घाटी में सूखा...बारिश में 85% कमी: कश्मीर में असामान्य मौसम ने बिगाड़ा स्वास्थ्य, तापमान में दिन-रात भारी अंतर
कश्मीर में जनवरी 2026 में बारिश में 85% कमी दर्ज की गई है, जिससे घाटी में सूखा और पेयजल आपूर्ति पर खतरा बना हुआ है।
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घाटी की सेहत नासाज है। चिल्ले कलां के दरम्यान कड़ाके की सदी वाले मौसम में भी कश्मीर सूखे का सामना कर रहा है। मैदानी इलाके अब भी बारिश और बर्फबारी के लिए तरस रहे हैं। दिन और रात के तापमान में भारी अंतर लोगों को बीमार कर रहा है।
पूरे जम्मू-कश्मीर में जनवरी माह में अब तक 85 फीसदी बारिश कम हुई है। इसका असर गर्मी में पेयजल आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। अधिकतम तापमान सामान्य से 8 डिग्री तक अधिक और न्यूनतम तापमान चार डिग्री तक कम चल रहा है। प्रदेश में इस बार बहुत सूखा मौसम है। मौसम विभाग के अनुसार हाल के साल में बारिश की यह सबसे अधिक कमी है। 1 नवंबर 2025 से 17 जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक केंद्र शासित प्रदेश में बारिश में 85 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। सामान्य 139.0 एमएम की तुलना में सिर्फ 20.6 एमएम बारिश हुई है।
जनवरी माह में लोग बारिश के लिए तरस गए हैं। 1 से 17 जनवरी तक जम्मू और कश्मीर में सामान्य 44.4 एमएम के मुकाबले सिर्फ 1.5 एमएम बारिश हुई, जो 97% की असाधारण कमी है। इस अवधि के दौरान श्रीनगर, बडगाम, शोपियां, डोडा, रामबन, सांबा और उधमपुर में बारिश ही नहीं हुई। अनंतनाग में महज 5%, बारामुला में 7%, कुपवाड़ा में 7% और जम्मू में 6% ही बारिश हुई।
कश्मीर में अधिक बारिश वाले क्षेत्र भी सूखे
घाटी के सभी जिलों में गंभीर कमी दर्ज की गई। श्रीनगर में 81%, बडगाम में 80%, गांदरबल में 77% बारिश कम हुई। उत्तरी कश्मीर में जहां सर्दियों में ज्यादा बारिश होती है वहां भी बहुत कम बारिश हुई। बांदीपोरा में 45%, बारामुला में 72% और कुपवाड़ा में 49% बारिश कम हुई। दक्षिण कश्मीर में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। यहां कुलगाम में 93%, शोपियां में 91%, पुलवामा में 77% और अनंतनाग में 80% बारिश कम हुई। जम्मू क्षेत्र में कठुआ में चौंकाने वाली 99% की कमी है। डोडा में 94%, रामबन में 87%, उधमपुर में 94% और सांबा में 98% की कमी रही। जम्मू में 91% की कमी है। सिर्फ पुंछ में 42% की तुलनात्मक रूप से कम कमी देखी गई।
स्थानीय के साथ वैश्विक कारण कर रहे प्रभावित
मौसम विज्ञानी और मौसम विभाग के निदेशक मुख्तार अहमद के अनुसार इस असामान्य परिवर्तन के पीछे स्थानीय और वैश्विक कारण हैं। ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव किस से छिपा नहीं है। उसके अलावा पश्चिमी विक्षोभ को छोड़ दें तो सामान्य बारिश और बर्फबारी नहीं हुई। कश्मीर में कोहरे की कमी है। इससे भी मौसम ड्राई महसूस हो रहा है। दिन में बढ़े तापमान ने भी परेशानी बढ़ाई है। अनियंत्रित विकास और पेड़ों के नुकसान की भरपाई न होने से भी प्रकृति नाराज है। ऊंचे पहाड़ी क्षेत्राें में वाहनों की गतिविधि सामान्य से अधिक बढ़ना भी पहाड़ों के स्वास्थ्य को खराब कर रहा है।
खेती और जल आपूर्ति के लिए सर्दियों की बर्फबारी बहुत जरूरी
कश्मीर में सर्दियों की बर्फबारी खेती, बागवानी और जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सर्दियों के महीनों में लगातार सूखा रहने से घाटी में सिंचाई, पीने के पानी की सप्लाई और खेती की पैदावार पर दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ एजाज रसूल ने बताया कि कश्मीर में 60 से 70 प्रतिशत बाग बारिश पर निर्भर हैं और सर्दियों की बर्फबारी और उसके बाद वसंत की बारिश जरूरी है। बर्फबारी एक प्राकृतिक जलाशय के रूप में काम करती है। जब यह वसंत और गर्मियों के दौरान धीरे-धीरे पिघलती है तो यह फसलों, बागों और पीने के पानी के लिए लगातार पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करती है। पर्याप्त बर्फ जमा न होने या सर्दियों में भरपूर बारिश न होने की स्थिति में गर्मियों में पानी की कमी हो सकती है। पानी की कमी से धान जैसी ज्यादा पानी वाली फसलों पर भी असर पड़ेगा।