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Supreme Court: 'महिला का निजी वीडियो अपलोड करने की धमकी देना अपराध', महिलाओं की गरिमा पर सुप्रीम टिप्पणी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Sat, 23 May 2026 04:43 AM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की गरिमा और निजता को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि अनैतिकता को पुराने पितृसत्तात्मक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। अदालत ने माना कि महिला का निजी वीडियो वायरल करने की धमकी देना गंभीर अपराध है। कोर्ट ने कहा कि संविधान महिलाओं को सम्मान, निजता और यौन स्वायत्तता का अधिकार देता है।

Supreme Court says Threatening to upload womans private video is crime verdict on womens dignity
11 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

महिलाओं की गरिमा, निजता और यौन स्वायत्तता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि किसी महिला के चरित्र, पवित्रता या अनैतिकता को पुराने पितृसत्तात्मक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि आज के समय में संविधान के मूल्यों के अनुसार महिला की गरिमा और उसकी निजी स्वतंत्रता सबसे अहम है। अदालत ने यह भी माना कि किसी महिला का निजी वीडियो सोशल मीडिया पर डालने की धमकी देना गंभीर अपराध है और यह उसकी इज्जत व निजता पर सीधा हमला है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


क्या है पूरा मामला और कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला तमिलनाडु का है। आरोपी विजय कुमार पर आरोप था कि उसने अपनी पूर्व पार्टनर का नहाते समय वीडियो बना लिया था। बाद में रिश्ता खराब होने पर उसने महिला को धमकी दी कि वह वीडियो फेसबुक पर अपलोड कर देगा। अदालत ने कहा कि इस तरह की धमकी महिला की गरिमा, निजता और यौन स्वायत्तता का उल्लंघन है। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के भाग-दो के तहत आरोपी की दोषसिद्धि को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि किसी महिला का निजी वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी देना उसके चरित्र और सम्मान पर हमला करने जैसा है।
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अनैतिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नई सोच क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अनैतिकता या अशुद्धता जैसे शब्दों को पुराने सामाजिक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि पहले समाज महिलाओं की पवित्रता और चरित्र को केवल नैतिकता के चश्मे से देखता था, लेकिन अब संविधान महिला को गरिमा और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले लेने का अधिकार देता है। कोर्ट ने साफ कहा कि महिला अपनी यौन पसंद, निजी आदतों और जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने के लिए स्वतंत्र है। ऐसे में किसी महिला की निजी जिंदगी को हथियार बनाकर उसे डराना या बदनाम करना गंभीर अपराध है। अदालत ने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को सम्मान और निजता के साथ जीने का अधिकार देता है।

निजी वीडियो और सोशल मीडिया को लेकर कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाथरूम जैसी निजी जगह पर हर व्यक्ति को निजता की पूरी उम्मीद होती है। ऐसे में किसी का वीडियो बनाना और फिर उसे वायरल करने की धमकी देना उसकी निजी जिंदगी में घुसपैठ है। अदालत ने माना कि सोशल मीडिया के दौर में इस तरह के अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और इनका असर महिला की मानसिक स्थिति, सामाजिक सम्मान और निजी जीवन पर गंभीर रूप से पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि किसी महिला की निजी तस्वीर या वीडियो सार्वजनिक करना उसकी यौन गरिमा को ठेस पहुंचाने जैसा है। अदालत ने यह भी कहा कि कानून को समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों और महिलाओं के अधिकारों के अनुरूप समझना जरूरी है।

11 साल पुराने मामले में क्यों अहम बना यह फैसला?
यह मामला करीब 11 साल पुराना है। महिला ने वर्ष 2015 में तमिलनाडु के जिंजी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उसने बताया था कि आरोपी उसके साथ रिश्ते में था और उसी दौरान उसने उसका अश्लील वीडियो बना लिया। बाद में दोनों के संबंध खराब हो गए तो आरोपी ने वीडियो फेसबुक पर डालने की धमकी दी। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसी धमकियां केवल ब्लैकमेल नहीं बल्कि महिला की गरिमा और निजता पर हमला हैं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य में साइबर अपराध, निजी वीडियो लीक और महिलाओं को ब्लैकमेल करने वाले मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।
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