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तमिलनाडु का सियासी सस्पेंस: राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी को ही बुलाना चाहिए? जानें कानून के जानकारों की राय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Thu, 07 May 2026 10:29 PM IST
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सार
तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा के बीच सरकार गठन को लेकर कानूनी विशेषज्ञों की राय बंट गई है। 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी टीवीके के नेता विजय ने राज्यपाल से सरकार बनाने का दावा पेश किया है, लेकिन बहुमत के 118 के आंकड़े से वे 5 सीट दूर हैं। विशेषज्ञों का एक पक्ष कहता है कि राज्यपाल को विजय को मौका देना चाहिए, वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि स्थिरता के लिए पहले बहुमत का सबूत जरूरी है। आइए, विस्तार से जानते हैं कानून के जानकारों की राय...
तमिलनाडु में सस्पेंस बरकरार।
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
तमिलनाडु की राजनीति में इस समय बड़ा पेच फंस गया है। हाल ही में हुए चुनाव के नतीजे आने के बाद वहां 'त्रिशंकु विधानसभा' जैसी स्थिति बन गई है, यानी किसी एक पार्टी को अकेले सरकार चलाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं मिला है। अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन सरकार बनाने के लिए उन्हें कुछ और विधायकों की जरूरत है। इसी बीच, राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर द्वारा विजय को सरकार बनाने का न्योता देने में हो रही 'देरी' पर देश के बड़े कानूनी जानकारों के बीच बहस छिड़ गई है। कुछ का कहना है कि राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी को ही मौका देना चाहिए, जबकि कुछ का मानना है कि राज्यपाल पहले बहुमत का सबूत मांग सकते हैं।
तमिलनाडु विधानसभा का गणित क्या है और पेंच कहां फंसा?
तमिलनाडु की 24 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 118 का है। 23 अप्रैल को हुए चुनावों में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके ने 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव हासिल किया। हालांकि, कांग्रेस के 5 विधायकों ने विजय को अपना समर्थन दे दिया है, फिर भी उनके पास कुल 113 विधायक ही हो रहे हैं। बहुमत के लिए अभी भी 5 और विधायकों की कमी है। विजय ने पिछले 24 घंटों में दो बार राज्यपाल से मुलाकात की है और सरकार बनाने का मौका मांगा है, लेकिन राज्यपाल की ओर से अभी तक कोई न्योता नहीं मिला है।
क्या राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना ही पड़ेगा?
कानून के कुछ बड़े जानकार मानते हैं कि राज्यपाल के पास सबसे बड़ी पार्टी को बुलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह का कहना है कि राज्यपाल के लिए सबसे बड़ी पार्टी को न बुलाना "अनुचित" है। उनका तर्क है कि चूंकि किसी दूसरे गठबंधन के पास भी बहुमत नहीं है, इसलिए सबसे बड़े दल को मौका मिलना चाहिए। वरिष्ठ वकील अजीत सिन्हा का भी यही मानना है कि राज्यपाल को तुरंत विजय को न्योता देना चाहिए और उन्हें 10 से 15 दिनों का समय देना चाहिए ताकि वे विधानसभा के अंदर अपना बहुमत साबित कर सकें। उनके अनुसार, सरकार की किस्मत का फैसला राजभवन में नहीं बल्कि विधानसभा में होना चाहिए।
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ये भी पढ़ें- पश्चिम बंगाल में राज्यपाल आरएन रवि ने विधानसभा भंग की; कोलकाता में कल भाजपा विधायक दल की बैठक
क्या राज्यपाल बहुमत का सबूत मांगने का हक रखते हैं?
दूसरी ओर, कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल की जिम्मेदारी एक स्थिर सरकार बनवाने की है। वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी का कहना है कि राज्यपाल को यह पूछने का पूरा हक है कि क्या टीवीके के पास वाकई बहुमत है। अगर विजय बहुमत का समर्थन पत्र नहीं दे पाते हैं, तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने की नौबत भी आ सकती है। द्विवेदी के अनुसार, विजय को अपने समर्थक विधायकों की सूची या उनके समर्थन पत्र राज्यपाल को सौंपने चाहिए ताकि राज्यपाल संतुष्ट हो सकें। वकील अमित आनंद तिवारी भी कहते हैं कि सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी होना ही काफी नहीं है, राज्यपाल को यह देखना होता है कि क्या वह पार्टी सदन में टिक पाएगी या नहीं।
संविधान के तहत राज्यपाल के पास कितनी ताकत?
