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West Asia Crisis: आसान नहीं है अमेरिका की आगे की राह, जानें कैसे होगा इस समस्या का समाधान

Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Wed, 15 Apr 2026 08:29 PM IST
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सार

अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी को शुरु हुआ युद्ध अब संघर्ष विराम के दौर में है। इस बीच दोनों ही पक्ष युद्ध को स्थायी तौर पर खत्म करने के लिए लगातार चर्चाओं पर जोर दे रहे हैं। इस बीच अमेरिकी सरकार ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ पाकिस्तान में दूसरे दौर की वार्ता भी संभव है। 

West Asia Crisis US Iran vs Israel War Hormuz Strait NATO European Allies Oil Prices Donald Trump Mojtaba
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची - फोटो : ANI
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विस्तार

अमेरिका और रूस दोनों मंहगा कच्चा तेल बेच रहे हैं। तेल और गैस से दोनों को फायदा। इस बीच चीन ने अमेरिका को उसकी हद बताई है। रूस ने पश्चिम एशिया संकट के समाधान का प्रस्ताव दिया। दोनों महाशक्तियों के खेल ने राष्ट्रपति ट्रंप को एक नई मुसीबत में डाल दिया है। ऐसे में होर्मुज समस्या के समाधान के हाल-फिलहाल की उम्मीद कम है। जानिए आगे क्या होगा?
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विदेश सेवा के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि अमेरिका का एक एयरक्राफ्ट कैरियर पश्चिम एशिया में पहुंचा है, लेकिन वह होमुर्ज जल डमरू से काफी दूर लंगर डाले है। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि अमेरिका का यह जहाज लाल सागर में हूतियों के आतंक के कारण पूरे दक्षिण अफ्रीका से घूमते हुए पहुंचा। तुर्किये के राष्ट्रपति काफी समय से ईरान के पक्ष में खुलकर बोल रहे हैं। ब्रिटेन जैसे देश भी अमेरिका से रणनीतिक दूरी बना रहे हैं। अमेरिका के बार-बार दबाव के बावजूद नाटो संगठन के देश होमुंर्ज गतिरोध में खुलकर नहीं आ रहे हैं।  
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दोस्त के दम पर ईरान ने अमेरिका और इस्राइल से डरना छोड़ दिया
पश्चिम एशिया संकट में ईरान के अड़े और खड़े रहने का राज उसके दोस्त देशों का सहयोग है। रूस और चीन संयुक्त राष्ट्र महासंघ से लेकर हर मोड़ पर ईरान के साथ हैं। इस रणनीतिक सहयोग से ईरान के हौसले बुलंद हैं। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जहां ईरान को सामरिक, रणनीतिक साझीदार देश बताकर पश्चिम संकट के समाधान का प्रस्ताव देने की पेशकश की, वहीं चीन ने अमेरिका की समुद्री नाकेबंदी का कड़ा प्रतिवाद किया। चीन के जहाज होमुर्ज से बिना किसी अमेरिकी प्रतिरोध के बाहर आए हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों को पता है कि चीन ईरान को सैन्य साजो-सामान आदि से सहयोग कर रहा है। ईरान चीन की ऊर्जा जरूरतों से समेत अन्य को पूरा कर रहा है। दूसरी तरफ तुर्किए के राष्ट्रपति ने इस्राइल को सैन्य हस्तक्षेप की चेतावनी दी है। इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी ने भी अपने स्वतंत्र रुख को दिखाया। इस्राइल को भी छोटा सा झटका दिया है। कतर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, जार्डन को भी अब आर्थिक नुकसान के कारण पश्चिम एशिया में होर्मुज का गतिरोध अखर रहा है। सबसे दिलचस्प है कि बार-बार अमेरिका के अनुरोध, अपील के बाद भी होर्मुज में गतिरोध दूर करने के लिए कोई देश आगे नहीं आ रहा है।

