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तमिलनाडु का नया 'नायक': पहले ही चुनाव में विजय का 'मास्टर'स्ट्रोक, करुणानिधि-एमजीआर की विरासत को दी चुनौती

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्रा Updated Mon, 04 May 2026 10:33 AM IST
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सार

तमिलनाडु में सिनेमा के सुपरस्टार्स लंबे समय तक राजनीतिक जगत में भी सुपरहीरो की छवि बनाने में सफल रहे हैं। हालांकि, जे. जयललिता के निधन के बाद से राज्य में ऐसे नेता की कमी रही थी, जो कि सिनेमाई दुनिया के साथ सियासी दुनिया का भी बड़ा चेहरा रहा हो। अब तमिलगा वेत्री कझगम की रुझानों में जबरदस्त बढ़त के बाद विजय तमिल राजनीति में उस खाली पड़ी जगह को भर सकते हैं।

Tamil Nadu Election Analysis: 49 साल की द्रविड़ सत्ता को विजय की चुनौती, तमिलनाडु में मास्टर के आगे सब चित्त
 

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थलापति विजय। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

तमिलनाडु की सियासत में नया सुपरस्टार मिल गया है। आठ साल से सुपरहीरो की जो जगह खाली पड़ी थी उसे थलापति विजय भरते हुए दिख रहे हैं। फिल्म स्टार से राज्य की सत्ता तक पहुंचीं जयललिता के  2016 में और 2018 में करुणनिधि के निधन के बाद से ये जगह खाली थी। पिछले 49 साल से राज्य  सियासत में चल रहा द्रविड़ राजनीति का दबदबा खत्म होता दिख रहा है। 
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बीते 49 साल से सिनेमा के सुपरस्टार ही यहां राजनीति के भी 'नायक' हुआ करते थे। फिर चाहे बात एम. करुणानिधि की हो या सुपरस्टार एमजी रामचंद्रन यानी एमजीआर और जे. जयललिता की। इन सभी नामों के अलावा तमिलनाडु की राजनीति में और भी कई ऐसे नाम रहे हैं, जिन्होंने लंबे समय तक इस दक्षिण भारत के राज्य में मजबूत राजनीतिक मौजूदगी दर्ज की है।
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एमके स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन भले ही तमिल सिनेमा से वास्ता रखते हैं, लेकिन उन्हें भी कॉलीवुड में पहले के अभिनेताओं जैसी लोकप्रियता नहीं मिली। हालांकि, विजय की बात करें तो उनमें वह सब खूबियां रही हैं, जो उन्हें तमिल सिनेमा का सुपरस्टार बनाती हैं। इसीलिए तमिलनाडु में उन्हें उनके पूरे नाम विजय जोसेफ की जगह 'थलापति' विजय के नाम से भी जाना जाता है। थलापति यानी 'दल का नेतृत्व' करने वाला। 

तमिलनाडु चुनाव के शुरुआती रुझानों को देखा जाए तो सामने आता है कि टीवीके ने राज्य में एकतरफा तौर पर दोनों स्थापित द्रविड़ पार्टियों- द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) और अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) के लिए कड़ी चुनौती पेश की है। आलम यह है कि विजय की सीटें इन दोनों पार्टियों से ही ज्यादा हैं। ऐसे में अगर विजय तमिल की राजनीति के अगले 'मास्टर' (विजय की एक फिल्म का शीर्षक) साबित हों तो इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं होनी चाहिए। 

कौन हैं विजय जोसेफ?

सी. जोसेफ विजय, जिन्हें जोसेफ विजय चंद्रशेखर के नाम से भी जाना जाता है का जन्म 22 जून 1974 को हुआ था। उनके पिता एस. ए. चंद्रशेखर एक फिल्म निर्माता हैं और उनकी मां शोभा चंद्रशेखर एक हिंदू हैं जो फिल्मों में बैकग्राउंड सिंगर रही हैं। विजय का ताल्लुक तमिलनाडु के वेल्लालर समुदाय से है, जो एक संपन्न कृषि समूह है और इसमें हिंदू व ईसाई दोनों धर्मों के लोग शामिल हैं।
 

कैसा रहा सिनेमा में आने से लेकर थलापति विजय बनने तक का सफर

सिनेमा की दुनिया में विजय ने 1980 के दशक में अपने पिता द्वारा निर्देशित फिल्मों में एक बाल कलाकार के रूप में कदम रखा था। साल 1992 में उनके माता-पिता ने उन्हें नालैया थीरपू नाम की फिल्म से एक मुख्य अभिनेता के रूप में लॉन्च किया। हालांकि यह पहली फिल्म फ्लॉप रही, लेकिन उनके करियर का सफर रुका नहीं। इस शुरुआती झटके के बाद, उनके पिता ने उन्हें 1993 की फिल्म सेंथूरपांडी में उस समय के लोकप्रिय स्टार विजयकांत के साथ कास्ट किया, जिसने विजय के फिल्म करियर में नई जान फूंक दी।

साल 1994 में जब विजय 20 वर्ष के थे, तब उनके पिता ने रसिगन फिल्म की रिलीज के दौरान उन्हें पहली बार 'इलैयाथलापति' उपाधि के साथ पेश किया, जिसका मतलब 'दल का युवा नेता' होता है। यही नाम आगे चलकर उनके बड़े स्टारडम और अब उनके राजनीतिक सफर की नींव बना है। 

