{"_id":"6a3a5e38f91a11e16705d20f","slug":"why-bjps-short-term-kerala-formula-matters-after-george-kurian-resigns-analysis-2026-06-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"राजगोपाल से कुरियन तक: दिल्ली में एंट्री के बाद चुपचाप एग्जिट, क्या है भाजपा का केरल फॉर्मूला? इनसाइड स्टोरी","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
राजगोपाल से कुरियन तक: दिल्ली में एंट्री के बाद चुपचाप एग्जिट, क्या है भाजपा का केरल फॉर्मूला? इनसाइड स्टोरी
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 23 Jun 2026 04:05 PM IST
विज्ञापन
सार
भाजपा केरल में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए नेताओं को राज्यसभा के जरिए केंद्र में मंत्री तो बनाती है, लेकिन उन्हें रिपीट नहीं करती। जॉर्ज कुरियन का जाना इसी 'शॉर्ट-टर्म' फॉर्मूले का हिस्सा है। अब लोकसभा सांसद सुरेश गोपी के आने के बाद पार्टी की केरल रणनीति में एक बड़ा बदलाव साफ दिख रहा है। क्या है भाजपा का यह शॉर्ट-टर्म फॉर्मूला? जानिए....
जॉर्ज कुरियन और राजगोपाल
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
विस्तार
केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे के बाद सियासी गलियारे गरमा गए हैं। भाजपा ने उनका राज्यसभा कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया था। इसके बाद उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे मंजूर भी कर लिया है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मोदी मंत्रिमंडल में केरल को कोई नया चेहरा मिलेगा या नहीं।
वैसे तो जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री की विदाई नहीं है। यह केरल में भाजपा की एक खास राजनीतिक क्रोनोलॉजी को समझने का मौका है। इसे आप भाजपा का 'केरल फॉर्मूला' कह सकते हैं। इस फॉर्मूले के तहत नेताओं को दिल्ली का रास्ता तो मिलता है, लेकिन उनका सफर बहुत छोटा होता है। आइए, भाजपा के इस फैसले को विस्तार से समझते हैं।
क्या है भाजपा का यह 'केरल फॉर्मूला'?
केरल में भाजपा के लिए चुनावी राह हमेशा से बेहद मुश्किल रही है। वहां पारंपरिक रूप से एलडीएफ और यूडीएफ का दबदबा रहा है। ऐसे में राज्य में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए भाजपा एक तय रणनीति अपनाती रही है। पहले केरल के किसी कद्दावर नेता को चुना जाता है। फिर उसे दूसरे राज्य (जैसे मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र) से राज्यसभा भेजा जाता है। इसके बाद उन्हें केंद्र में मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।
विज्ञापन
रणनीति तो अच्छी है, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस फॉर्मूले के तहत किसी भी नेता को 'दूसरा चांस' यानी सेकंड टर्म नहीं मिला।
चार बड़े नाम, एक जैसी कहानी
जॉर्ज कुरियन इस लिस्ट में शामिल होने वाले चौथे नेता हैं। उनसे पहले भी तीन बड़े चेहरे इसी चक्रव्यूह से गुजर चुके हैं:-
ओ. राजगोपाल: केरल भाजपा के सबसे वरिष्ठ चेहरों में से एक। राज्यसभा के रास्ते केंद्र में मंत्री बने। लेकिन कार्यकाल आगे नहीं बढ़ा।
के. जे. अल्फोंस: पूर्व नौकरशाह। उन्हें भी राज्यसभा से लाकर मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री (पर्यटन राज्य मंत्री) बनाया गया था। कार्यकाल खत्म, तो पारी भी खत्म हो गई।
वी. मुरलीधरन: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में विदेश राज्य मंत्री जैसी अहम जिम्मेदारी संभाली। महाराष्ट्र से राज्यसभा गए थे, लेकिन दोबारा मौका नहीं मिला।
जॉर्ज कुरियन: जून 2024 में बिना किसी सदन के सदस्य रहे मंत्री बने। अगस्त 2024 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया। जून 2026 में कार्यकाल खत्म होते ही कहानी खत्म।
आखिर ऐसा क्यों करती है पार्टी?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं।
नए चेहरों को मौका: भाजपा केरल में किसी एक नेता पर निर्भर नहीं रहना चाहती। वह हर बार एक नए समुदाय या क्षेत्र के नेता को आगे बढ़ाकर सामाजिक समीकरण सोशल इंजीनियरिंग साधने की कोशिश करती है। जैसे कुरियन को लाकर ईसाई समुदाय को साधने की कोशिश की गई थी।
चुनावी कसौटी: जो नेता जमीन पर चुनाव नहीं जीत पाते, उन्हें संगठन में वापस भेज दिया जाता है। कुरियन ने भी कांजीरपल्ली से विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। पार्टी अब उन्हें वापस संगठन की जमीनी ढाल बनाने के मूड में है।
सुरेश गोपी की एंट्री ने बदला खेल
पहले भाजपा के पास केरल से लोकसभा का कोई विकल्प नहीं था। इसलिए राज्यसभा एकमात्र रास्ता था। लेकिन 2024 के आम चुनाव में अभिनेता सुरेश गोपी ने त्रिशूर सीट जीतकर इतिहास रच दिया। सुरेश गोपी सीधे जनता द्वारा चुनकर लोकसभा पहुंचे हैं। ऐसे में अब भाजपा के पास केरल का एक मजबूत और परमानेंट चेहरा है। यही वजह है कि अब पार्टी को राज्यसभा के सहारे 'बैकडोर एंट्री' वाले मंत्रियों पर निर्भर रहने की मजबूरी कम हो गई है।
सदानंदन मास्टर पर टिकी नजरें
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा अपने इस पुराने फॉर्मूले को पूरी तरह बंद कर देगी? केरल से भाजपा के नए राज्यसभा उम्मीदवार सी. सदानंदन मास्टर हैं। अब देखना होगा कि क्या उन्हें भी कुरियन की तरह कैबिनेट में जगह मिलती है, या फिर केरल का दारोमदार सिर्फ अकेले सुरेश गोपी के कंधों पर ही रहेगा।
यह भी पढ़ें: George Kurian: जॉर्ज कुरियन के मंत्री पद से इस्तीफे की क्या है वजह? मोदी कैबिनेट में फेरबदल की अटकलें तेज
जॉर्ज कुरियन ने अचानक इस्तीफा क्यों दिया?
