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अभिनव थिएटर में ऑल इंडिया मुशायरा : मेरे साथ रूह का तकाजा है, मैं इश्क के कर्जे उठा नहीं सकता...
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जम्मू। मैं तेरे पास खाली हाथ आ नहीं सकता, मैं इश्क के कर्जे उठा नहीं सकता, मेरे साथ अपनी रूह का तकाजा भी है, मैं दोनों हाथों से दुनिया कमा नहीं सकता... मशहूर शायर असरार चंदेरी के इस शेर जैसी कई पेशकश ने अभिनव थिएटर में बुधवार की शाम को यादगार बना दिया। गणतंत्र दिवस पर ऑल इंडिया मुशायरा चल रहा था। विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर देर शाम तक मुशायरे में डटे रहे। जैसे-जैसे शाम ढली, सुनने वालों का काफिला बढ़ता रहा।
बारामुला से आए डॉ. अहमद मंजूर ने दास्तां इश्क की सुनाते हुए, इश्क बहते हैं मुस्कुराते हुए, अपनी पहचान ही गंवा बैठे, इक किरदार को निभाते हुए...लाइनों के जरिये इश्क के दर्द को बयां किया। उन्होंने बेगुनाही ने खुदकुशी कर ली, वो तमाशा हुआ अदालत में...के जरिये भी तालियां बटोरीं। ज्योति आजाद ने दिल इस तरह दिल का तलबगार हुआ जाता है, हिज्र से भी प्यार हुआ जाता है...पेशकश के जरिये अपने दिल की बात बयां की। प्रीतपाल सिंह बेताब ने कभी तो हम वो देखते हैं, जो कहीं नहीं होता...के जरिये ख्वाब और हकीकत के बीच के फासले को शब्द दिए।
परवेज गुलशन ने पत्थर पे चोट पड़ती है फूलों के वार से, तरतीब पा रहा हूं इसी इंतशार में...के जरिये मोहब्बत करने वालों की हालत बयां की। शायर इमरान फैज ने इश्क के खेल में जब कुछ भी न बचा, होश तब जाके ठिकाने लगे, चोर नहीं दिल में तो बताओ जरा, तुम हमसे क्यूं नजरें चुराने लगे...सुनाकर तालियां बटोरीं। मोहन मुंतजिर ने सूर्य बनो कुछ रातों का जुगनू बनने से क्या होगा, भंवरे बनिए फूलों की खुशबू बनने से क्या होगा, लैलाओं के चक्कर में मजनूं बनने से क्या होगा... और यार मोहब्बत न करते तो हम भी कलेक्टर बन जाते...की पेशकश पर तालियां पाईं।
उर्दू की बात को दबाने की कोशिश होती है...
असरार चंदेरी अपने अशरार पढ़ने के लिए खड़े हुए तो माइक में गड़बड़ हुई। तभी मंच से आवाज आई उर्दू की बात होती है तो दबाने की कोशिश होती है। इस पर असरार बोले, लेकिन उर्दू को दबाया नहीं जा सका है।
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उर्दू की बात को दबाने की कोशिश होती है...
असरार चंदेरी अपने अशरार पढ़ने के लिए खड़े हुए तो माइक में गड़बड़ हुई। तभी मंच से आवाज आई उर्दू की बात होती है तो दबाने की कोशिश होती है। इस पर असरार बोले, लेकिन उर्दू को दबाया नहीं जा सका है।