वरिष्ठ वकील विकास पाहवा ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल के पास कुछ विशेष अधिकार होते हैं, खासकर तब जब किसी को स्पष्ट बहुमत न मिले। संविधान में ऐसा कोई कड़ा नियम नहीं है कि राज्यपाल को हर हाल में सबसे बड़ी पार्टी को ही बुलाना ही होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह कहा गया है कि राज्यपाल को निष्पक्ष रहना चाहिए और देरी नहीं करनी चाहिए। पाहवा के अनुसार, अगर राज्यपाल जानबूझकर देरी करते हैं या पक्षपात करते हैं, तो उनके फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
क्या होगा अगर सरकार बनाने में ज्यादा देरी हुई?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर राज्यपाल बिना किसी ठोस कारण के सबसे बड़ी पार्टी के दावे को लटकाए रखते हैं, तो इसे मनमाना व्यवहार माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह साफ किया है कि बहुमत की असली परीक्षा 'फ्लोर टेस्ट' यानी विधानसभा की कार्यवाही के दौरान ही होनी चाहिए। अगर राज्यपाल को लगता है कि विजय के पास नंबर कम हैं, तो वे उनसे लिखित सबूत मांग सकते हैं। लेकिन अगर मामला लंबे समय तक खिंचता है, तो यह संवैधानिक संकट बन सकता है। अब सबकी नजरें राजभवन पर टिकी हैं कि क्या राज्यपाल लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करते हुए विजय को मौका देते हैं या फिर नंबरों के खेल में मामला उलझा रहता है।
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तमिलनाडु विधानसभा का गणित क्या है और पेंच कहां फंसा?
तमिलनाडु की 24 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 118 का है। 23 अप्रैल को हुए चुनावों में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके ने 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव हासिल किया। हालांकि, कांग्रेस के 5 विधायकों ने विजय को अपना समर्थन दे दिया है, फिर भी उनके पास कुल 113 विधायक ही हो रहे हैं। बहुमत के लिए अभी भी 5 और विधायकों की कमी है। विजय ने पिछले 24 घंटों में दो बार राज्यपाल से मुलाकात की है और सरकार बनाने का मौका मांगा है, लेकिन राज्यपाल की ओर से अभी तक कोई न्योता नहीं मिला है।
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क्या राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना ही पड़ेगा?
कानून के कुछ बड़े जानकार मानते हैं कि राज्यपाल के पास सबसे बड़ी पार्टी को बुलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह का कहना है कि राज्यपाल के लिए सबसे बड़ी पार्टी को न बुलाना "अनुचित" है। उनका तर्क है कि चूंकि किसी दूसरे गठबंधन के पास भी बहुमत नहीं है, इसलिए सबसे बड़े दल को मौका मिलना चाहिए। वरिष्ठ वकील अजीत सिन्हा का भी यही मानना है कि राज्यपाल को तुरंत विजय को न्योता देना चाहिए और उन्हें 10 से 15 दिनों का समय देना चाहिए ताकि वे विधानसभा के अंदर अपना बहुमत साबित कर सकें। उनके अनुसार, सरकार की किस्मत का फैसला राजभवन में नहीं बल्कि विधानसभा में होना चाहिए।
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क्या राज्यपाल बहुमत का सबूत मांगने का हक रखते हैं?
दूसरी ओर, कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल की जिम्मेदारी एक स्थिर सरकार बनवाने की है। वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी का कहना है कि राज्यपाल को यह पूछने का पूरा हक है कि क्या टीवीके के पास वाकई बहुमत है। अगर विजय बहुमत का समर्थन पत्र नहीं दे पाते हैं, तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने की नौबत भी आ सकती है। द्विवेदी के अनुसार, विजय को अपने समर्थक विधायकों की सूची या उनके समर्थन पत्र राज्यपाल को सौंपने चाहिए ताकि राज्यपाल संतुष्ट हो सकें। वकील अमित आनंद तिवारी भी कहते हैं कि सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी होना ही काफी नहीं है, राज्यपाल को यह देखना होता है कि क्या वह पार्टी सदन में टिक पाएगी या नहीं।
संविधान के तहत राज्यपाल के पास कितनी ताकत?
वरिष्ठ वकील विकास पाहवा ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल के पास कुछ विशेष अधिकार होते हैं, खासकर तब जब किसी को स्पष्ट बहुमत न मिले। संविधान में ऐसा कोई कड़ा नियम नहीं है कि राज्यपाल को हर हाल में सबसे बड़ी पार्टी को ही बुलाना ही होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह कहा गया है कि राज्यपाल को निष्पक्ष रहना चाहिए और देरी नहीं करनी चाहिए। पाहवा के अनुसार, अगर राज्यपाल जानबूझकर देरी करते हैं या पक्षपात करते हैं, तो उनके फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
क्या होगा अगर सरकार बनाने में ज्यादा देरी हुई?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर राज्यपाल बिना किसी ठोस कारण के सबसे बड़ी पार्टी के दावे को लटकाए रखते हैं, तो इसे मनमाना व्यवहार माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह साफ किया है कि बहुमत की असली परीक्षा 'फ्लोर टेस्ट' यानी विधानसभा की कार्यवाही के दौरान ही होनी चाहिए। अगर राज्यपाल को लगता है कि विजय के पास नंबर कम हैं, तो वे उनसे लिखित सबूत मांग सकते हैं। लेकिन अगर मामला लंबे समय तक खिंचता है, तो यह संवैधानिक संकट बन सकता है। अब सबकी नजरें राजभवन पर टिकी हैं कि क्या राज्यपाल लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करते हुए विजय को मौका देते हैं या फिर नंबरों के खेल में मामला उलझा रहता है।
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