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Jammu News: जंगली जानवरों की वजह से किसानों ने छोड़ी खेती, सांबा जिले में 200 हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर

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Farmers abandoned farming due to wild animals, 200 hectares of agricultural land in Samba district became barren.
आजीविका पर संकट, मक्की, उड़द और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलें करना छोड़ रहे किसान
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पहाड़ी और कंड़ी क्षेत्र में सबसे ज्यादा परेशान कर रहे हैं जंगली जानवर और पालतू छुट्टा पशु
संवाद न्यूज एजेंसी
सांबा। जिले के पहाड़ी और कंड़ी क्षेत्र में जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने किसानों की आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। लगातार फसलें बर्बाद होने से किसानों ने मक्की, उड़द और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की खेती लगभग बंद कर दी है। कई किसानों की 200 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन अब बंजर पड़ी है।

किसानों का कहना है कि पहले इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मक्की की खेती होती थी। मक्की बेचकर परिवारों का खर्च चलता था और साथ ही गेहूं, उड़द व अन्य फसलें भी उगाई जाती थीं। लेकिन पिछले पांच-छह वर्षों से बंदरों, मोर, सुआर की बढ़ती संख्या के कारण खेतों में तैयार फसल पूरी तरह नष्ट हो जाती है। ऐसे में खेती की बढ़ती लागत भी नहीं निकल पाती, जिससे किसानों ने खेती छोड़ना ही बेहतर समझा। जंगली जानवरों के अलावा कुछ क्षेत्रों में पालतू छुट्टा पशु भी किसानों की फसलों को चौपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। पिछले दिनों ही ज्यौडि़यां क्षेत्र में किसानों ने पंचायत करके छुट्टा पशु पालकों पर कार्रवाई करने का फैसला लिया गया था।
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स्थानीय किसानों का कहना है कि यदि जंगली जानवरों की समस्या का प्रभावी समाधान नहीं किया गया तो आने वाले समय में पहाड़ी क्षेत्रों की और अधिक कृषि भूमि बंजर हो जाएगी, जिससे किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों पर गंभीर असर पड़ेगा।
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इन क्षेत्रों में बंजर हुई जमीन
ब्लॉक परमंडल, नड्ड, सुंब और घगवाल के कंड़ी
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वैज्ञानिकों ने सुझाए उपाय
यदि किसान मक्की की खेती करें तो खेत की चारों ओर तथा बीच-बीच में देसी भिंडी की फसल लगाएं, क्योंकि इससे बंदरों का खेत में आना कम हो सकता है। इसके अलावा आलू, कचालू, अरबी, हलदी, अदरक जैसी फसलें लगाएं। इनसे अच्छी पैदावार मिलने के साथ-साथ जंगली जानवरों से नुकसान अपेक्षाकृत कम होगा।
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किसान बोले- न सुनता प्रशासन न सरकार सुन रही
मेरी तीन एकड़ भूमि आज बंजर पड़ी है। कभी इसी जमीन से क्विंटलों के हिसाब से मक्की का उत्पादन होता था और अच्छी आमदनी होती थी। लेकिन मजबूरी है, लागत लगाकर फसल करें तो जानवरों के लिए ही होगी। हमारी तो न प्रशासन सुनता न सरकार सुन रही है। -सतपाल सिंह, किसान
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मेरी दो एकड़ जमीन पर उच्च गुणवत्ता वाली मक्की होती थी, जिसका आटा दूर-दूर के लोग खरीदने आते थे। अब खेती बंद कर दी है। इस समस्या को लेकर वन विभाग, कृषि विभाग और प्रशासन के समक्ष कई बार गुहार लगाई गई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। - बलविंदर सिंह, किसान
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मेरे पास एक एकड़ भूमि है, जो अब पूरी तरह खाली पड़ी है। किसानों को सब्सिडी पर सोलर फेंसिंग उपलब्ध कराई जाए, ताकि कम से कम कुछ भूमि को जंगली जानवरों से सुरक्षित रखा जा सके और खेती दोबारा शुरू हो सके। - सोहन सिंह, किसान


कोट---
सरकार ने सोलर फेंसिंग की योजना शुरू की है। एक कनाल भूमि के लिए लगभग 70 हजार रुपये की लागत वाली सोलर फेंसिंग पर सरकार 50 प्रतिशत सब्सिडी प्रदान कर रही है। -राकेश खजुरिया, जिला मुख्य कृषि अधिकारी

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कोट-
जंगलों में फलदार पेड़ों और अन्य पौधों की कटाई के कारण बंदर अब भोजन की तलाश में निचले क्षेत्रों में आने लगे हैं। किसानों से कई बार ऐसी शिकायतें मिली हैं कि बाहरी क्षेत्रों से पकड़े गए बंदरों को सांबा के पहाड़ी इलाकों में छोड़ा जाता है, जिससे उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। -डॉ. संजय खजुरिया, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र
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