घर लौटने की अधूरी उम्मीद: हमनिवालों ने कहा था एक माह के लिए चले जाओ, इंतजार करते हुए 36 साल बीत गए
हां! 03 मई 1990 का ही तो दिन था जब जेहादियों ने गांव पर हमला बोल दिया था। हमनिवाला पड़ोसियों से मदद मांगी तो उन्होंने मशविरा दिया कि जनाब बस एक-डेढ़ माह के लिए यहां से चले जाइए। माहौल शांत होते ही बुला लेंगे।
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हमनिवाला पड़ोसियों से मदद मांगी तो उन्होंने मशविरा दिया कि जनाब बस एक-डेढ़ माह के लिए यहां से चले जाइए। बेफिक्र होकर जाइए आपका मकान दुकान और खेत की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है। एक तिनका भी इधर-उधर नहीं होगा। आज अपने कश्मीर से विस्थापित हुए 36 साल हो गए लेकिन एक महीने का इंतजार है कि पूरा ही नहीं हो रहा है। फिर भी हमारी उम्मीदें कायम हैं। हम अपने घर पहुंचेंगे। पूर्वजों की तरह अपनी मिट्टी में ही खाक होंगे।
इतना कहते हुए मूलत: कुपवाड़ा के रमेश कुमार धर (56) की आंखें छलक उठीं। होठ थरथराने लगे। अतीत को याद कर कांपती हथेलियों से आंसू पोछते हुए रमेश बताते हैं कि विस्थापन के समय वह मैट्रिक के छात्र थे। कुपवाड़ा में तीन मंजिला मकान व 30 कनाल जमीन थी। जान बचाने के लिए माता-पिता के साथ जम्मू में जगती आ गए। 1991 में पता चला कि उन्हीं हमनिवाला पड़ोसियों ने पहले पुराने घर को लूटा और जला दिया फिर 1992 में नए तीन मंजिला मकान को भी लूटने के बाद आग के हवाले कर दिया।
रमेश बताते हैं कि प्रवासी शिविर में एक-एक दाने के लिए मोहताज होने पर हमें बर्बाद करने वाले उन्हीं गांव वालों को मजबूरन अपनी जमीन औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ी। बड़ी हिम्मत करके 2010 में गांव गए। मौके पर मकान का नामोनिशान तक नहीं बचा था। मैदान बन चुका था।
वापस लौटने की आस में माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। मैंने दोनों बच्चों की शादी कर दी। दादा-दादी से सुनी कहानी और मेरी जुबानी सुनहरे अतीत को सुन वह कश्मीर जाना चाहते हैं लेकिन मैं नहीं भेजना चाहता। क्योंकि कोई लाख कहें लेकिन हकीकत यही है घाटी में आज भी कश्मीरी पंडित सुरक्षित नहीं है।
गणपतयार मंदिर की घंटी की आवाज के साथ होती थी सुबह : डाक विभाग में कार्यरत रहे द्वारिका नाथ डार (82) का श्रीनगर के हब्बाकदल में गणपतयार मंदिर के पास पक्का मकान था। बताते हैं कि जेहादियों ने कश्मीरी पंडितों का नरसंहार शुरू किया तो अप्रैल 1990 में परिवार संग जम्मू आ गए। कुछ दिन बाद पता चला कि मोहल्ले के ही चार सगे भाइयों ने लूटपाट के बाद मकान कब्जा लिया। पत्नी विमला डार बताती हैं कि रोज सुबह गणपतयार मंदिर की घंटी की आवाज के साथ आंख खुलती थी। चारों बेटियों की शादी हो चुकी है। ईश्वर से प्रार्थना है कि आखिरी सांस श्रीनगर में खंडहर पड़े अपने मकान में ही गुजरे।
सरकार चाहेगी तो जरूर जाएंगे अपने घर : 2008 में पुलिस महकमे से एसआई पद से रिटायर हुए ओंकार नाथ (72) का अनंतनाग के वेरीनाग में पक्का मकान था। बताते हैं कि 1989-90 के दौर में आतंकवाद ने पांव जमाए तो मई 1990 में वह भी परिवार के साथ जम्मू आ गए। कुछ दिन बाद पता चला कि जेहादियों ने मकान और गाड़ी जला दी। कुछ भी नहीं छोड़ा। अभी तीन बेटी और एक बेटे की शादी हो चुकी है। बेटा पुलिस विभाग में कार्यरत है। अब सरकार चाहेगी तो वापस अपने पैतृक आवास पर जाएंगे। अन्यथा उम्मीद पूरा होने के इंतजार में यहीं प्रवासी शिविर जगती में ही सांस थम जाएगी।
खंडहर मकान पर है दूसरों का कब्जा कौड़ियों के भाव बेचनी पड़ी जमीन : मूलत: पुलवामा के रहने वाले मोतीलाल रैना (65) जमींदारी करते थे। 18 कनाल से अधिक जमीन व दो पक्के मकान थे। बागीचे में सेब के 150 पेड़ थे। वह भी अप्रैल 1990 में जम्मू आ गए। बाद में पता चला कि अक्तूबर 1991 में पुराना मकान व मई 1992 में लूटपाट के बाद पक्के मकान को भी जेहादियों ने जला दिया। खंडहर मकान पर दूसरों का कब्जा था। जीवन यापन के लिए कौड़ियों के भाव जमीन बेचनी पड़ी।
लूटने के बाद मकान गोशाला और गाड़ी फूंक दी : गांदरबल में शिक्षा विभाग में हेडमास्टर रहे लक्ष्मीनाथ कौल (89) बताते हैं कि जेहादियों के डर से अप्रैल 1990 में परिवार संग जम्मू आ गए। पन्नी तानकर रहने लगे जबकि गांदरबल में कुछ ही दिन पहले उन्होंने नया पक्का मकान बनवाया था। गोशाला और चार पहिया गाड़ी छोड़कर आए थे। कुछ दिन बाद पता चला कि गांव वालों ने ही लूटने के बाद मकान सहित सभी कुछ जला दिया। तीनों लड़कियों की शादी करने के बाद पेंशन पर जीवन गुजार रहा हूं। अंतिम सांस अपनी मातृभूमि पर ही लेना चाहता हूं।