कोर्ट का फैसला: सबूतों के अभाव में 19 साल बाद अदालत ने आरोपी को किया बरी, पहचान साबित नहीं कर सका अभियोजन
डोडा की अदालत ने 19 साल पुराने एसपीओ बलदेव सिंह हत्याकांड में एकमात्र जीवित आरोपी जमील अहमद को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया, क्योंकि अभियोजन पक्ष उसके खिलाफ पहचान या ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।
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स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) बलदेव सिंह की हत्या के 19 साल पुराने मामले में एकमात्र जिंदा बचे आरोपी को बरी कर दिया गया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, डोडा अर्चना चाड़क की अदालत ने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी की पहचान करने या उसे हमले से जोड़ने वाला कोई भी सबूत पेश करने में विफल रहा। मामले में आरोपी जमील अहमद निवासी डोडा पर आरपीसी की धारा 302 और 307 के साथ ही शस्त्र अधिनियम की धारा 7/27 के तहत 2007 में एफआईआर दर्ज की गई थी। अभियोजन के अनुसार पांच अगस्त, 2007 को मरमत के सेरी टॉप इलाके में तलाशी अभियान चला रही पुलिस की एक गश्ती टीम पर आतंकियों ने गोलीबारी कर दी थी। इस हमले में एसपीओ बलदेव सिंह की मौत हो गई थी, जबकि हमलावर उनकी एसएलआर राइफल, दो मैगजीन और 80 जिंदा कारतूस अपने साथ ले गए थे। जांच के दौरान मामले में आजाद हुसैन, जमील अहमद और कफायतुल्ला को आरोपी बनाया गया था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान आजाद हुसैन और कफायतुल्ला की मृत्यु हो जाने के कारण उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही समाप्त हो गई। मामले को सबूतों के अभाव की श्रेणी में मानते हुए अदालत ने सीआरपीसी की धारा 342 के तहत जांच की आवश्यकता समाप्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया। जेएनएफ
12 गवाहों में से कोई नहीं कर सका पहचान
अभियोजन पक्ष ने 12 गवाहों की गवाही दर्ज कराई थी। इनमें गश्ती टीम के सदस्य, मृतक के रिश्तेदार, शव का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर और दो जांच अधिकारी शामिल थे। इनमें से कोई भी गवाह जमील अहमद की पहचान हमलावरों में से एक के रूप में नहीं कर सका।
अनुमान पर आधारित थे आतंकियों के नाम
प्रारंभिक जांच अधिकारी ने जिरह के दौरान अदालत को बताया कि आतंकवादियों के नाम उनके अपने अनुमान पर आधारित थे। जांच के दौरान ऐसा कोई सबूत सामने नहीं आया। उन्होंने स्वीकार किया कि घटनास्थल से कोई खाली कारतूस भी जब्त नहीं किया गया।