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Srinagar News: हाईकोर्ट ने सोनवार जमीन विवाद पर बेदखली का आदेश रद्द किया
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-कहा, जीएलआर को जमीन पर या उसके अधिकारों के संबंध में तैयार या रखा गया नहीं माना जा सकता
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने बुधवार को सोनवार के निवासियों के खिलाफ कैंटोनमेंट अधिकारियों द्वारा जारी बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवादित सवालों का फैसला पब्लिक प्रेमिसेस एक्ट के तहत संक्षिप्त कार्यवाही के जरिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस एमए चौधरी की बेंच ने चार लोगों की ओर से दायर एक याचिका को स्वीकार करते हुए कैंटोनमेंट बोर्ड, बादामी बाग के एस्टेट्स ऑफिसर की ओर से 8 अगस्त 2022 को पारित आदेश को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने पब्लिक प्रेमिसेस (अनाधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) एक्ट, 1971 के तहत शुरू की गई बेदखली की कार्यवाही को चुनौती दी थी। उन्होंने सोनवार, श्रीनगर के बोनामसर में स्थित जमीन पर अपने मालिकाना हक और लंबे समय से कब्जे का दावा किया था। उन्होंने जमीन पर अपने मालिकाना हक को साबित करने के लिए राजस्व रिकॉर्ड, म्यूटेशन (नामांतरण) और सिविल कोर्ट के फैसले (डिक्री) का सहारा लिया।
दूसरी ओर, भारत सरकार और कैंटोनमेंट अधिकारियों ने तर्क दिया कि यह जमीन रक्षा विभाग की संपत्ति का हिस्सा है जिसे जनरल लैंड रजिस्टर (जीएलआर) में बी-4 श्रेणी की जमीन के रूप में दर्ज किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता इस जमीन पर अनाधिकृत कब्जेदार हैं। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जहां जमीन के मालिकाना हक को लेकर गंभीर विवाद हो, वहां बेदखली की संक्षिप्त कार्यवाही का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि एक पंजीकृत बिक्रीनामा को तब तक वैध माना जाता है जब तक कि उसे ठोस सबूतों के आधार पर गलत साबित न कर दिया जाए। इसके विपरीत जीएलआर में दर्ज प्रविष्टियां उचित प्रक्रिया के तहत तैयार किए गए राजस्व रिकॉर्ड को रद्द या अमान्य नहीं कर सकतीं। अदालत ने अधिकारियों को यह छूट दी कि यदि जरूरी हो, तो वे नई कार्यवाही शुरू करने से पहले स्वामित्व साबित करने के लिए किसी सक्षम सिविल कोर्ट में जा सकते हैं।
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने बुधवार को सोनवार के निवासियों के खिलाफ कैंटोनमेंट अधिकारियों द्वारा जारी बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवादित सवालों का फैसला पब्लिक प्रेमिसेस एक्ट के तहत संक्षिप्त कार्यवाही के जरिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस एमए चौधरी की बेंच ने चार लोगों की ओर से दायर एक याचिका को स्वीकार करते हुए कैंटोनमेंट बोर्ड, बादामी बाग के एस्टेट्स ऑफिसर की ओर से 8 अगस्त 2022 को पारित आदेश को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने पब्लिक प्रेमिसेस (अनाधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) एक्ट, 1971 के तहत शुरू की गई बेदखली की कार्यवाही को चुनौती दी थी। उन्होंने सोनवार, श्रीनगर के बोनामसर में स्थित जमीन पर अपने मालिकाना हक और लंबे समय से कब्जे का दावा किया था। उन्होंने जमीन पर अपने मालिकाना हक को साबित करने के लिए राजस्व रिकॉर्ड, म्यूटेशन (नामांतरण) और सिविल कोर्ट के फैसले (डिक्री) का सहारा लिया।
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दूसरी ओर, भारत सरकार और कैंटोनमेंट अधिकारियों ने तर्क दिया कि यह जमीन रक्षा विभाग की संपत्ति का हिस्सा है जिसे जनरल लैंड रजिस्टर (जीएलआर) में बी-4 श्रेणी की जमीन के रूप में दर्ज किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता इस जमीन पर अनाधिकृत कब्जेदार हैं। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जहां जमीन के मालिकाना हक को लेकर गंभीर विवाद हो, वहां बेदखली की संक्षिप्त कार्यवाही का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि एक पंजीकृत बिक्रीनामा को तब तक वैध माना जाता है जब तक कि उसे ठोस सबूतों के आधार पर गलत साबित न कर दिया जाए। इसके विपरीत जीएलआर में दर्ज प्रविष्टियां उचित प्रक्रिया के तहत तैयार किए गए राजस्व रिकॉर्ड को रद्द या अमान्य नहीं कर सकतीं। अदालत ने अधिकारियों को यह छूट दी कि यदि जरूरी हो, तो वे नई कार्यवाही शुरू करने से पहले स्वामित्व साबित करने के लिए किसी सक्षम सिविल कोर्ट में जा सकते हैं।

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