होर्मुज कूटनीति का भी है खेल
दुनिया के सबसे व्यस्ततम कारोबारी रूट होर्मज पर ईरान के डर का साया है। ईरान ने इस मामले में काफी चतुराई बरती है। वर्षों बाद उसने भारत को भी तेल बेचा। आर्डर लिए हैं। भारत के कच्चे तेल और रसोई गैस के जहाज देश के बंदरगाह पर माल लेकर आ रहे हैं। चीन समेत उसके मित्र देशों को कोई खास असुविधा नहीं हो रही है। जबकि सऊदी अरब समेत अन्य खाड़ी देश इसकी काफी बड़ी कीमत चुका रहे हैं। इससे दुनिया की 4.5 करोड़ आबादी परेशान है और मंहगाई बढ़ने के साथ-साथ भुखमरी बढ़ने का खतरा बढ़ता जा रहा है। ईरान की इस हेकड़ी से अमेरिका के माथे पर बल है। दुनिया के देश इसका ठीकरा इस्राइल के बहकावे में आए अमेरिका और उसके राष्ट्रपति पर फोड़ रहे हैं। अधिकांश का कहना है कि अमेरिका ने युद्ध में उलझाकर सबकी अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल दिया है। राष्ट्रपति ट्रंप के पास होमुर्ज रूट को खुलवाने और सुचारु रूप से संचालित करा पाने का कोई ठोस उपाय नहीं है।

बढ़ती तेल की कीमतें और मालामाल होते रूस-अमेरिका
होमुर्ज संकट ने कच्चे तेल की कीमतों को बहुत ऊंचा कर दिया है। इससे रूस की अर्थव्यवस्था को काफी फायदा हुआ। रूस मंहगा तेल बेच रहा है। यही हाल अमेरिका का है। अमेरिका कह रहा है कि वह होमुर्ज का इस्तेमाल नहीं करता। उसके पास तेल, गैस का पर्याप्त भंडार है। जिसे चाहिए ले जाएं। ऐसी स्थिति में अमेरिका के भी तेल की बिक्री भी बढ़ी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को होने वाली आय को लेकर कई बार तरह तरह की संभावना बता चुके हैं।

....तो समस्या का कैसे होगा समाधान?
अमेरिका 14 दिन के संघर्ष विराम में पाकिस्तान का इस्तेमाल करके उसे डाकिया की भूमिका में रख रहा है। विदेश मामले के जानकारों का कहना है कि अमेरिका के ऊपर पाकिस्तान का कोई दबाव कारगर नहीं हो सकता। दूसरी तरफ ईरान अपने हितों से बहुत समझौता नहीं कर सकता। इस्राइल ने लेबनान में हिजबुल्ला के खिलाफ फ्रंट खोल रखा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतेन्याहू पीछे न हटने की प्रतिबद्धता दिखाते हैं। इस स्थिति में ईरान को शांति वार्ता के बाबत भरोसा नहीं हो पा रहा है। एसके शर्मा का कहना है कि अमेरिका चाहता है कि सभी देश आगे आएं। ईरान पर दबाव बनाएं और होर्मुज की समस्या का समाधान हो। जबकि ईरान का कहना है कि युद्ध उसपर थोपा गया है। उसे टॉप लीडरशिप और 270 डॉलर का नुकसान हुआ है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन बार-बार कहते हैं कि उनका देश युद्ध के पक्ष में नहीं है, लेकिन उन्हें अकारण हुए नुकसान का मुआवजा चाहिए। उन्हें आगे भी किसी तरह का हमला न होने का भरोसा चाहिए। एस के शर्मा कहते हैं कि रूस, चीन और नाटो देश सब मिलकर साथ आएं और शांति वार्ता की पहल हो तो होमुर्ज की समस्या और पश्चिम एशिया में तनातनी का से समाधान हो सकता है। यहां अमेरिका को एक डर है कि इससे पश्चिम एशिया में उसकी स्थिति थोड़ी कमजोर हो सकती है। माना जा रहा है कि रूस और चीन भी इसी स्थिति में अपनी भलाई देख रहे हैं। ऐसे में अभी शीघ्र समाधान की संभावना कम दिखाई दे रही है।
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