जैसे-जैसे विजय ने तमिल सिनेमा में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया, वैसे-वैसे पूरे राज्य में उनकी चर्चाएं शुरू हो गईं। इसका असर यह हुआ कि विजय कुछ ही समय में उन सितारों की फेहरिस्त में शामिल हो गए, जिनके लिए तमिल सिनेमा के प्रशंसक हमेशा पीछे खड़े दिखते थे। कॉलीवुड में उनकी गिनती उन गिने-चुने स्टार्स में होने लगी, जिनकी फिल्मों की रिलीज से पहले लोग उनके पोस्टरों को दूध से नहलाते थे और फिल्म को हिट कराने के लिए पहले ही दिन से सिनेमा हॉल के बाहर बैठ जाते थे। समकालीन सिनेमा में विजय को सुपरस्टार रजनीकांत का उत्तराधिकारी माना जाता है और उनकी टक्कर में सिर्फ कुछ गिने-चुने अभिनेता ही रखे जाते हैं। 

ये भी पढ़ें: Thalapathy Vijay: विजय की TVK ने CM स्टालिन की DMK का खेल बिगाड़ा! सिल्वर स्क्रीन से सियासी चौसर का सफर कैसा?

कैसे हुई राजनीति में एंट्री?

विजय की राजनीति में एंट्री कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं था, बल्कि यह उनके सिनेमाई सफर और वर्षों की जमीनी तैयारियों का एक सोचा-समझा परिणाम रहा। विजय ने 2024 में अपनी राजनीतिक पार्टी 'तमिलगा वेत्री कझगम' की स्थापना की। अपनी राजनीतिक पारी को सफल करने और राजनीति में पूरी तरह से समय देने के लिए उन्होंने फिल्मों से संन्यास लेने की घोषणा की और बताया कि उनकी अगली फिल्म जना नायकन उनका आखिरी सिनेमाई प्रोजेक्ट होगा। 

27 अक्तूबर 2024 को उन्होंने तमिलनाडु में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए एक राजनेता के रूप में अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया, जिसमें पांच लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे।

सिनेमा के जरिए राजनीतिक जमीन तैयार की

विजय की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की नींव उनकी फिल्मों के जरिए बहुत पहले ही रखी जा चुकी थी। साल 2009 में उन्होंने अपने फैन क्लब्स के लिए 'उन्नाल मुदियुम' जिसका अर्थ है- 'तुम कर सकते हो' के नारे के साथ एक झंडा जारी किया था, जिसे उनके राजनीतिक इरादों का पहला स्पष्ट संकेत माना गया।

इसके बाद 2013 में रिलीज हुई उनकी फिल्म थलाइवा की टैगलाइन 'टाइम टू लीड' (नेतृत्व करने का समय) थी। इसके बाद उन्होंने लगातार ऐसी फिल्में- मर्सल, सरकार, बिगिल कीं, जिनमें उन्होंने खुद को एक रक्षक और न्याय के लिए लड़ने वाले नायक के रूप में पेश किया। इन फिल्मों में उन्होंने भ्रष्टाचार, किसानों की समस्या और चुनाव में धांधली जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

फैन क्लब्स के जमीनी नेटवर्क ने बढ़ाई पहुंच

उनके फैन क्लब्स (जैसे विजय मक्कल इयक्कम) ने कई दशकों तक समाज सेवा के जरिए एक मजबूत जमीनी राजनीतिक नेटवर्क तैयार किया। इस नेटवर्क की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजनीति में आधिकारिक तौर पर आने से पहले ही, 2021 के ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनावों में उनके फैन क्लब (टीवीएमआई) से जुड़े सदस्यों ने राज्य भर में 100 से अधिक सीटें जीती थीं।

राजनीतिक विचारधारा और मुद्दों से बनाई पहचान

अपनी राजनीतिक एंट्री के साथ, विजय ने खुद को एक साफ शक्ति के रूप में पेश किया है। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय, भ्रष्टाचार का विरोध और तमिल अस्मिता को अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाया है। उनकी इस राजनीतिक पारी का मुख्य उद्देश्य तमिलनाडु में दशकों से सत्ता में काबिज प्रमुख द्रविड़ पार्टियों द्रमुक और अन्नाद्रमुक के वर्चस्व को चुनौती देकर राज्य के युवाओं और महिलाओं को एक नया राजनीतिक विकल्प प्रदान करना है।

1967 से दो द्रविड़ दल का प्रभाव

तमिलनाडु में 1967 से ही सी. अन्नादुरई के नेतृत्व में द्रविड़ विचारधारा वाली पार्टी- द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) सत्ता में आई। बाद में द्रमुक से अलग हुई अन्नाद्रमुक ने उसे चुनौती दी। दोनों द्रविड़ दल ही पिछले 49 साल से यहां की सत्ता में काबिज हैं। ये दोनों ही दल फिल्मी सितारों की लोकप्रियता के दम पर यहां सत्ता हासिल करते रहे। अन्नाद्रमुक को पहले एमजीआर और बाद में जे जयललिता के स्टारडम का फायदा होता रहा। वहीं, द्रमुक को एम करुणानिधि की स्टार छवि का फायदा होता रहा। इसके बाद से कभी तमिलनाडु की सत्ता में द्रमुक तो कभी अन्नाद्रमुक काबिज रही और दो राष्ट्रीय दल- कांग्रेस और भाजपा हमेशा ही इन दोनों दलों की गठबंधन की साथी के तौर पर जुड़ी रहीं, लेकिन अपने दम पर सत्ता हासिल करने में नाकाम रहीं। अब विजय जोसेफ और उनकी टीवीके ने द्रविड़ पार्टियों के इस वर्चस्व को तोड़ने का काम किया है और तमिल राजनीति में अलग पहचान बनाई है।


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