Srinagar: 37 साल बाद श्रीनगर में मनाया गया माता रूपदेद भवानी का 405वां प्रकाशोत्सव, देशभर से पहुंचे श्रद्धालु
श्रीनगर के सफाकदल स्थित माता श्री रूपदेद भवानी के जन्मस्थान पर 37 वर्षों बाद उनका 405वां प्रकाशोत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कश्मीर की साहिबे सरकार अलाकेश्वरी माता श्री रूपदेद भवानी का 405वां प्रकाशोत्सव सोमवार को श्रीनगर के डाउनटाउन स्थित सफाकदल में उनके जन्मस्थान व आवास पर श्रद्धा के साथ मनाया गया। 37 वर्ष बाद हुए आयोजन में देशभर से कश्मीरी पंडितों और स्थानीय श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
सुबह से ही सफाकदल स्थित मंदिर और जन्मस्थल पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। पूजा-अर्चना, प्रार्थना और प्रसाद वितरण के साथ पूरे परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहा। श्री अलख साहिबा ट्रस्ट के सेवादार बिट्टू रैना ने बताया कि पिछले वर्ष ट्रस्ट की ओर से जन्मस्थल का जीर्णोद्धार कराया गया था। 37 साल बाद विधिवत पूजा हो सकी है। विशेष पूजा का आयोजन पुणे से आई माता की भक्त पिंकीजी के सहयोग से संपन्न हुआ।
श्रद्धालुओं ने माता रूप भवानी के जीवन, तपस्या और उनके वाखों में निहित प्रेम, भाईचारे और शांति के संदेश को याद करते हुए इसे कश्मीर की साझा आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण पर्व बताया। सफाकदल माताश्री रूपदेद भवानी जी का जन्म स्थान है। उन्होंने साढ़े बारह-साढ़े बारह वर्षों तक कठिन तपस्या की थी।
माता भवानी सभी समुदायों के लिए पूज्य
पूर्व पर्यटन मंत्री हेमलता वाखलू ने भी माता के दर्शन कर मंदिर प्रबंधन और ट्रस्ट की सराहना की। उन्होंने कहा कि सफाकदल उनकी भी जन्मभूमि है और माता रूप भवानी जाति, पंथ और धर्म से ऊपर उठकर सभी समुदायों के लिए पूज्य रही हैं।
9 साल की उम्र में विस्थापित होने के बाद पहली बार मंदिर आए : मनीष धर
पीएम पैकेज के तहत घाटी में कार्यरत कर्मचारी मनीष धर ने बताया कि नौ वर्ष की उम्र में विस्थापित होने के बाद वह पहली बार माता रूप भवानी के जन्मस्थान पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि माता रूप भवानी और लल द्यद (लल्लेश्वरी) जैसी संत विभूतियों ने कठिन परिस्थितियों में भी कश्मीरी संस्कृति और सभ्यता को जीवित रखने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि डाउनटाउन के अन्य ऐतिहासिक मंदिरों आनंदेश्वर भैरव मंदिर, मंगलेश्वर भैरव मंदिर और पोषार मंदिर के संरक्षण और बेहतर सुविधाओं की भी आवश्यकता है।
36 साल बाद मूल निवास स्थान पर लौटे हैं, यह अविस्मरणीय अनुभव : विजय धर
प्रकाशोत्सव कई श्रद्धालुओं के लिए भावनात्मक पुनर्मिलन का अवसर भी बना। विजय कुमार धर 36 वर्ष बाद अपने पुराने घर और बचपन की गलियों में लौटे। उन्होंने बताया कि मंदिर के पीछे स्थित मकान कभी उनका घर हुआ करता था, जहां उनका पूरा बचपन बीता। 1990 में परिस्थितियों के चलते उन्हें घर छोड़ना पड़ा था। इतने वर्षों बाद माता के दरबार में लौटना उनके लिए अत्यंत भावुक और अविस्मरणीय अनुभव है। यह प्रकाशोत्सव केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय के अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से पुनः जुड़ने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आया।
माता के दर से कोई भी श्रद्धालु खाली हाथ नहीं लौटता: बंसी
कार्यक्रम में शामिल पूर्व विधि अधिकारी बंसी लाल पंडिता ने माता के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त करते हुए कहा कि लोकमान्यताओं के अनुसार माता रूप भवानी के अनेक चमत्कार आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का आधार हैं। उन्होंने अपनी बेटी के लंबे समय से लंबित नियुक्ति आदेश के माता के आशीर्वाद से जारी होने का अनुभव भी साझा किया और कहा कि माता के दर से कोई भी श्रद्धालु खाली हाथ नहीं लौटता।