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Bengal: भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन से मिले गोरखा नेता, गोरखालैंड की पुरानी मांग फिर चर्चा में, रखी यह बड़ी मांग

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, सिलीगुड़ी। Published by: एन अर्जुन Updated Mon, 02 Mar 2026 03:18 PM IST
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West Bengal Politics Gorkha leaders meet BJP Chief Nitin Nabin Gorkhaland demand discussion back know details
भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन से मिले गोरखा नेता, गोरखालैंड की पुरानी मांग फिर चर्चा में - फोटो : अमर उजाला
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देश की संघीय संरचना और राज्यों के पुनर्गठन से जुड़ा गोरखालैंड का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले गोरखा समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात कर अलग गोरखालैंड राज्य की पुरानी मांग दोहराई। साथ ही यह भी कहा कि यदि अलग राज्य संभव नहीं है तो उत्तर बंगाल को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया जाए।

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सिलीगुड़ी में हुई इस बैठक में गोरखा समुदाय के प्रतिनिधियों ने पहाड़ी क्षेत्रों की प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को विस्तार से रखा। बैठक में दार्जिलिंग से भाजपा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता राजू बिष्ट और भाजपा विधायक नीरज जिम्बा भी मौजूद थे।
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बैठक के बाद सांसद राजू बिष्ट ने कहा, हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है और गोरखा समाज की पीड़ा को सामने आना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाजपा संवाद के जरिए समाधान में विश्वास करती है और यदि 2026 में राज्य में भाजपा की सरकार बनती है तो पहाड़ की समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सांसद के रूप में वे गोरखा समाज के साथ मजबूती से खड़े हैं।

गोरखालैंड की मांग नई नहीं
गोरखालैंड की मांग 1980 के दशक से राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा रही है। दार्जिलिंग और आसपास के पहाड़ी इलाकों में अलग राज्य की मांग को लेकर कई बार आंदोलन हुए। 2007 के आंदोलन के बाद गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्वशासन के जरिए समस्याओं का समाधान करना था। हालांकि, गोरखा संगठनों का आरोप है कि जीटीए के गठन के बावजूद मूल समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।

राज्य पुनर्गठन और राष्ट्रीय संदर्भ
देश में समय-समय पर नए राज्यों के गठन का इतिहास रहा है। वर्ष 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ बने, जबकि 2014 में तेलंगाना का गठन हुआ। ऐसे में गोरखालैंड की मांग को भी समर्थक संवैधानिक दायरे में वैध राजनीतिक मांग बताते रहे हैं। हालांकि पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के विभाजन के किसी भी प्रस्ताव का लगातार विरोध किया है।

राजनीतिक समीकरण
दार्जिलिंग लोकसभा सीट पर लंबे समय से भाजपा का वर्चस्व रहा है। पहाड़ी क्षेत्र में भाजपा को लगातार समर्थन मिलता रहा है, लेकिन अलग राज्य की मांग पूरी न होने को लेकर स्थानीय असंतोष भी समय-समय पर सामने आता रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य विभाजन का मुद्दा भाजपा के लिए भी संतुलन साधने वाली चुनौती है, क्योंकि एक ओर पहाड़ की आकांक्षाएं हैं तो दूसरी ओर पूरे राज्य की राजनीतिक संवेदनशीलता।

केंद्र की पहल
पहाड़ की स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने पहले भी वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और मध्यस्थ नियुक्त करने की पहल की है, ताकि संवाद के जरिए समाधान का रास्ता निकाला जा सके। इसी क्रम में गोरखा नेताओं के साथ भाजपा नेतृत्व की ताजा बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गोरखालैंड का प्रश्न केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संघीय ढांचे, पहचान की राजनीति और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण से जुड़ा व्यापक मुद्दा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि संवाद और राजनीतिक सहमति के जरिए इस लंबे समय से लंबित मांग का कोई ठोस समाधान निकल पाता है या नहीं।

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