खैर, ये तो हो गई भाजपा के फॉर्मूले की बात। लेकिन जॉर्ज कुरियन ने अचानकर इस्तीफा क्यों दिया? इसके पीछे कुछ वजहें बताई जा रही हैं। दरअसल, जॉर्ज कुरियन का राज्यसभा सांसद के रूप में कार्यकाल 21 जून 2026 को समाप्त हो गया था। नियम के मुताबिक, मंत्री पद पर बने रहने के लिए संसद सदस्य होना जरूरी है। भाजपा ने उन्हें दोबारा राज्यसभा का टिकट नहीं दिया, जिसके कारण सांविधानिक मजबूरी की वजह से उन्हें केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 23 जून 2026 को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस इस्तीफे के पीछे कुछ राजनीतिक वजहें भी हैं। केरल विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, जिसका खामियाजा जॉर्ज कुरियन को भुगतना पड़ा है। वहीं कुछ खबरों में यह भी दावा किया जा रहा है कि दोबारा राज्यसभा न भेजे जाने से कुरियन नाराज थे और इसी वजह से उन्होंने पद छोड़ दिया। हालांकि, एक चर्चा यह भी है कि पार्टी आने वाले दिनों में उन्हें किसी राज्य का राज्यपाल बना सकती है या संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है।
65 वर्षीय जॉर्ज कुरियन पेशे से सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं और साल 1980 से भाजपा से जुड़े हैं। वे मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के साथ-साथ मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में सेवाएं दे रहे थे। केरल की करीब 19 प्रतिशत ईसाई आबादी को साधने के लिए वे भाजपा का एक बड़ा चेहरा थे। उनके और पंजाब के रवनीत सिंह बिट्टू के राज्यसभा न जाने के बाद अब मोदी कैबिनेट में फेरबदल और कई राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्ति की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
वैसे तो जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री की विदाई नहीं है। यह केरल में भाजपा की एक खास राजनीतिक क्रोनोलॉजी को समझने का मौका है। इसे आप भाजपा का 'केरल फॉर्मूला' कह सकते हैं। इस फॉर्मूले के तहत नेताओं को दिल्ली का रास्ता तो मिलता है, लेकिन उनका सफर बहुत छोटा होता है। आइए, भाजपा के इस फैसले को विस्तार से समझते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
क्या है भाजपा का यह 'केरल फॉर्मूला'?
