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बॉम्बे हाईकोर्ट: आईआईएमसी के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक पर लगा एससी-एसटी केस खारिज, हाईकोर्ट ने रद्द की कार्यवाही

अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: Nikita Gupta Updated Sat, 28 Feb 2026 11:56 AM IST
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सार

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक डॉ. अनिल कुमार सौमित्र के खिलाफ दर्ज एससी-एसटी एक्ट का आपराधिक मामला खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यह विवाद कार्यालयी कामकाज और अनुशासन से जुड़ा था, जातिगत अपमान के स्पष्ट साक्ष्य न होने पर कानून लागू नहीं किया जा सकता।

SC-ST case against former IIMC regional director dismissed
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) में प्रोफेसर और पूर्व क्षेत्रीय निदेशक डॉ. अनिल कुमार सौमित्र को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनके खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी एसटी) कानून के तहत दर्ज आपराधिक केस को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह मामला दफ्तर के कामकाज और अनुशासन से जुड़ा है न कि जाति के आधार पर अपमान का।

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न्यायमूर्ति प्रवीण एस पाटील ने अपने आदेश में कहा कि कानून कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है लेकिन हर दफ्तर के विवाद या प्रशासनिक फैसले में इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जब तक यह साफ न हो जाए कि किसी व्यक्ति को जानबूझकर उसकी जाति के कारण सबके सामने अपमानित किया गया है, तब तक इसे कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
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मामला आईआईएमसी के अमरावती (महाराष्ट्र) क्षेत्रीय केंद्र से जुड़ा है जहां डॉ. सौमित्र क्षेत्रीय निदेशक के पद पर तैनात थे। शिकायतकर्ता संस्थान में संविदा पर सहायक व्याख्याता के रूप में काम करता था। उसका आरोप था कि डॉ. सौमित्र ने उसे बार-बार अपमानित और मानसिक रूप से परेशान किया क्योंकि वह अनुसूचित जाति से है।

इन आरोपों के आधार पर फरवरी 2022 में (एससी-एसटी) की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की गई। डॉ. सौमित्र ने हाईकोर्ट में कहा कि शिकायतकर्ता कामकाज में लापरवाही बरत रहा था और उसे कई बार सुधार के मौके दिए गए।

सुधार न होने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उनका कहना था कि शिकायतकर्ता से जो भी बातचीत हुई, वह पूरी तरह दफ्तर से जुड़ी थी और किसी भी स्तर पर जाति को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की गई। हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी कर्मचारी ने यह नहीं बताया कि शिकायतकर्ता को उसकी जाति के नाम पर अपमानित किया गया।

शुरुआती जांच में खुद शिकायतकर्ता ने माना था कि उसके साथ जाति के आधार पर कोई टिप्पणी नहीं की गई। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने एफआईआर, चार्जशीट और सेशन कोर्ट में चल रही पूरी कार्यवाही को खारिज कर दिया।

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