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Udhampur News: लोहडी के लिए शहर में उत्सा, सूखे मेवों की खूब हो रही बिक्री
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लोहड़ी पर सूखे मेवे और मूंगफली के बने हार से सजी दुकान।
- फोटो : udhampur news
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उधमपुर। लोहड़ी 13 जनवरी को मनाई जाएगी। इसके लिए लोगों में उत्साह और तैयारियां तेज हो गई हैं। बाजारों में चहल-पहल है। सूखे मेवे, रेवड़ी, मूंगफली और तिल की खरीदारी जोरों पर है। हर दुकान पर सूखे मेवों, मंगूफली, रेवड़ी, गजक, तिल, काजू, बादाम, किशमिश और अखरोट की जमकर खरीदारी हो रही है।
भाई-बहन, रिश्तेदाराें और दोस्तों के लिए ड्राई फ्रूट्स के पैकेट खरीद रहे हैं। दुकानदारों का कहना है कि लोहड़ी के कारण इस समय उनकी बिक्री सामान्य दिनों की तुलना में काफी अच्छी हो रही है। इससे उनके कारोबार में बढ़ोतरी हो रही है। मूंगफली की कीमत 200 रुपये प्रति किलो, अखरोट 500 रुपये प्रति किलो ,काजू 1000 रुपये किलो, बादाम 900 रुपये किलो, तिल 200 रुपये किलो और रेवड़ी 40 रुपये प्रति पैकेट के हिसाब से बिक रहे हैं। लोहड़ी पर घरों में पारंपरिक तौर पर तर्चोली बनाई जाती है। शाम के समय लोहड़ी को अर्घ्य देकर सभी लोग आपस में बांटते हैं। इस पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी बेहद खास है। यह पर्व नई फसल के स्वागत, सूर्य देव और अग्नि की पूजा से जुड़ा है।
लोहड़ी से जुड़ी पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे हो रही कम
स्थानीय निवासी विक्रम सिंह का कहना है पहले लोगो में त्योहारों को लेकर खूब उत्साह देखा जाता था। कई दिन पहले से लोग तैयारियों में जुट जाते थे लेकिन अब सब बदलता जा रहा है। इससे पर्व का असली महत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। भीम सिंह ने बताया कि पहले लोहड़ी के दिन लोग एक-दूसरे के घर जाते थे, ढोल बजते थे, लोग पारंपरिक नृत्य करते थे और लोहड़ी के इर्द-गिर्द घूमते हुए लोकगीत गाए जाते थे। आग के चारों ओर घूमकर खुशहाली और अच्छी फसल की कामना की जाती थी। यह पर्व आपसी भाईचारे और सामाजिक मेल-जोल का प्रतीक होता था। अब वह नजारा कहीं खोता हुआ दिखाई दे रहा है।
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स्थानीय निवासी विक्रम सिंह का कहना है पहले लोगो में त्योहारों को लेकर खूब उत्साह देखा जाता था। कई दिन पहले से लोग तैयारियों में जुट जाते थे लेकिन अब सब बदलता जा रहा है। इससे पर्व का असली महत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। भीम सिंह ने बताया कि पहले लोहड़ी के दिन लोग एक-दूसरे के घर जाते थे, ढोल बजते थे, लोग पारंपरिक नृत्य करते थे और लोहड़ी के इर्द-गिर्द घूमते हुए लोकगीत गाए जाते थे। आग के चारों ओर घूमकर खुशहाली और अच्छी फसल की कामना की जाती थी। यह पर्व आपसी भाईचारे और सामाजिक मेल-जोल का प्रतीक होता था। अब वह नजारा कहीं खोता हुआ दिखाई दे रहा है।