केरल में भाजपा के लिए चुनावी राह हमेशा से बेहद मुश्किल रही है। वहां पारंपरिक रूप से एलडीएफ और यूडीएफ का दबदबा रहा है। ऐसे में राज्य में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए भाजपा एक तय रणनीति अपनाती रही है। पहले केरल के किसी कद्दावर नेता को चुना जाता है। फिर उसे दूसरे राज्य (जैसे मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र) से राज्यसभा भेजा जाता है। इसके बाद उन्हें केंद्र में मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।
रणनीति तो अच्छी है, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस फॉर्मूले के तहत किसी भी नेता को 'दूसरा चांस' यानी सेकंड टर्म नहीं मिला।
चार बड़े नाम, एक जैसी कहानी
जॉर्ज कुरियन इस लिस्ट में शामिल होने वाले चौथे नेता हैं। उनसे पहले भी तीन बड़े चेहरे इसी चक्रव्यूह से गुजर चुके हैं:-
ओ. राजगोपाल: केरल भाजपा के सबसे वरिष्ठ चेहरों में से एक। राज्यसभा के रास्ते केंद्र में मंत्री बने। लेकिन कार्यकाल आगे नहीं बढ़ा।
के. जे. अल्फोंस: पूर्व नौकरशाह। उन्हें भी राज्यसभा से लाकर मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री (पर्यटन राज्य मंत्री) बनाया गया था। कार्यकाल खत्म, तो पारी भी खत्म हो गई।
वी. मुरलीधरन: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में विदेश राज्य मंत्री जैसी अहम जिम्मेदारी संभाली। महाराष्ट्र से राज्यसभा गए थे, लेकिन दोबारा मौका नहीं मिला।
जॉर्ज कुरियन: जून 2024 में बिना किसी सदन के सदस्य रहे मंत्री बने। अगस्त 2024 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया। जून 2026 में कार्यकाल खत्म होते ही कहानी खत्म।
आखिर ऐसा क्यों करती है पार्टी?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं।
नए चेहरों को मौका: भाजपा केरल में किसी एक नेता पर निर्भर नहीं रहना चाहती। वह हर बार एक नए समुदाय या क्षेत्र के नेता को आगे बढ़ाकर सामाजिक समीकरण सोशल इंजीनियरिंग साधने की कोशिश करती है। जैसे कुरियन को लाकर ईसाई समुदाय को साधने की कोशिश की गई थी।
चुनावी कसौटी: जो नेता जमीन पर चुनाव नहीं जीत पाते, उन्हें संगठन में वापस भेज दिया जाता है। कुरियन ने भी कांजीरपल्ली से विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। पार्टी अब उन्हें वापस संगठन की जमीनी ढाल बनाने के मूड में है।
सुरेश गोपी की एंट्री ने बदला खेल
पहले भाजपा के पास केरल से लोकसभा का कोई विकल्प नहीं था। इसलिए राज्यसभा एकमात्र रास्ता था। लेकिन 2024 के आम चुनाव में अभिनेता सुरेश गोपी ने त्रिशूर सीट जीतकर इतिहास रच दिया। सुरेश गोपी सीधे जनता द्वारा चुनकर लोकसभा पहुंचे हैं। ऐसे में अब भाजपा के पास केरल का एक मजबूत और परमानेंट चेहरा है। यही वजह है कि अब पार्टी को राज्यसभा के सहारे 'बैकडोर एंट्री' वाले मंत्रियों पर निर्भर रहने की मजबूरी कम हो गई है।
सदानंदन मास्टर पर टिकी नजरें
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा अपने इस पुराने फॉर्मूले को पूरी तरह बंद कर देगी? केरल से भाजपा के नए राज्यसभा उम्मीदवार सी. सदानंदन मास्टर हैं। अब देखना होगा कि क्या उन्हें भी कुरियन की तरह कैबिनेट में जगह मिलती है, या फिर केरल का दारोमदार सिर्फ अकेले सुरेश गोपी के कंधों पर ही रहेगा।
यह भी पढ़ें: George Kurian: जॉर्ज कुरियन के मंत्री पद से इस्तीफे की क्या है वजह? मोदी कैबिनेट में फेरबदल की अटकलें तेज
जॉर्ज कुरियन ने अचानक इस्तीफा क्यों दिया?
खैर, ये तो हो गई भाजपा के फॉर्मूले की बात। लेकिन जॉर्ज कुरियन ने अचानकर इस्तीफा क्यों दिया? इसके पीछे कुछ वजहें बताई जा रही हैं। दरअसल, जॉर्ज कुरियन का राज्यसभा सांसद के रूप में कार्यकाल 21 जून 2026 को समाप्त हो गया था। नियम के मुताबिक, मंत्री पद पर बने रहने के लिए संसद सदस्य होना जरूरी है। भाजपा ने उन्हें दोबारा राज्यसभा का टिकट नहीं दिया, जिसके कारण सांविधानिक मजबूरी की वजह से उन्हें केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 23 जून 2026 को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस इस्तीफे के पीछे कुछ राजनीतिक वजहें भी हैं। केरल विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, जिसका खामियाजा जॉर्ज कुरियन को भुगतना पड़ा है। वहीं कुछ खबरों में यह भी दावा किया जा रहा है कि दोबारा राज्यसभा न भेजे जाने से कुरियन नाराज थे और इसी वजह से उन्होंने पद छोड़ दिया। हालांकि, एक चर्चा यह भी है कि पार्टी आने वाले दिनों में उन्हें किसी राज्य का राज्यपाल बना सकती है या संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है।
65 वर्षीय जॉर्ज कुरियन पेशे से सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं और साल 1980 से भाजपा से जुड़े हैं। वे मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के साथ-साथ मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में सेवाएं दे रहे थे। केरल की करीब 19 प्रतिशत ईसाई आबादी को साधने के लिए वे भाजपा का एक बड़ा चेहरा थे। उनके और पंजाब के रवनीत सिंह बिट्टू के राज्यसभा न जाने के बाद अब मोदी कैबिनेट में फेरबदल और कई राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्ति की चर्चाएं तेज हो गई हैं।