उसकी प्रति नहीं दी गई।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने सही माना है कि चार्जशीट की प्रति दाखिल या उपलब्ध नहीं कराए जाने को डिफॉल्ट जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसलिए आरोपी की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed