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कमल शुभंकर: भाजपा के अधिकारी की कभी थी दीदी से वफादारी; अब उन्हें ही सत्ता से बेदखल करने वाले दल का चेहरा बने
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्रा
Updated Mon, 04 May 2026 06:05 PM IST
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सार
मौजूदा समय में शुभेंदु भाजपा की राज्य इकाई के नेता हैं। वह मई 2021 से इस पद पर कार्यरत हैं। 1995 में उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से है। वह 1998 से 2020 तक तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कद्दावर नेता रहे और ममता बनर्जी की सरकार में परिवहन और सिंचाई मंत्री के रूप में भी कार्य किया। 2020 के बाद जबसे वे भाजपा में शामिल हुए तब से उन्होंने पार्टी के मुख्य रणनीतिकार के तौर पर काम किया है।
शुभेंदु अधिकारी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के रुझानों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला है। पार्टी को राज्य की करीब दो-तिहाई सीटों पर बढ़त मिली है। अगर चुनाव के नतीजे भी कुछ इसी तर्ज पर रहते हैं तो यह पहली बार होगा जब बंगाल में भाजपा की सरकार बनने का रास्ता साफ होगा।
इस जीत में कई बड़े चेहरों का हाथ रहा है। हालांकि, इन सबमें एक नाम ऐसा है, जिसे बंगाल में भाजपा की जीत का सबसे अहम चेहरा माना जा रहा है। यह शख्सियत है नंदीग्राम से भाजपा विधायक और बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी की, जो कि 2020 के बाद से ही लगातार राज्य में भाजपा को जिताने की कोशिशों में जुटे हैं।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर शुभेंदु अधिकारी कौन हैं? उनकी राजनीतिक विरासत क्या है? शुभेंदु किस तरह बंगाल की राजनीति के लिए मायने रखते हैं? अलग-अलग दलों में उनकी सियासत किस तरह की रही है? भाजपा में आने के बाद उन्होंने बंगाल में पार्टी को किस तरह बढ़ाया है? आइये जानते हैं...
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इस जीत में कई बड़े चेहरों का हाथ रहा है। हालांकि, इन सबमें एक नाम ऐसा है, जिसे बंगाल में भाजपा की जीत का सबसे अहम चेहरा माना जा रहा है। यह शख्सियत है नंदीग्राम से भाजपा विधायक और बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी की, जो कि 2020 के बाद से ही लगातार राज्य में भाजपा को जिताने की कोशिशों में जुटे हैं।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर शुभेंदु अधिकारी कौन हैं? उनकी राजनीतिक विरासत क्या है? शुभेंदु किस तरह बंगाल की राजनीति के लिए मायने रखते हैं? अलग-अलग दलों में उनकी सियासत किस तरह की रही है? भाजपा में आने के बाद उन्होंने बंगाल में पार्टी को किस तरह बढ़ाया है? आइये जानते हैं...
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शुभेंदु अधिकारी कौन हैं, उनकी राजनीतिक विरासत क्या है?
शुभेंदु का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के करकुली में हुआ था। उनकी मां का नाम गायत्री अधिकारी है। शुभेंदु बंगाल के एक बेहद ताकतवर राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता, शिशिर अधिकारी राज्य के एक प्रमुख नेता हैं जो मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रह चुके हैं। पूर्व मेदिनीपुर क्षेत्र में उनके परिवार का इतना गहरा प्रभाव है कि उन्हें अक्सर इलाके का सियासी सम्राट कहा जाता है। शुभेंदु के भाई दिब्येंदु और सौमेंदु भी सांसद और नेता के रूप में सक्रिय हैं।शिक्षा के क्षेत्र में, उन्होंने रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से कला में स्नातकोत्तर की डिग्री ली है।
कैसे हुई शुभेंदु के राजनीतिक करियर की शुरुआत?
1. कांग्रेस में शामिल होकर पार्षद का चुनाव जीते
शुभेंदु अधिकारी की राजनीति में एंट्री कांग्रेस के जरिए हुई थी 1995 में उन्होंने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए कांग्रेस जॉइन की। इसी साल वह पहली बार कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में पूर्वी मेदिनीपुर की कांथी नगर पालिका में पार्षद चुने गए थे। हालांकि, शुभेंदु और कांग्रेस का साथ ज्यादा लंबा नहीं चला। 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस का गठन किया, तो शुभेंदु और उनका पूरा परिवार भी टीएमसी का हिस्सा बन गया। इसी के चलते अधिकारी परिवार के कोई बार टीएमसी के सह-संस्थापकों के तौर पर भी जाना जाता है।
2. पहली बार टीएमसी से ही बने विधायक
राज्य स्तर की मुख्यधारा की राजनीति में उनका बड़ा कदम साल 2006 में आया। वह कांथी दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जीतकर पहली बार पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंचे। इसी वर्ष उन्हें कांथी नगर पालिका का अध्यक्ष भी चुना गया।
3. एक आंदोलन ने बनाया टीएमसी का 'बड़ा चेहरा'
शुभेंदु के जीवन में बड़ा मोड़ 2007 में आया, जब उन्होंने बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकार की नंदीग्राम में ऐतिहासिक भूमि-अधिग्रहण विरोधी आंदोलन की कमान संभाली और 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी' का नेतृत्व किया। इसी आंदोलन ने बंगाल में 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने और 2011 में टीएमसी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। इसने ममता बनर्जी और टीएमसी को बंगाल की सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई। इसी लोकप्रियता के दम पर 2009 में वह तमलुक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा सांसद बने।
शुभेंदु के जीवन में बड़ा मोड़ 2007 में आया, जब उन्होंने बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकार की नंदीग्राम में ऐतिहासिक भूमि-अधिग्रहण विरोधी आंदोलन की कमान संभाली और 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी' का नेतृत्व किया। इसी आंदोलन ने बंगाल में 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने और 2011 में टीएमसी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। इसने ममता बनर्जी और टीएमसी को बंगाल की सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई। इसी लोकप्रियता के दम पर 2009 में वह तमलुक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा सांसद बने।
तृणमूल में कैसे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए शुभेंदु?
टीएमसी के गठन में अधिकारी परिवार के शामिल रहने और शुरुआती आंदोलनों में अहम भूमिका निभाने की वजह से शुभेंदु का टीएमसी में बड़ा कद रहा। उन्हें तृणमूल के अहम स्तंभों के तौर पर जाना जाता था। आलम यह था कि टीएमसी में ही नेता मानते थे कि ममता के बाद पार्टी का चेहरा शुभेंदु अधिकारी ही हैं। इस तरह टीएमसी में उनकी छवि ममता के बाद नंबर-2 नेता की बन गई थी।नंदीग्राम की सफलता के बाद, 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तमलुक सीट से सत्तासीन माकपा के बड़े नेता लक्ष्मण सेठ को 1.73 लाख से अधिक वोटों से हराया। 2014 में वह दोबारा इसी सीट से सांसद चुने गए।
सांसद रहने के बाद, 2016 में शुभेंदु वापस विधानसभा चुनाव लड़े और नंदीग्राम सीट से जीत हासिल की। इसके बाद उन्हें ममता बनर्जी की सरकार में परिवहन और सिंचाई जैसे भारी भरकम मंत्रालयों का कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
पश्चिम बंगाल में आज जिन क्षेत्रों में भाजपा का दबदबा उसमें शुभेंदु ने ही प्रभाव बनाया
टीएमसी में रहते हुए शुभेंदु ने ग्रामीण बंगाल में गहरी पैठ बनाई। उनके नेतृत्व को देखते हुए ममता बनर्जी ने उन्हें 'जंगल महल' क्षेत्र- पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा का प्रभारी बनाया। इन सभी जगहों पर उन्होंने टीएमसी का सफलतापूर्वक विस्तार किया। इसके अलावा, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में भी कांग्रेस को कमजोर कर टीएमसी को मजबूत करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। यही वजह है कि जब शुभेंदु भाजपा में शामिल हुए तो भले ही उन्होंने टीएमसी छोड़ दी, लेकिन इन क्षेत्रों पर उनका प्रभाव लगातार बना रहा।
टीएमसी में रहते हुए शुभेंदु ने ग्रामीण बंगाल में गहरी पैठ बनाई। उनके नेतृत्व को देखते हुए ममता बनर्जी ने उन्हें 'जंगल महल' क्षेत्र- पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा का प्रभारी बनाया। इन सभी जगहों पर उन्होंने टीएमसी का सफलतापूर्वक विस्तार किया। इसके अलावा, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में भी कांग्रेस को कमजोर कर टीएमसी को मजबूत करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। यही वजह है कि जब शुभेंदु भाजपा में शामिल हुए तो भले ही उन्होंने टीएमसी छोड़ दी, लेकिन इन क्षेत्रों पर उनका प्रभाव लगातार बना रहा।
टीएमसी से भाजपा में आने की क्या है कहानी?
1. अभिषेक बनर्जी के आगे घटता कद
शुभेंदु अधिकारी का टीएमसी से मोहभंग होने और भाजपा में शामिल होने का सफर कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों से होकर गुजरा। दरअसल, शुभेंदु टीएमसी में एक बड़े और जमीनी नेता थे, लेकिन ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का पार्टी में बढ़ता कद और प्रभाव उनके असंतोष का सबसे प्रमुख कारण बना। अभिषेक को पार्टी प्रबंधन में अधिक जिम्मेदारियां दी जा रही थीं, जिससे कई जिलों में पार्टी को खड़ा करने वाले शुभेंदु खुद को किनारे महसूस करने लगे थे। इसके अलावा, 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर का प्रभाव भी बढ़ने लगा था, जिनसे शुभेंदु के गहरे मतभेद थे।
2. फिर शुरू हुआ टीएमसी से दूरी बनाने का सिलसिला
इन मतभेदों के चलते उन्होंने पार्टी के कार्यक्रमों और कैबिनेट की बैठकों से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। 10 नवंबर 2020 को उन्होंने नंदीग्राम में एक रैली आयोजित की थी, जिसमें टीएमसी का कोई बैनर नहीं लगाया गया था और न ही उन्हें वहां एक मंत्री के रूप में संबोधित किया गया। इसी रैली में उन्होंने खुले मंच से कहा था, 'मैदान-ए-जंग में मिलेंगे', जिससे उनके बागी होने के साफ संकेत मिल गए थे।
3. इस्तीफों का सिलसिला
टीएमसी नेतृत्व की ओर से उन्हें मनाने के प्रयास लगातार नाकाम रहे और नवंबर-दिसंबर 2020 में उन्होंने एक-एक करके अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया।
26 नवंबर 2020: शुभेंदु ने हुगली रिवर ब्रिज कमीशन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
27 नवंबर 2020: ममता सरकार में परिवहन और सिंचाई मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
16 दिसंबर 2020: विधायक के पद से अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा।
17 दिसंबर 2020: आखिरकार तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्राथमिक सदस्यता से भी पूरी तरह से इस्तीफा दे दिया।
टीएमसी नेतृत्व की ओर से उन्हें मनाने के प्रयास लगातार नाकाम रहे और नवंबर-दिसंबर 2020 में उन्होंने एक-एक करके अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया।
26 नवंबर 2020: शुभेंदु ने हुगली रिवर ब्रिज कमीशन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
27 नवंबर 2020: ममता सरकार में परिवहन और सिंचाई मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
16 दिसंबर 2020: विधायक के पद से अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा।
17 दिसंबर 2020: आखिरकार तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्राथमिक सदस्यता से भी पूरी तरह से इस्तीफा दे दिया।
और फिर भाजपा में हुई एंट्री
टीएमसी से सारे नाते तोड़ने के बाद, 2021 के बंगाल विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले 19 दिसंबर 2020 को शुभेंदु अधिकारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में आधिकारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए। यहां उन्हें सीधे 2021 के चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने की अहम भूमिका सौंपी गई। हालांकि, तब तक बंगाल में भाजपा के कुछ और चेहरे भी सक्रिय भूमिका में थे। इनमें एक नाम दिलीप घोष और दूसरा नाम- कैलाश विजयवर्गीय का था। ऐसे में 2021 के चुनाव में शुभेंदु को उतना दायरा नहीं मिला, जितना उन्हें 2026 के चुनाव में मिला है।इसके बावजूद नंदीग्राम सीट से जब उन्होंने चुनाव लड़ने की घोषणा की और इस सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें चुनौती दी तो शुभेंदु ने जीत हासिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने ममता बनर्जी को 1956 वोटों के अंतर से हरा दिया। ममता को इस सीट पर हार के बाद भवानीपुर सीट से चुनाव लड़ना पड़ा और इसके बाद ही उनकी सीएम कुर्सी उनके पास रही। शुभेंदु की इस जीत के बाद उन्हें जायंट किलर के तौर पर पहचाना गया और भाजपा में उनका कद तेजी से बढ़ा।
बंगाल भाजपा को कैसे जिताया चुनाव?
विपक्ष के नेता की भूमिका: नंदीग्राम की जीत के बाद, मई 2021 में उन्हें पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया गया। इस पद के मिलने के बाद से ही माना जाने लगा था कि अगर भाजपा बंगाल में सत्ता हासिल करती है, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद के मुख्य दावेदारों में से एक होंगे।पार्टी के अंदर एकजुटता बढ़ाने वाले मुख्य रणनीतिकार: 2021 के चुनाव में हार के बाद गुटबाजी से जूझ रही बंगाल भाजपा इकाई में शुभेंदु ने नेताओं को एकजुट करने का काम किया है। विश्लेषकों के मुताबिक, 2026 के चुनाव में टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीतियों तक में उनका सीधा प्रभाव है। केंद्रीय नेतृत्व खासकर अमित शाह के साथ उनके करीबी समीकरणों ने राज्य इकाई में उनके प्रभाव को और मजबूत किया है।
भ्रष्टाचार और चुनाव बाद हिंसा पर आक्रामक रुख: 2 मई 2021 को चुनाव परिणाम आने के बाद बंगाल में हुई राजनीतिक हिंसा के खिलाफ शुभेंदु ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में सबूतों के साथ याचिकाएं दायर कीं। नतीजतन अदालत ने मामले में एफआईआर दर्ज करने और जांच के आदेश दिए। इसके अलावा, वह सारदा चिट फंड घोटाले और अन्य भ्रष्टाचार मामलों में टीएमसी नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए सीबीआई और ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों पर लगातार दबाव बनाते रहे हैं।
घुसपैठ और सीएए पर मुखर रुख: भाजपा के वैचारिक रुख के तहत उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के तहत हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का पुरजोर समर्थन किया है। साथ ही, उन्होंने बंगाल में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है और टीएमसी सरकार पर फर्जी वोटर आईडी बनाने में मदद करने का आरोप लगाया।
ममता बनर्जी को सीधी चुनौती: 2026 के चुनावों में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को उनकी ही सीट भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से भी चुनौती दी है। इसके जरिए उन्होंने खुद को पार्टी के प्रमुख चेहरे के तौर पर स्थापित किया और सीएम पद का दावेदार होने के संकेत भी दिए।
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