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Srinagar News: पांपोर में केसर की जमीन पर अब लहलहाती नजर आ रही सरसों
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श्रीनगर। भले ही सरकार जम्मू-कश्मीर में केसर के उत्पादन में बढ़ोतरी और खेती के रकबे में विस्तार का दावा करती रही हो लेकिन पांपोर के पारंपरिक केसर बेल्ट की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है।
मिली जानकारी के अनुसार लेथपोरा, चंदहारा और आस-पास के इलाकों में केसर के खेतों का एक बड़ा हिस्सा अब साफ तौर पर सरसों और दूसरी फसलों से ढका हुआ नजर आता है जिससे कश्मीर के इस कीमती उत्पाद के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
पाम्पोर के केसर-समृद्ध इलाके को कश्मीर का ‘सैफरन टाउन’ कहा जाता है। यहां का दौरा करने पर पता चलता है कि सरसों की खेती ने उस जमीन के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है जो कभी पूरी तरह से केसर की खेती के लिए आरक्षित थी। कई इलाकों में किसानों ने या तो दूसरी फसलों की ओर रुख कर लिया है या अपने खेतों को पूरी तरह से छोड़ दिया है। स्थानीय किसान इस बदलाव की वजह केसर की घटती पैदावार, अच्छी क्वालिटी के रोपण सामग्री (कंद) की कमी को बता रहे हैं। इसके लिए वे सरकार का अपर्याप्त सहयोग बता रहे हैं। चंदहारा के रहने वाले फारूक अहमद ने कहा कि इस इलाके से केसर की खेती धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। किसानों की दिलचस्पी खत्म होती जा रही है क्योंकि अब इससे होने वाली कमाई गुजारा करने लायक नहीं रही। पिछले कुछ सालों में उत्पादन में भारी गिरावट आई है और इसे फिर से पटरी पर लाने के लिए शायद ही कोई मदद मिल रही हो। आज केसर वाली ज्यादातर जमीन पर सरसों की खेती हो रही है।
इसी तरह की चिंता जताते हुए अब्बास ने कहा कि केसर के खेतों में आया यह बदलाव पूरे इलाके में साफ तौर पर देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि आप खुद देख सकते हैं कि केसर वाली ज़्यादातर जमीन पर सरसों बोई गई है। कुछ किसानों ने तो अपनी जमीन को बंजर ही छोड़ दिया है क्योंकि केसर के कंद खराब हो गए हैं और अब उनसे कोई पैदावार नहीं होती। उन्होंने इस स्थिति को चिंताजनक बताया और कहा कि कश्मीर में केसर की खेती खत्म होने की कगार पर है। सबसे बड़ी समस्या अच्छी क्वालिटी के कंध की कमी है। पिछले कुछ सालों में मौसम के अचानक बदलने जैसे कई कारणों से कंध खराब हो गए हैं। नतीजतन हर गुजरते मौसम के साथ उत्पादन में गिरावट आ रही है।
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मिली जानकारी के अनुसार लेथपोरा, चंदहारा और आस-पास के इलाकों में केसर के खेतों का एक बड़ा हिस्सा अब साफ तौर पर सरसों और दूसरी फसलों से ढका हुआ नजर आता है जिससे कश्मीर के इस कीमती उत्पाद के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
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पाम्पोर के केसर-समृद्ध इलाके को कश्मीर का ‘सैफरन टाउन’ कहा जाता है। यहां का दौरा करने पर पता चलता है कि सरसों की खेती ने उस जमीन के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है जो कभी पूरी तरह से केसर की खेती के लिए आरक्षित थी। कई इलाकों में किसानों ने या तो दूसरी फसलों की ओर रुख कर लिया है या अपने खेतों को पूरी तरह से छोड़ दिया है। स्थानीय किसान इस बदलाव की वजह केसर की घटती पैदावार, अच्छी क्वालिटी के रोपण सामग्री (कंद) की कमी को बता रहे हैं। इसके लिए वे सरकार का अपर्याप्त सहयोग बता रहे हैं। चंदहारा के रहने वाले फारूक अहमद ने कहा कि इस इलाके से केसर की खेती धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। किसानों की दिलचस्पी खत्म होती जा रही है क्योंकि अब इससे होने वाली कमाई गुजारा करने लायक नहीं रही। पिछले कुछ सालों में उत्पादन में भारी गिरावट आई है और इसे फिर से पटरी पर लाने के लिए शायद ही कोई मदद मिल रही हो। आज केसर वाली ज्यादातर जमीन पर सरसों की खेती हो रही है।
इसी तरह की चिंता जताते हुए अब्बास ने कहा कि केसर के खेतों में आया यह बदलाव पूरे इलाके में साफ तौर पर देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि आप खुद देख सकते हैं कि केसर वाली ज़्यादातर जमीन पर सरसों बोई गई है। कुछ किसानों ने तो अपनी जमीन को बंजर ही छोड़ दिया है क्योंकि केसर के कंद खराब हो गए हैं और अब उनसे कोई पैदावार नहीं होती। उन्होंने इस स्थिति को चिंताजनक बताया और कहा कि कश्मीर में केसर की खेती खत्म होने की कगार पर है। सबसे बड़ी समस्या अच्छी क्वालिटी के कंध की कमी है। पिछले कुछ सालों में मौसम के अचानक बदलने जैसे कई कारणों से कंध खराब हो गए हैं। नतीजतन हर गुजरते मौसम के साथ उत्पादन में गिरावट आ रही है।