फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Srinagar News ›   Targeted killings that began with Kashmiri Pandits have now extended to migrant workers.

कश्मीरी पंडितों से प्रवासी मजदूरों तक: 36 साल बाद भी जारी है टारगेट किलिंग का खौफ, आतंक की बदलती रणनीति

Sat, 01 Aug 2026 11:18 AM IST
Nikita Gupta अमर उजाला, नेटवर्क कुलगाम
अमर उजाला, नेटवर्क कुलगाम Published by: Nikita Gupta Updated Sat, 01 Aug 2026 11:18 AM IST
सार

कश्मीर में 1990 से चली आ रही टारगेट किलिंग की रणनीति ने अब प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। कुलगाम हमला आतंकियों की उस कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए वे डर फैलाकर घाटी में लौटती शांति, विकास और भरोसे को चुनौती देना चाहते हैं।

विज्ञापन
Targeted killings that began with Kashmiri Pandits have now extended to migrant workers.
कश्मीर टारगेट किलिंग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बात 90 के दशक की है। घाटी में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर शुरू हुई टारगेट किलिंग ऐसा नासूर बना जो आज बाहरी राज्यों से रोजी-रोटी की तलाश में आने वाले मजदूरों की जिंदगी तबाह कर रहा है। टारगेट किलिंग की घटनाएं 1990 के दशक में आतंकवाद के उभार के साथ शुरू हुईं, जब आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों, सरकारी कर्मचारियों, बुद्धिजीवियों और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया। वर्ष 2000 के बाद सुरक्षा अभियानों से टारगेट किलिंग में कमी आई, लेकिन समय-समय पर राजनीतिक नेताओं, पंचायत प्रतिनिधियों और सुरक्षा बलों से जुड़े लोगों पर हमले जारी रहे।

विज्ञापन



वर्ष 2021 से टारगेट किलिंग के मामले बढ़े। इन घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था और आम लोगों में चिंता बढ़ा दी। इसके जवाब में सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकवाद विरोधी अभियान तेज किए, संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बढ़ाई और कई आतंकी मॉड्यूल ध्वस्त किए। बावजूद छिटपुट टारगेट किलिंग की घटनाएं पूरी तरह नहीं थमी हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण 31 जुलाई को कुलगाम में छत्तीसगढ़ के दो मजदूरों पर किया गया जानलेवा हमला है, जिसमें दीपक की मौत हो गई और भूपेंद्र जीएमसी अनंतनाग में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है।

विज्ञापन

1989 से 2000 के बीच कश्मीर घाटी की प्रमुख घटनाएं ...

  • 14 सितंबर 1989 : भाजपा नेता और अधिवक्ता टीका लाल टपलू की श्रीनगर में हत्या।
  • 4 नवंबर 1989 : सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या।
  • 13 फरवरी 1990 : दूरदर्शन श्रीनगर के निदेशक लासा कौल की हत्या।
  • 1990 के दौरान शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों और कश्मीरी पंडित परिवारों को निशाना बनाया गया, जिसके बाद घाटी से कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ।
  • 1990 के दशक से 2000 के बीच आतंकियों ने अंतराल पर अल्पसंख्यक समुदायों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों से जुड़े लोगों पर हमला जारी रखा। कई सामूहिक हत्याएं भी हुईं।

2021 से टारगेट किलिंग का नया दौर

  • 2021 में आतंकियों ने फिर से गैर स्थानीय मजदूरों, शिक्षकों, कश्मीरी पंडितों और व अन्य समुदाय के लोगों को निशाना बनाया।
  • अक्तूबर 2021 : श्रीनगर में स्कूल की प्रधानाचार्य सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की हत्या।
  • अक्तूबर 2021 : प्रसिद्ध कश्मीरी फार्मासिस्ट माखन लाल बिंदरू की हत्या।
  • मई 2022 : बडगाम में राजस्व विभाग के कर्मचारी राहुल भट की हत्या।
  • मई 2022 : कुलगाम में शिक्षिका रजनी बाला की हत्या।
  • जून 2022 : बैंक प्रबंधक विजय कुमार (राजस्थान निवासी) की कुलगाम में हत्या।

2023 से 2026 तक घटनाएं
इस अवधि में भी छिटपुट आतंकी हमले हुए। हालांकि 2021-22 जैसी लगातार टारगेट किलिंग की शृंखला नहीं रही। अप्रैल 2025 में पहलगाम-बायसरन में पर्यटकों पर बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई। लेकिन इसे आतंकी हमला मानते हुए भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया। घुटनों पर ला दिया।

बदलते जम्मू-कश्मीर को फिर डर के साये में दिखाने की कोशिश
कुलगाम में प्रवासी मजदूर की टारगेट किलिंग को रक्षा मामलों के विशेषज्ञ आतंकियों की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसी टारगेट किलिंग का मकसद केवल किसी व्यक्ति की हत्या नहीं होता, बल्कि जम्मू-कश्मीर की बदलती तस्वीर पर सवाल खड़े करना, लोगों में डर पैदा करना और देश-दुनिया तक यह संदेश पहुंचाना भी होता है कि घाटी अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

विज्ञापन

निशाना सिर्फ व्यक्ति नहीं, भरोसा भी
रक्षा विशेषज्ञ सेवानिवृत्त कर्नल सुखबीर सिंह मनकोटिया का कहना है कि टारगेट किलिंग के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य हैं। पहला, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह धारणा बनाना कि कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हुए हैं। दूसरा, घाटी में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों और दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों के मन में डर पैदा करना, ताकि उनके आने और कामकाज पर असर पड़े। उन्होंने कहा कि बागवानी, निर्माण और कई अन्य क्षेत्रों की गतिविधियां बाहरी मजदूरों पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाने से केवल सुरक्षा का संदेश नहीं जाता, बल्कि स्थानीय कारोबार और लोगों के भरोसे पर भी असर पड़ता है।

विकास की रफ्तार भी निशाने पर
पाकिस्तान मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार संत शर्मा का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में पर्यटन, विकास परियोजनाओं और निवेश की रफ्तार बढ़ने से प्रदेश की सकारात्मक छवि मजबूत हुई है। ऐसे में आतंकी संगठन ऐसी घटनाओं के जरिए उस माहौल को प्रभावित करना चाहते हैं।

मौजूदा समय में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के घटनाक्रम, सिंधु जल संधि को लेकर बने हालात और अमरनाथ यात्रा जैसे अहम घटनाक्रमों के बीच ऐसी वारदातों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सुरक्षा एजेंसियों की लगातार कार्रवाई से आतंकी नेटवर्क दबाव में हैं। इसलिए वे कम संसाधनों में ज्यादा मनोवैज्ञानिक असर डालने वाली घटनाओं के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और डर का माहौल बनाने की कोशिश करते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed