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ब्रह्मा ने डाली गुरु-शिष्य परंपरा की नींव : स्वामी रामस्वरूप
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Thu, 30 Apr 2026 01:40 AM IST
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योगाचार्य स्वामी राम स्वरूप जी
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वेद मंदिर में चारों वेदों पर आधारित चल रहे 78 दिवसीय यज्ञ जारी
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। वेद मंदिर में चारों वेदों पर आधारित चल रहे 78 दिवसीय यज्ञ जारी है। बुधवार को स्वामी राम स्वरूप जी ने वेदों पर आधारित प्रवचन दिए। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता, वेदों की उत्पत्ति और वैदिक ज्ञान के प्रसार पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सृष्टि के आरंभ में ईश्वर ने चार प्राचीन ऋषियों के हृदय में चारों वेदों का ज्ञान प्रकट किया और यही ज्ञान आगे चलकर गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से संपूर्ण मानवता तक पहुंचा।
स्वामी जी ने ऋग्वेद मंत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर की शक्ति से अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नामक चार ऋषियों के हृदय में वेदों का दिव्य ज्ञान उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा ने इन चारों ऋषियों की सेवा कर उनसे चारों वेदों का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। इस प्रकार ये चारों ऋषि ब्रह्मा के गुरु कहलाए।
उन्होंने कहा कि ब्रह्मा से ही संसार में गुरु-शिष्य परंपरा की नींव पड़ी, जो आज भी ज्ञान प्राप्ति का सबसे प्रामाणिक माध्यम बनी हुई है। उन्होंने बताया कि ज्ञान स्वयं प्राप्त नहीं होता, बल्कि किसी ज्ञानी गुरु द्वारा ही प्रदान किया जाता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान दिया, उसी प्रकार ईश्वर से ऋषियों तक, ऋषियों से ब्रह्मा तक और ब्रह्मा से संसार तक ज्ञान का यह क्रम निरंतर चलता आया है। यही वैदिक शिक्षा पद्धति मानव जीवन को सत्य, धर्म और आत्मज्ञान की दिशा प्रदान करती है।
स्वामी राम स्वरूप महाराज ने कहा कि विभिन्न साधक एक ही परमेश्वर की उपासना अलग-अलग विधियों से करते हैं, लेकिन इन सभी का आधार वेद ही हैं। सामवेद के ज्ञाता संगीत और स्वरों के माध्यम से ईश्वर का गुणगान करते हैं जबकि अन्य साधक वैदिक मंत्रों के उच्चारण से आराधना करते हैं। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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कठुआ। वेद मंदिर में चारों वेदों पर आधारित चल रहे 78 दिवसीय यज्ञ जारी है। बुधवार को स्वामी राम स्वरूप जी ने वेदों पर आधारित प्रवचन दिए। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता, वेदों की उत्पत्ति और वैदिक ज्ञान के प्रसार पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सृष्टि के आरंभ में ईश्वर ने चार प्राचीन ऋषियों के हृदय में चारों वेदों का ज्ञान प्रकट किया और यही ज्ञान आगे चलकर गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से संपूर्ण मानवता तक पहुंचा।
स्वामी जी ने ऋग्वेद मंत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर की शक्ति से अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नामक चार ऋषियों के हृदय में वेदों का दिव्य ज्ञान उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा ने इन चारों ऋषियों की सेवा कर उनसे चारों वेदों का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। इस प्रकार ये चारों ऋषि ब्रह्मा के गुरु कहलाए।
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उन्होंने कहा कि ब्रह्मा से ही संसार में गुरु-शिष्य परंपरा की नींव पड़ी, जो आज भी ज्ञान प्राप्ति का सबसे प्रामाणिक माध्यम बनी हुई है। उन्होंने बताया कि ज्ञान स्वयं प्राप्त नहीं होता, बल्कि किसी ज्ञानी गुरु द्वारा ही प्रदान किया जाता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान दिया, उसी प्रकार ईश्वर से ऋषियों तक, ऋषियों से ब्रह्मा तक और ब्रह्मा से संसार तक ज्ञान का यह क्रम निरंतर चलता आया है। यही वैदिक शिक्षा पद्धति मानव जीवन को सत्य, धर्म और आत्मज्ञान की दिशा प्रदान करती है।
स्वामी राम स्वरूप महाराज ने कहा कि विभिन्न साधक एक ही परमेश्वर की उपासना अलग-अलग विधियों से करते हैं, लेकिन इन सभी का आधार वेद ही हैं। सामवेद के ज्ञाता संगीत और स्वरों के माध्यम से ईश्वर का गुणगान करते हैं जबकि अन्य साधक वैदिक मंत्रों के उच्चारण से आराधना करते हैं। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
